ज्ञान का बोझ

 ज्ञान का बोझ और नारद की सीख

(एक पौराणिक कथा जो आज भी उतनी ही सार्थक है...)

एक बार की बात है। कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की दिव्य सभा सजी हुई थी। चारों ओर ऋषि-मुनियों का जमावड़ा था - वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, और स्वयं देवर्षि नारद भी पवित्र स्वर में वीणा झंकृत करते हुए बैठे थे।

पूरे वातावरण में ज्ञान, शांति और भक्ति की गूंज थी।

इसी बीच, महामुनि दुर्वासा भारी-भरकम पुस्तकों का एक बड़ा गट्ठर कंधे पर लादे सभा में प्रकट हुए।

दुर्वासा एक तपस्वी और महान संत तो थे, परंतु उनकी चिड़चिड़ी और तुनकमिजाज प्रवृत्ति सबको ज्ञात थी।

सभा में विराजमान संतों और ऋषियों को नजरअंदाज़ करते हुए वे सीधे भगवान शिव के समीप जाकर बैठ गए।

भगवान शिव ने अपने सहज और सौम्य स्वभाव में मुस्कुराते हुए पूछा, “मुनिवर! अध्ययन कैसा चल रहा है?“

दुर्वासा ने अपनी पुस्तकों की ओर इशारा करते हुए गर्वपूर्वक कहा, “मैंने इन समस्त ग्रंथों का गंभीर अध्ययन किया है, और ये अब मुझे कंठस्थ हैं।“

उनकी वाणी में तप का तेज था, पर विनम्रता और धैर्य का अभाव भी।

यह देखकर देवर्षि नारद उठ खड़े हुए।

उनकी वाणी शांत थी, परंतु शब्दों में गहरी चुभन थी।

उन्होंने कहाः “हे मुनि! यह गट्ठर आप पर शोभा नहीं देता...आपके पास ज्ञान तो है, पर संयम नहीं। आपने सभा की मर्यादा भंग की, वरिष्ठों की उपेक्षा की। यह किसी ज्ञानी का लक्षण नहीं।“

फिर नारद ने आगे कहाः "किताबें सिर पर लाद लेना, उन्हें याद कर लेना - यदि इससे विनय, धैर्य, क्षमा और आत्मनियंत्रण नहीं आता - तो वह ज्ञान नहीं, बस एक गधे का बोझ है। ज्ञान का सार आत्मा में उतरता है, अहंकार में नहीं।"

नारद के वचनों ने दुर्वासा के भीतर की अहम् की दीवार को तोड़ दिया। उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने उसी क्षण अपने ग्रंथों को उठाया और श्रद्धा से उन्हें समुद्र में समर्पित कर दिया।

फिर वे एक लंबी तपस्या के लिए निकल पड़े - न केवल प्रायश्चित के लिए, बल्कि सच्चे आत्मज्ञान की खोज में।

कथा का सारः

ज्ञान वही है, जो व्यवहार में उतरे, जो विनम्रता, धैर्य और करुणा का रूप ले ले।

पढ़ा हुआ वह नहीं जो सिर पर हो, पढ़ा हुआ वह है जो हृदय में हो।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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