मन का दर्पण

 मन का दर्पण 


शहर के प्रतिष्ठित विद्यालय में अध्यापक थे राजीव सर। पढ़ाने में निपुण वक्ता शानदार और हर छात्र के प्रिय। पर उनके भीतर एक अदृश्य जाल था अमर्ष (आवेश या असहिष्णुता) का। उन्हें बुरा लगता अगर किसी ने उनके विचारों पर सवाल उठाया। उन्हें खिन्नता होती अगर कोई उनकी प्रशंसा न करे। धीरे धीरे उनका सम्मान पाने का आग्रह ही उनका सबसे बड़ा बोझ बन गया।

एक दिन विद्यालय में नए शिक्षक विवेक की नियुक्ति हुई। विवेक शांत, सरल और सदा मुस्कुराने वाले व्यक्ति थे। वे छात्रों के साथ सहजता से घुल मिल जाते। धीरे-धीरे विद्यार्थी उन्हें भी पसंद करने लगे। राजीव सर के मन में खटास भरने लगी। इतनी जल्दी कैसे सबका प्रिय बन गया यह? सालों से मैं यहाँ हूँ, किसी ने मेरे लिए ऐसा नहीं कहा! उनके मन का अहंकार तिलमिलाया।

अगले हफ्ते विद्यालय में एक कार्यक्रम था श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान समारोह। राजीव सर को पूरा विश्वास था कि यह पुरस्कार उन्हें ही मिलेगा। लेकिन मंच पर नाम पुकारा गया श्री विवेक शर्मा। तालियाँ बजीं, और राजीव सर के भीतर अमर्ष का ज्वालामुखी फूट पड़ा। चेहरे पर मुस्कान थी, पर भीतर जलन की आग थी।

कार्यक्रम के बाद उन्होंने विवेक से औपचारिक मुस्कान के साथ कहा - बधाई हो, विवेक! लगता है अब अनुभव से ज्यादा लोकप्रियता काम आ रही है।

विवेक ने विनम्रता से कहा, “धन्यवाद, सर! पर आपका मार्गदर्शन ही मेरी असली प्रेरणा है। राजीव सर कुछ कह नहीं पाए। पर भीतर से आवाज आई क्या सच में मैं दूसरों की नजरों का मोहताज बन गया हूँ?

रातभर उन्हें नींद नहीं आई। अपने मन के द्वंद्व को शांत करने के लिए उन्होंने अगले दिन अपने गुरु शास्त्री जी से भेंट की। शास्त्री जी ने मुस्कुराकर कहा, राजीव! सम्मान माँगने से नहीं बाँटने से मिलता है। जो दूसरों की प्रशंसा से अपने मूल्य का निर्धारण करता है, वह गुलाम है दूसरों के मुख का। जो अपने कर्म से तृप्त है, वही सच्चा स्वतंत्र है।

राजीव सर ने सिर झुका लिया। उन्हें समझ आ गया कि उनके भीतर की खिन्नता, अमर्ष ही उनके सुख का सबसे बड़ा शत्रु है। उस दिन से उन्होंने अपने व्यवहार में परिवर्तन किया। विवेक को सहयोग देना शुरू किया, छात्रों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग का भाव जगाने लगे।

कुछ महीनों बाद विद्यालय की दीवार पर एक नया बोर्ड लगा- राजीव सर जीवन प्रेरक पुरस्कार। अब सम्मान उन्हें नहीं उनके आचरण को मिलने लगा था। उन्होंने मुस्कुराते हुए सोचा - अब मैं दूसरों की नजरों से नहीं अपनी आत्मा की नजर से जीता हूँ।

सच्चा सम्मान वही है जो भीतर की शांति से जन्मे, न कि बाहरी ताली से। अमर्ष मन की वह दीवार है जो आत्मा को बंधक बना देती है। जो इससे मुक्त हुआ, वही सच्चे अर्थों में आज़ाद है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 



Comments

  1. ATI Sundar lekh sabhi ko isase Shiksha leni chahie..
    Vijay Jain Bhopal

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