दो दीपक - संतोष और संतुलन

 दो दीपक - संतोष और संतुलन 

एक बार की बात है, हिमालय की गोद में बसे एक छोटे से गाँव में आदित्य नाम का युवक रहता था। वह बहुत महत्वाकांक्षी था। हमेशा कुछ पाने की दौड़ में लगा रहता। कभी धन, कभी पद, कभी नाम। हर सफलता के बाद भी उसके भीतर खालीपन बना रहता।

एक दिन थका-हारा वह एक साधु के पास पहुँचा और बोला - गुरुदेव! मुझे बताइए, जीवन में सुख और शांति कहाँ मिलती है? मैंने सब कुछ पा लिया, पर मन शांत नहीं होता।

साधु मुस्कुराए। उन्होंने उसे दो दीपक दिए और बोले - इनमें से एक है संतोष का दीपक, और दूसरा संतुलन का दीपक। इन दोनों को अपने जीवन में जलाए रखो, फिर देखो क्या होता है।”

आदित्य ने पूछा, “गुरुदेव! क्या इससे मेरा दुःख मिट जाएगा? 

साधु बोल,े “दुःख नहीं मिटेगा, पर तुम दुःख के पार देख सकोगे।

वह दोनों दीपक लेकर लौटा। पहले दिन उसने तय किया कि जो कुछ उसके पास है, वही पर्याप्त है। उसने उस दिन कोई नई चाह नहीं रखी। उसके भीतर पहली बार एक हल्की सी शांति उतरी। यह था संतोष का दीपक जलना।

फिर दूसरे दिन उसने कोशिश की कि जो भी स्थिति आए, वह समान मन से स्वीकार करे। किसी की प्रशंसा पर न उछले, आलोचना पर न टूटे। धीरे धीरे उसका मन स्थिर होने लगा।

यह था संतुलन का दीपक जलना।

महीने बीत गए। आदित्य का चेहरा अब शांत और स्थिर था। गाँव वाले हैरान थे। वही व्यक्ति जो कभी बेचैन रहता था, अब जैसे भीतर से किसी झील की तरह स्थिर हो गया था। एक दिन साधु फिर गाँव से गुजरे। उन्होंने पूछा, “आदित्य, अब कैसा लग रहा है?”

आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, गुरुदेव! अब समझ आया सुख किसी चीज़ में नहीं, उस दृष्टि में है जिससे हम उसे देखते हैं और शांति किसी स्थान में नहीं, उस स्वभाव में है जिसे हमने साध लिया है।”

साधु ने आशीर्वाद दिया, “बेटा! अब तुम्हारे दीपक बुझेंगे नहीं, क्योंकि अब वे भीतर जल रहे हैं।” 

सच्चा सुख पाने में नहीं, समझने में है। सच्ची शांति स्थिरता में नहीं, संतुलन में है। जो इन दोनों दीपों को अपने भीतर जला ले, वही जीवन के असली अर्थ को जान पाता है। 

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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