भक्त का मान
भक्त का मान
भगवान अपने भक्तों से बहुत प्रेम करते हैं। भगवान ने गीता में भी कहा है कि जो मुझे याद करता है, मैं भी उसे याद करता हूं..
एक बार की बात है। कबीरदास की कुटिया के पास एक वैश्या ने अपना कोठा बना लिया। एक ओर तो कबीर दास, जो दिन भर भगवान का नाम कीर्तन करते हैं और दूसरी ओर वह वैश्या, जिसके घर में नाच-गाना होता रहता है।
एक दिन कबीरजी उस वैश्या के यहाँ गए और कहा कि ‘देख बहन! तुमारे यहाँ बहुत खराब लोग आते हैं, तो आप और कहीं जाकर रह सकते हो क्या?
संत की बात सुनकर वैश्या भड़क गयी और कहा कि अरे फ़कीर! तू मुझे यहाँ से भगाना चाहता है, कही जाना है तो तू जा कर रह, पर मैं यहाँ से कहीं जाने वाली नहीं हूँ।
कबीरजी ने कहा - ठीक है, जैसी तेरी मर्जी।
कबीरदास जी अपनी कुटिया में वापिस आ गए और फिर से अपने भजन-कीर्तन में लग गये। जब कबीर जी के कानो में उस वैश्या के घुँघरू की झंकार और कोठे पर आये लोगों के गंदे-गंदे शब्द सुनाई पड़ते, तो कबीर जी अपने भजन कीर्तन को और जोर-जोर से तेज आवाज़ से करने लगे।
तो बंधुओं! भजन का ऐसा प्रभाव हुआ, जो लोग वैश्या के कोठे पर आते जाते थे, वे अब कबीर जी पास बैठकर सत्संग सुनते और कीर्तन करते। वैश्या ने देखा कि ये फ़कीर तो जादूगर है। इसने मेरा सारा धंधा चोपट कर दिया। अब तो वे सब लोग उस फ़कीर के साथ ही भजनों की महफ़िल जमाये बैठे हैं।
वैश्या ने क्रोधित हो कर अपने यारों से कहा कि तुम इस फ़कीर जादूगर की कुटिया जला दो, ताकि यह यहाँ से चला जाये। वैश्या के आदेश पर उनके यारों ने संत कबीर की कुटियां में आग लगा दी। कुटिया को जलती देख संत कबीरदास बोले - वाह! मेरे मालिक! अब तो तू भी यही चाहता है कि मैं ही यहाँ से चला जाऊं। प्रभु! जब अब आपका आदेश है, तो जाना ही पड़ेगा। संत कबीर जाने ही वाले थे कि भगवान से नहीं देखा गया अपने भक्त का अपमान।
उसी समय भगवान ने ऐसी तूफानी हवा चलायी, उस कबीर जी की कुटिया की आग तो बुझ गयी और उस आग ने वैश्या के कोठे को पकड़ लिया। वैश्या के देखते ही देखते उनका कोठा जलने लगा। वह चीखती-चिल्लाती हुए कबीर जी के पास आकर कहने लगी - अरे कबीर जादूगर! देख...देख....। मेरा सुन्दर कोठा जल रहा है। मेरे सुंदर परदे जल रहे हैं। वे लहराते हुए झूमर टूट रहे हैं। अरे जादूगर! तू कुछ करता क्यों नहीं।
कबीर जी को जब अपने झोपडी की फिकर नहीं थी, तो किसी के कोठे से उनको क्या लेना देना? कबीर जी खड़े-खड़े हंसने लगे। कबीर की हंसी देख वैश्या क्रोधित हो कर बोली - अरे! देखो, देखो, यारों! इस जादूगर ने मेरे कोठे में आग लगा दी। अरे देख कबीर! जिसमें तूने आग लगायी, वह कोठा मैंने अपना तन, मन और अपनी इज्ज्त बेच कर बनाया और तूने मेरे जीवन भर की कमाई पूंजी को नष्ट कर दिया।
कबीर जी मुस्कुरा कर बोले कि देख बहन! तू फिर से गलती कर रही है और कहते हैं कि
ना तूने आग लगाई, ना मैंने आग लगाई।
ये तो यारों ने अपनी यारी निभायी।।
तेरे यारों ने तेरी यारी निभायी, तो मेरा भी तो यार बैठा है। मेरा भी तो चाहने वाला है। जब तेरे यार तेरी वफ़ादारी कर सकते हैं तो मेरा यार तेरे यारों से कमजोर है क्या?
कुटिल वैश्या की कुटिलाई, संत कबीर की कुटिया जलाई!
श्याम पिया के मन न भाई।
तूफानी गति देय हवा की, वैश्या के घर आग लगायी।
श्याम पिया ने प्रीत निभाई ।।
वैश्या समझ गयी कि मेरे यार खाक बराबर।
कबीर के यार सिर ताज बराबर।।
उस वैश्या को बहुत ग्लानि हुई कि मैं मंद बुद्धि, नादान एक हरि भक्त का अपमान कर बैठी। भगवान मुझे क्षमा करें।
तब से वैश्या ने सब गलत काम छोड़ दिए और भगवान के भजन में लग गई।
भगवान बहुत सुन्दर लीला करते हैं और अपने भक्त का मान कभी घटने नहीं देते। इसलिए भगवान कहते हैं कि जहाँ मेरा भक्त पैर रखता है, उसके पैर रखने से पहले मैं वहाँ हाथ रख देता हूं। मैं अपने भक्त का साथ कभी नहीं छोड़ता हूं। हमेशा उसके साथ रहता हूं..!!
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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