ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की गाथा
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की गाथा
ब्राह्मण कैसे होते हैं? ब्राह्मण ऐसे होते हैं, जैसे ईश्वर चन्द्र विद्यासागर। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को पाँच सौ रुपये महीने की नौकरी मिली थी। शिक्षा में नौकरी करते हुए उन्हें पाँच सौ रुपये महीने मिलने लगे, तो उन्होंने विचार किया कि इन पाँच सौ रुपयों का क्या सदुपयोग करना चाहिए?
उन्हें ख्याल आया कि जब हम छोटे थे, तब मिट्टी के तेल के अभाव में दीपक न जला पाने के कारण प्रकाश के लिए सड़क पर खड़े होकर पोल पर लगी बत्तियों के प्रकाश में पढ़ते थे। पैसों की तब कितनी तंगी थी। पिताजी भेजते नहीं थे। इसलिए यह पाँच सौ रुपये भगवान ने अगर हमको दिये हैं, तो जिस समाज में हम रहते हैं, जिस देश में हम रहते हैं, उस पर उन लोगों का भी हक है। हमको कम में गुजारा करना चाहिए।
उन्होंने अपने कुटुम्बियों से कहा कि आपको पचास रुपये में गुजारा करना पड़ेगा और साढ़े चार सौ रुपये उन लोगों के लिए देना पड़ेगा, जो शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। जिनके पास फीस देने के लिए पैसे नहीं है। उस जमाने में घरों में बिजली तो थी नहीं, इसलिए मिट्टी के तेल का दिया जलाकर पढ़ने का इंतजाम करना पड़ता था। जिनके पास दिया जलाकर पढ़ने का इंतजाम नहीं है, जो कापियाँ नहीं खरीद सकते, उनका हक पहला है और हमारा हक पीछे है।
हम पचास रुपये महीने में दूसरे गरीबों के तरीके से, मजदूरों के तरीके से रहकर भी गुज़ारा कर सकते हैं। इसलिए हमको उसी तरीके से गुज़ारा करना चाहिए। हमें कमाना तो चाहिए, कमाने से कोई हर्ज नहीं है, लेकिन खर्च करते समय विचार करना चाहिए कि हमको अपने लिए कितना खर्च करना है और दूसरों के लिए कितना खर्च करना है।
अगर आपका मन किसी और के लिए खर्च करने का है, तो मैं कहता हूँ कि आपके भीतर करुणा है। आपके भीतर दया है। करुणा और दया अगर आपके भीतर है, तो आप ब्राह्मण हैं। आपको अपने चरित्र के बारे में अगर यह ख्याल है कि हमारा चरित्र ऊँचा होना चाहिए, श्रेष्ठ आदमियों जैसा चरित्र होना चाहिए। हमारा आदर्श दूसरों के सामने होना चाहिए, तो मैं समझूँगा कि आप सच्चे ब्राह्मण हैं।
‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा।
हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।’
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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