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Showing posts from October, 2025

जीने का तजुर्बा..

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जीने का तजुर्बा.. एक बार यूनान के मशहूर दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक नगर में गए। वहां उनकी मुलाकात एक वृद्ध सज्जन से हुई। दोनों आपस में काफी घुल मिल गए। वृद्ध सज्जन आग्रहपूर्वक सुकरात को अपने निवास पर ले गए। भरा-पूरा परिवार था उनका, घर में बहु-बेटे, पौत्र-पौत्रियां सभी थे। सुकरात ने वृद्ध से पूछा- “आपके घर में तो सुख-समृद्धि का वास है। वैसे अब आप करते क्या हैं?”  इस पर वृद्ध ने कहा - “अब मुझे कुछ नहीं करना पड़ता। ईश्वर की दया से हमारा अच्छा कारोबार है, जिसकी सारी जिम्मेदारियां अब बेटों को सौंप दी हैं। घर की व्यवस्था हमारी बहुएं संभालती हैं। इसी तरह जीवन चल रहा है।” यह सुनकर सुकरात बोले -“किन्तु इस वृद्धावस्था में भी आपको कुछ तो करना ही पड़़ता होगा। आप बताइए कि बुढ़ापे में आपके इस सुखी जीवन का रहस्य क्या है?” वह वृद्ध सज्जन मुस्कुराए और बोले - “मैंने अपने जीवन के इस मोड़ पर एक ही नीति को अपनाया है कि दूसरों से अधिक अपेक्षायें मत पालो और जो मिले, उसमें संतुष्ट रहो। मैं और मेरी पत्नी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने बेटे-बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं। अब वे जो कहते हैं, वह मैं कर देता...

अजगर करै न चाकरी

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  अजगर करै न चाकरी  शुरू में संत मलूकदास नास्तिक थे यानी ईश्वर के होने में उनका कतई विश्वास नहीं था। उन्हीं दिनों की बात है, उनके गांव में एक साधु आकर टिक गया। प्रतिदिन सुबह-सुबह गांव वाले साधु का दर्शन करते और उनसे रामायण सुनते। एक दिन मलूकदास भी रामायण सुनने पहुंचे। उस समय साधु महाराज ग्रामीणों को राम की महिमा बता रहा थे- राम दुनिया के सबसे बड़े दाता हैं। वे भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देते हैं। साधु की बात मलूकदास के पल्ले नहीं पड़ी। उन्होंने तर्क पेश किया - क्षमा करें महात्मन! यदि मैं चुपचाप बैठकर राम का नाम लूं, काम नहीं करूं, तब भी क्या राम भोजन देंगे?  ”अवश्य देंगे।“ साधु ने विश्वास दिलाया।  ”यदि मैं घनघोर जंगल में अकेला बैठ जाऊं, तब? तब भी राम भोजन देंगे।  साधु महाराज ने दृढ़ता पूर्वक वही उत्तर दिया। अब बात मलूकदास को लग गई। पहुंच गए जंगल में और एक घने पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठ गए। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे। कंटीली झाड़ियां थीं। जंगल दूर-दूर तक फैला हुआ था। धीरे धीरे खिसकता हुआ सूर्य पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छिप गया। चारों तरफ अंधेरा फ...

गोवर्धन पूजा

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  गोवर्धन पूजा  गोवर्धन पूजा का त्यौहार, उस दिन मनाया जाता है, जिस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था। दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में बहुत महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। इस पर्व का श्रीमद्भावत में प्रसंग है।  गोवर्धन पूजा में गोधन अर्थात गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती है, जैसे नदियों में गङ्गा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। ऐसे गौ सम्पूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की। गोवर्धन पूजा की झलक जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को...

