अपने तो अपने होते हैं

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अपने तो अपने होते हैं

Image by Teodor Buhl from Pixabay

अशोक हॉस्पिटल के एक वार्ड में माथा पकड़े बैठा था। उसकी गोद में एक साल की बेटी सो रही थी। तीन साल का बेटा उसकी बांह पकड़े खड़ा था। पास में ही उसकी पत्नी बैड पर लेटी हुई थी।

पत्नी को बीमार हुए एक महीना हो गया था, मगर अभी भी वह गंभीर रूप से बीमार थी।

पत्नी बी.पी. लो होने के कारण बेहोश हो गई थी। हॉस्पिटल लाने के दो दिन बाद उसे होश आया था। मगर इतनी देर तक बी.पी. लो रहने के कारण हार्ट, फेफड़े, किडनी और अन्य अंगों का बुरा हाल हो गया था। इलाज चल रहा था मगर सुधार बहुत धीरे हो रहा था।

वह एक महीने से बीमार बीवी और दो छोटे बच्चों को अकेला सम्भाल रहा था। वह पिछले चार दिनों से नहाया भी नहीं था। उसकी हालत इतनी खराब थी कि वह कहीं अकेला बैठकर रोना चाहता था।

शुरू में कुछ यार-दोस्त और मोहल्ले के कुछ लोग मिलने आये थे। उसके बाद तो लोगों ने फोन उठाना भी बन्द कर दिया था कि वह कहीं पैसे न मांग ले। शहर में वह ज्यादा लोगों को जानता भी नहीं था, क्योंकि तीन साल पहले वह माँ-बाप और भाई-भाभियों से लड़कर इस शहर में आया था। तभी से बीवी-बच्चों के साथ किराये के मकान में रह रहा था।

घर में कोई बीमार पड़ता है, तब सगे-सम्बन्धी और रिश्तेदार ही काम आते हैं। अशोक तो ससुराल वालों से भी लड़कर बैठा था। दो रुपये कमाने क्या शुरू किये, घमण्ड में अपनों से ही दूरी बना बैठा था।

अचानक उसने हिम्मत करके अपनी माँ को फोन मिलाया। पूरी घंटी जाने के बाद भी माँ ने फोन नहीं उठाया। दूसरी बार फिर से कॉल किया, तो माँ ने फोन काट दिया।

उसे याद आया कि तीन साल पहले जब माँ से लड़कर आया था, तब उसने कहा था, “तुम सब मेरे लिए मर चुके हो। मैं तुम लोगों का मुँह भी नहीं देखूंगा।”

माँ के फोन काटने पर वह निराश हो गया। उसकी आँखों में आँसू निकल आए। पास ही बैड पर सोई पत्नी टुकुर-टुकुर देख रही थी। पति को रोते देखा तो उसकी आँखों में भी आँसू निकल आए।

अशोक ने सोचा कि पापा को फोन करता हूँ, मगर पापा और बड़े भाईयों से बात करने की उसकी हिम्मत नहीं थी।

एक मात्र माँ ही वह कड़ी थी, जिससे वह बात कर सकता था। मगर माँ ने फोन काट दिया था। उसने एक बार और आखिरी कोशिश करने के लिए माँ को फोन मिला दिया।

इस बार माँ ने फोन उठा लिया। माँ बोली, “क्या है? हम लोग तो तुम्हारे लिए मर गए हैं न। अब हमारे जीवित श्राद्ध करने के लिए फोन कर रहा है क्या?”

माँ की आवाज़ सुनते ही उसका सब्र जवाब दे गया।

वह रुँधे गले और बिगड़ते चेहरे के साथ इतना ही बोल पाया - “माँ”। फिर फफक-फफक कर रोने लगा।

वह माँ थी। औलाद का रोना कैसे सहन कर सकती थी? तुरंत माँ का गुस्सा शांत हो गया। सारे मनमुटाव एक पल में भूल गई। जिस तरह एक हिरनी अपने बच्चे के लिए तड़प उठती है, वैसे ही वह अधीर होकर बोली, “क्या हुआ रे....रो क्यों रहा है? जल्दी बता बेटा। मेरा मन घबरा रहा है?”

माँ के वात्सल्य भरे शब्दों को सुन कर वह जोर-जोर से रोने लगा। वार्ड में दूसरे मरीज और उनके परिजन उसकी तरफ देखने लगे।

माँ अनर्थ के डर से बार-बार पूछ रही थी, “क्या हुआ, बेटा! जल्दी बोल न?”