कान्हा का ऐश्वर्ये दर्शन

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  कान्हा का ऐश्वर्ये दर्शन भगवान प्रतिदिन गोपियों के यहाँ माखन चुराने पधारते हैं, लेकिन आज भगवान का मन खेलने में नहीं है। भगवान बोले कि माखन तो बहुत खायो है और अंदर से पेट भी चिकनो हो गयो है।  जैसी सफाई मिट्टी से हो सकती है और किसी चीज से नहीं हो सकती। भगवान ने मिट्टी उठा कर मुँह में रख ली।  भगवान को मिट्टी खाते हुए श्रीदामा  ने देख लिए और बोले कि क्यों रे कनवा! तूने मिट्टी खाई?  भगवान ने नहीं में गर्दन हिला दी... श्रीदामा ने फिर पूछा, तो भगवान ने फिर से ना में गर्दन हिला कर जवाब दिया।  श्रीदामा ने कहा कि इसे आज मैया के पास ले चलो। पहले ये माखन चुरा कर खाता था और अब मिट्टी भी खाने लगा है। तो दो सखाओ ने भगवान के हस्त कमल पकडे और दो सखाओ ने चरण कमल पकडे और डंडा डोली (झूला झुलाते हुए) करते हुए ले के माँ के पास गए और मैया के पास जाकर बोले- तेरे लाला ने माटी खाई.... यशोदा सुन माई .... सुनत ही माटी को नाम ब्रजरानी दौड़ आई और पकड़ हरी को हाथ, कैसे तूने माटी खाई ? तो तुनक तुनक तुतलाय के... हूँ बोले श्याम... मैंने नाही माटी खाई नाहक लगायो नाम। भगवान कहते हैं - मैया! म...

दो दीपक - संतोष और संतुलन

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  दो दीपक - संतोष और संतुलन  एक बार की बात है, हिमालय की गोद में बसे एक छोटे से गाँव में आदित्य नाम का युवक रहता था। वह बहुत महत्वाकांक्षी था। हमेशा कुछ पाने की दौड़ में लगा रहता। कभी धन, कभी पद, कभी नाम। हर सफलता के बाद भी उसके भीतर खालीपन बना रहता। एक दिन थका-हारा वह एक साधु के पास पहुँचा और बोला - गुरुदेव! मुझे बताइए, जीवन में सुख और शांति कहाँ मिलती है? मैंने सब कुछ पा लिया, पर मन शांत नहीं होता। साधु मुस्कुराए। उन्होंने उसे दो दीपक दिए और बोले - इनमें से एक है संतोष का दीपक, और दूसरा संतुलन का दीपक। इन दोनों को अपने जीवन में जलाए रखो, फिर देखो क्या होता है।” आदित्य ने पूछा, “गुरुदेव! क्या इससे मेरा दुःख मिट जाएगा?  साधु बोल,े “दुःख नहीं मिटेगा, पर तुम दुःख के पार देख सकोगे। वह दोनों दीपक लेकर लौटा। पहले दिन उसने तय किया कि जो कुछ उसके पास है, वही पर्याप्त है। उसने उस दिन कोई नई चाह नहीं रखी। उसके भीतर पहली बार एक हल्की सी शांति उतरी। यह था संतोष का दीपक जलना। फिर दूसरे दिन उसने कोशिश की कि जो भी स्थिति आए, वह समान मन से स्वीकार करे। किसी की प्रशंसा पर न उछले, आलोचना प...

बिरजू

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 बिरजू  बिरजू आज बहुत खुश हो रहा था क्योंकि उसकी सालों की ख्वाहिश आज पूरी होने वाली जो थी । बचपन से उसका सपना था, एक दिन वह भी किसी हीरो की तरह अपनी बाइक चलाते हुए यहां वहां आए जाए।  पढ़ाई के बाद दो शिफ्टों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर और कुछ अपनी जेब खर्च बचाते हुए लगभग बारह महीने में उसने दस हजार रुपए इकट्ठा कर लिए थे । उसने अपने कुछ दोस्तों को बाइक की खरीदारी के बारे में कहा था जो दस हजार रुपए तक आ जाए। ,कल ही उसके एक दोस्त ने बताया था कि भाई! एक अच्छी बाइक है और बजट भी तेरे मनमुताबिक है। बस! उसने ठान लिया था कि आज वो बाइक लाकर सबको चौंका देगा। सब उसे हीरो जैसे देखेंगे अचम्भित होकर। बस! इसीलिए आज वह बहुत खुश हो रहा था। उसे याद है कि उसने एक दो बार अपने पिताजी से अपनी ख्वाहिश बताई थी। अमूमन घर के इकलौते बेटे की सभी इच्छाएं उसके पिता पूरी करते हैं। ऐसा उसने अपने दोस्तों के साथ होते हुए देखा भी था। मगर उसके पिताजी ... तुम्हारी पढ़ाई पूरी करवा रहा हूं, बहुत है। मेरी हैसीयत इतनी ही है। ऐसे महंगे शौक पूरे करने हैं तो खुद कमाओ। तुम्हारी एक छोटी बहन भी है। उसकी शादी भी करनी है मुझ...

आसरा इक परमात्मा का

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  आसरा इक परमात्मा का   ऋषिकेश में गंगा जी के किनारे एक संत रहा करते। वह जन्मांध थे और उनका नित्य का एक नियम था कि वह शाम के समय ऊपर गगन चुंबी पहाड़ों में भ्रमण करने के लिये निकल जाते और हरि नाम का संकीर्तन करते जाते। एक दिन उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा - बाबा! आप हर रोज इतने ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर भ्रमण हेतु जाते हैं। वहां बहुत गहरी-गहरी खाइयां भी हैं और आपको आंखों से दिखलाई नहीं देता। क्या आपको डर नहीं लगता? अगर कभी पांव लड़खड़ा गये तो ? बाबा ने कुछ नहीं कहा और शाम के समय शिष्य को साथ ले चले। पहाड़ों के मध्य थे तो बाबा ने शिष्य से कहा - जैसे ही कोई गहरी खाई आये तो बताना। दोनों चलते रहे और जैसे ही गहरी खाई आयी, शिष्य ने बताया कि बाबा गहरी खाई आ चुकी है। बाबा ने कहा - मुझे इसमें धक्का दे दे।  अब तो शिष्य इतना सुनते ही सकपका गया। उसने कहा - बाबा! मैं आपको धक्का कैसे दे सकता हूँ? मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता। आप तो मेरे गुरुदेव हैं। मैं तो किसी अपने शत्रु को भी इस खाई में नहीं धकेल सकता।  बाबा ने फिर कहा - मैं कहता हूं कि मुझे इस खाई में धक्का दे दो। यह मेरी आज्ञा है और मेरी आज्ञ...

सुदामा को ग़रीबी क्यों मिली...?

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  सुदामा को ग़रीबी क्यों मिली...? आज तक आपको ये जानकारी नही होगी कि सुदामा जी गरीब थे तो क्यों? अगर अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो सुदामा जी धर्म के बहुत धनवान थे। जितना धन उनके पास था, किसी के पास नही था। लेकिन अगर भौतिक दृष्टि से देखा जाये तो सुदामाजी बहुत निर्धन थे। आखिर क्यों.............? एक ब्राह्मणी थी जो बहुत निर्धन थी। भिक्षा माँग कर जीवन यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिक्षा नही मिली। वह प्रतिदिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी। छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चने मिले, कुटिया पर पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी। ब्राह्मणी ने सोचा - अब ये चने रात में नहीं खाऊँगी, प्रातःकाल वासुदेव को भोग लगाकर तब खाऊँगी । यह सोचकर ब्राह्मणी ने चनों को कपडे में बाँधकर रख दिया। और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी...! देखिये समय का खेल. ...कहते हैं........ पुरुष बली नहीं होत है! समय होत बलवान!! ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया में आ गये... इधर उधर बहुत ढूँढा चोरों को वह चने की बँधी पोटली मिल गयी। चोरों ने समझा कि इसमे सोने के सिक्के हैं। इ...

मधुर व्यवहार

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  मधुर व्यवहार  एक राजा ने सपने में देखा, उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है। सुबह हुई राजा सोकर उठा और सपने की बात पर सोचने लगा कि अपनी आत्म रक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? सोचते-सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया। शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शैया तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें। रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख-देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसा...

माता कैकयी

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  माता कैकयी  माता कैकयी के लिए धारणा बदलिए आप... अध्यात्म रामायण कहती है कि एक रात जब माता कैकेयी सोती हैं, तो उनके स्वप्न में विप्र, धेनु, सुर, संत सब एक साथ हाथ जोड़ कर आते हैं और उनसे कहते हैं कि ‘हे माता कैकेयी, हम सब आपकी शरण में हैं। महाराजा दशरथ की बुद्धि जड़ हो गयी है। तभी वे राम को राजा का पद दे रहे हैं। अगर प्रभु राजगद्दी पर बैठ गए, तब उनके अवतार लेने का मूल कारण ही नष्ट हो जायेगा। माता, सम्पूर्ण पृथ्वी पर सिर्फ आप में ही यह साहस है कि आप राम से जुड़े अपयश का विष पी सकती हैं। कृपया प्रभु को जंगल भेज कर सुलभ करिये, युगों-युगों से कई लोग उद्धार होने की प्रतीक्षा में हैं। त्रिलोक स्वामी का उद्देश्य भूलोक का राजा बनना नहीं है। अगर वनवास न हुआ, तो राम इस लोक के ’प्रभु’ न हो पाएंगे, माता।’ यह कहते-कहते देवता घुटनों पर आ गए। माता कैकेयी की आँखों से आँसू बहने लगे। माता बोलीं - ’आने वाले युगों में लोग कहेंगे कि मैंने भरत के लिए राम को छोड़ दिया लेकिन असल में मैं राम के लिए आज भरत का त्याग कर रही हूँ। मुझे मालूम है इस निर्णय के बाद भरत मुझे कभी स्वीकार नहीं करेगा।’ रामचरित मानस म...