वह रुलाई रोकते हुए रुँधे गले से बोला, “माँ! तेरी बहू एक महीने से हॉस्पिटल में भर्ती है। उसे और बच्चों को संभालते-संभालते थक गया हूँ, माँ।”

माँ बोली, “तू अकेला कहाँ है रे! हम हैं न! अभी तेरा बाप जिंदा है, माँ जिंदा है। तीन बड़े भाई हैं, भाभियाँ हैं। बताने में तुमने इतनी देर क्यों कर दी, बेटा? तू अब फिकर मत करना। दो घण्टे में सबको लेकर आ रही हूँ। तू हिम्मत रखना।”

आज बरसों बाद उसे माँ के वचन अमृत तुल्य लगे। शरीर में जान आ गई। ऐसे लगा, जैसे अब सब कुछ ठीक हो जाएगा।

वह खड़ा होता हुआ पत्नी से बोला, “अब तू बिल्कुल ठीक हो जाएगी। माँ आ रही है।”

पत्नी रोते हुए सारी बातें सुन रही थी। बोली, “परिवार आ रहा है, ये सुनकर मेरी भी हिम्मत बंध गई है, जी।”

कुछ देर बाद ही उसका पूरा परिवार वहाँ पहुँच गया।

बाप ने जब उसके कन्धे पर हाथ रखा, तो वह पिता के सीने से चिपकते हुए रो पड़ा और रोते-रोते बोला, “माफ कर दो, पापा।”

पिता ने उसे भुजाओं में कसते हुए कहा, “रो मत। मैं हूँ न!”

भाईयों से गले मिला, तो वे बोले, “ज्यादा बड़ा हो गया क्या? इतनी बड़ी बात हो गई और तू अब बता रहा है?”

तीनों भाभियाँ भी साथ आई थी। साथ में घर से खाना बनाकर भी लाई थी।

तीन साल बाद उसने अपने घर का खाना खाया। फिर माँ ने उसे नहाने के लिए घर भेज दिया। परिवार के आने से वह हल्का-फुल्का महसूस कर रहा था।

घर पहुँचते ही नहा कर बेफिक्र होकर सो गया। एक महीने बाद उसे चैन की नींद आई। उसकी पत्नी जो एक महीने से बेसुध थी, परिवार के आते ही चैतन्य हो गई। अपनों का साथ दवाई का काम कर गया। वह सात दिन में ही ठीक हो गई।

अशोक और उसकी पत्नी को समझ में आ गया कि परिवार के बिना कुछ भी नहीं है, इसलिए वे अपने परिवार के साथ ही गाँव लौट गए।

आजकल यारी दोस्ती तो सिर्फ मतलब की रह गई है। ऐसे मौके पर सही मायनों मे अपना परिवार ही काम आता है, इसलिए बेशक अलग रह लीजिए, मगर अपनों से जुड़े रहिए। गुरूर में आकर उन्हें खोने की गलती मत करिये, क्योंकि अपने तो अपने होते हैं। उनके बिना इंसान भीड़ में भी अकेला है।

इस कहानी से और भी कई बातें सीखने को मिलती हैं।

1. परिवार ही असली सहारा होता है - मुश्किल समय में दोस्त और परिचित भले ही साथ छोड़ दें, लेकिन परिवार हमेशा आपके साथ खड़ा रहता है।

2. गुरूर और अहंकार रिश्तों को तोड़ देता है - कभी-कभी इंसान अपने अहंकार में अपनों से दूर हो जाता है, लेकिन जब मुश्किल आती है, तब वही परिवार सबसे बड़ा सहारा बनता है।

3. माता-पिता का दिल बहुत बड़ा होता है - माता-पिता कितना भी नाराज़ क्यों न हों, जब संतान दुख में होती है, तो वे अपने सारे गिले-शिकवे भूल जाते हैं और उसकी मदद के लिए दौड़े चले आते हैं।

4. सच्चे अपने वही होते हैं जो बिना स्वार्थ के साथ देते हैं - जब अशोक के पास पैसा था, तब दोस्त और रिश्तेदार थे, लेकिन जब जरूरत पड़ी, तो सब दूर हो गए। अंत में परिवार ने ही साथ दिया।

5. माफी मांगने से रिश्ते और मजबूत होते हैं - अशोक ने जब अपने पिता से माफी मांगी, तो उन्होंने तुरंत उसे माफ कर गले से लगा लिया। इससे पता चलता है कि अपने रिश्तों को बचाने के लिए अहंकार छोड़कर माफी मांगनी चाहिए।

6. अपनों का साथ सबसे बड़ी दवा है - अशोक की पत्नी जो महीनों से बीमार थी, अपने ससुराल वालों के आने से कुछ ही दिनों में ठीक हो गई। यह दिखाता है कि भावनात्मक सहारा भी किसी दवा से कम नहीं होता।

7. जीवन में रिश्तों को प्राथमिकता दें - पैसा, दोस्ती और बाहरी दुनिया से ज्यादा जरूरी हमारे अपने लोग होते हैं। उन्हें कभी नजरअंदाज न करें।

निष्कर्ष

“अपने तो अपने होते हैं!”

रिश्तों को समय दीजिए, अहंकार को छोड़िए और अपनों से जुड़े रहिए, क्योंकि जब समय कठिन होता है, तो सिर्फ परिवार ही साथ खड़ा रहता है।

राम रक्षा स्तोत्र मंत्र

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे।

सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।

अर्थात् राम के नाम का ध्यान करने से मन राम की दिव्य चेतना में लीन हो जाता है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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