पापी कौन?

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 पापी कौन? एक बार मैं किसी काम से बस द्वारा सफर कर रहा था। 12-13 घण्टे का लंबा सफर था। बात उस जमाने की है, जब राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई-कई किलोमीटर तक कोई आबादी नही मिलती थी। हमारी बस शाम को चली। रात भर सफर करके दूसरे दिन हमें गन्तव्य तक पहुँचना था। 2-3 घण्टे के सफर के बाद ही बारिश चालू हो गयी। धीरे-धीरे बारिश तेज तूफान का रूप लेती चली गयी। जैसे-जैसे समय बढ़ रहा था, तूफान बढ़ रहा था, बिजली चमक रही थी। उस तेज बारिश तूफानी रात में बस में बैठे सभी लोग घबरा रहे थे और वे तरह-तरह की बातें करने लगे। फिर बिजली कई बार बस के आसपास ही गिरने लगी, जिसके कारण बस में बैठे लोगों की चर्चा और तेज हो गयी कि जरूर इस बस में कोई पापी व्यक्ति बैठा है, जिसकी वजह से बिजली उसके ऊपर गिरने के लिये बस के आस पास ही गिर रही है, कुछ लोग चिल्लाने लगे कि  ढूंढो उस व्यक्ति को, निकालो उसे बस से, नहीं तो हम सब मारे जाएंगे। बहुत सारे तेज तर्रार लोग थे, कुछ अच्छे सम्पन्न दिखने वाले भी। आखिरकार उन चिल्लाने वाले लोगों की टोली ने एक व्यक्ति को चुना। वह एक बहुत गरीब-सी दिखने वाली बुढ़िया थी। सब लोग उसी पर चीखने चिल्लाने लग...

सत्यवान व सावित्री

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  सत्यवान व सावित्री    भद्र देश के एक राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रति दिन एक लाख आहुतियाँ दीं। 18 वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर वर दिया कि राजन्! तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। सावित्री देवी की कृपा से जन्म लेने के कारण से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देख कर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा कि हे राजन्! यह क्या कर रहे हैं आप? सत्यवान गुणवान हैं, धर्मात्मा हैं और बलवान भी हैं, पर उसकी आयु बहुत छोटी है, वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी।  ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा ...

दान देने से पहले

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  दान देने से पहले दान देने से पहले जरा सोच लें।  दान करना हमारे समाज में अति शुभ माना गया है, लेकिन कई बार यह दान दुःख का कारण भी बन जाता है। हमारे आसपास ऐसे कई व्यक्ति है जो ज्यादा दान, ज्यादा धर्म में लीन रहते है। फिर भी कष्ट उनका व उनके परिवार का पीछा नहीं छोड़ता। तब हम अपने को सांत्वना स्वरूप यह कह कर संतोष करते है कि भगवान शायद हमारी परीक्षा ले रहा है। अरे भाई! भगवान कोई तुम्हारी परीक्षा वगैरह नहीं ले रहा, बल्कि वह तो तुम्हारे ही कर्मो का फल तुम्हें दे रहा है। बहुत दान धर्म करने के बाद भी सुख नहीं मिलता क्योंकि तुम्हारे द्वारा दिया दान ही दुःख का कारण बन जाता है। एक समय की बात है। एक बार एक गरीब आदमी एक सेठ के पास जाता है और भोजन के लिए सहायता मांगता है। सेठ बहुत धर्मात्मा होता है। वह उसे पैसे देता है। पैसे लेकर व्यक्ति भोजन करता है और उसके पास कुछ पैसे बचते हैं, जिससे वह शराब पी लेता है। शराब पीकर घर जाता है और अपनी पत्नी को मारता है। पत्नी दुःखी होकर अपने दो बच्चों के साथ तालाब में कूद कर आत्म हत्या कर लेती है। कुछ समय बाद उस सेठ की भी असाध्य रोग से मृत्यु हो जाती है। ...