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Showing posts from November, 2025

भक्त पर कृपा

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  भक्त पर कृपा एक गाँव में भगवान शिव का परमभक्त एक ब्राह्मण रहता था। पंडितजी जब तक प्रतिदिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर नित्यकर्मो से निवृत होने के पश्चात् भगवान शंकर का पूजन नहीं कर लेते, तब तक उन्हें चैन नहीं पड़ता था। जो कुछ भी दान दक्षिणा में आ जाता, उसी से पंडित जी अपना गुजारा करते थे और दयालु इतने थे कि जब भी कोई जरूरतमंद मिल जाता, अपनी क्षमता के अनुसार उसकी सेवा ज़रूर करते थे। इसी कारण शिव के वह परमभक्त ब्राह्मण गरीबी का जीवन व्यतीत कर रहे थे। पंडितजी की इस दानी प्रवृति से उनकी पत्नी उनसे चिढ़ती तो थी, किन्तु उनकी भक्ति परायणता को देख उनसे अत्यधिक प्रेम भी करती थी। इसलिए वह कभी भी उनका अपमान नहीं करती थी। साथ ही अपनी ज़रूरत का धन वह आस-पड़ोस में मजदूरी करके जुटा लेती थी। एक समय ऐसा आया, जब मन्दिर में दान-दक्षिणा कम आने लगी, जिससे पंडित जी को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। घर की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होने के कारण ब्राह्मणी दुःखी रहने लगी। महाशिवरात्रि का दिन आया। उस दिन भी पंडित जी हमेशा की तरह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर नित्यकर्मो से निवृत होने के लिए नदी की ओर चल दिए। संयोग ...

धीरे चलो

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  धीरे चलो नदी के तट पर एक भिक्षु ने वहां बैठे एक वृद्ध से पूछा - यहां से नगर कितनी दूर है? सुना है कि सूरज ढलते ही नगर का द्वार बंद हो जाता है। अब तो शाम होने ही वाली है। क्या मैं वहां पहुंच जाऊंगा? वृद्ध ने कहा - धीरे चलो तो पहुंच भी सकते हो।  भिक्षु यह सुनकर हैरत में पड़ गया। वह सोचने लगा कि लोग कहते हैं कि जल्दी से जाओ, पर यह तो विपरीत बात कह रहा है। भिक्षु ने उसकीबात पर ध्यान नहीं दिया और तेजी से भागा। लेकिन रास्ता ऊबड़-खाबड़ और पथरीला था। थोड़ी देर बाद ही भिक्षु लड़खड़ाकर गिर पड़ा। किसी तरह वह उठ तो गया लेकिन दर्द से परेशान था। उसे चलने में काफी दिक्कत हो रही थी। वह किसी तरह आगे बढ़ा लेकिन तब तक अंधेरा हो गया। उस समय वह नगर से थोड़ी ही दूर पर था। उसने देखा कि दरवाजा बंद हो रहा है। उसके ठीक पास से एक व्यक्ति गुजर रहा था। उसने भिक्षु को लड़खड़ाते हुए देखा तो हंसने लगा। भिक्षु ने नाराज होकर कहा -तुम हंस क्यों रहे हो? उस व्यक्ति ने कहा - आज आपकी जो हालत हुई है, वह कभी मेरी भी हुई थी। आप भी उन बाबा जी की बात नहीं समझ पाए जो नदी किनारे रहते हैं। भिक्षु की उत्सुकता बढ़ गई। उसने पूछा - साफ ...

मानवता की सेवा

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  मानवता की सेवा संत फ्रांसिस युवावस्था से ही परोपकार और दुःखियों की सेवा में लगे रहते थे। उनके पिता कपड़े की दुकान करते थे। फ्रांसिस को भी दुकान में उनका हाथ बंटाना होता था । वे मौका लगते ही दुकान से कपड़े उठाकर गरीबों को दे देते थे।  एक बार एक अनाथ आश्रम को उन्होंने कपड़े की पूरी गांठ ही दे दी। जब उनके पिता के एक मित्र को इसका पता चला तो वह बहुत खिन्न हुए। वह तुरंत फ्रांसिस के पिता के पास पहुंचे। उनकी शिकायत करते हुए कहा - तुम्हारा बेटा तो दुकान का दिवाला निकाल देगा। वह जिसे चाहे उसे कपड़े की गांठ निकालकर सौंप देता है या नगदी दे देता है। उनके पिता ने संत फ्रांसिस को डांट लगाई और चेतावनी दी कि यदि आगे से धन-दौलत या कपड़ा लुटाया, तो मैं तुम्हें अपनी संपत्ति से बेदखल कर दूंगा।  फ्रांसिस ने उत्तर दिया - पिताजी, मैं ऐसी संपत्ति लेकर क्या करूगां, जो दीन-दुःखियों के काम न आ सके। वैसे भी मैंने मानवता की सेवा का व्रत ले रखा है। यह कहकर उन्होंने तत्काल घर छोड़ दिया और पूरी तरह पीड़ितों उपेक्षितों की सेवा में लग गए। ऐसे थे संत फ्रांसिस और ऐसी थी उनकी मानवता की सेवा।। -- सरिता जैन से...

मिट्टी का प्रभाव

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  मिट्टी का प्रभाव    जिस भूमि में जैसे कर्म किए जाते हैं, वैसे ही संस्कार वह भूमि भी प्राप्त कर लेती है। इसलिए गृहस्थ को अपना घर सदैव पवित्र रखना चाहिए। मार्कण्डेय पुराण मेँ एक कथा आती है जब राम, लक्ष्मण, सीता जब वन में प्रवास कर रहे थे। मार्ग में एक स्थान पर लक्ष्मण का मन कुभाव से भर गया। उनकी मति भ्रष्ट हो गयी।  वे सोचने लगे - माता कैकेयी ने तो वनवास राम को दिया है, मुझे नहीं। मैं राम की सेवा के लिए कष्ट क्यों उठाऊँ? राम जी ने लक्ष्मण से कहा - लक्ष्मण! इस स्थल की मिट्टी अच्छी दिखती है, थोड़ी बाँध लो। लक्ष्मण ने एक पोटली बना ली। मार्ग में जब तक लक्ष्मण उस पोटली को लेकर चलते रहे, तब तक उनके मन में कुभाव ही बना रहता था। किन्तु..जैसे ही रात्रि में विश्राम के लिए उस पोटली को नीचे रखते, उनका मन राम-सीता के लिए ममता और भक्ति से भर जाता था। 2-3 दिन तक यही क्रम चलता रहा। जब कुछ समझ नहीं आया तो लक्ष्मण ने इसका कारण राम जी से पूछा। श्रीराम ने कारण बताते हुए कहा - भाई! तुम्हारे मन के इस परिवर्तन के लिए दोष तुम्हारा नहीं, बल्कि उस मिट्टी का प्रभाव है।  जिस भूमि पर जैसे काम...

बेटी की ममता

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  बेटी की ममता  आज दोपहर मैं जैसे ही खाना खाने घर पहुँचा, तो देखा कि मेरी छोटी-सी बेटी ज़मीन पर बैठी थी और उसकी गुल्लक टूटी पड़ी थी। उसके हाथों में उसका दुपट्टा था, जिसमें वह टूटे गुल्लक के सिक्के और नोट समेट रही थी। मैंने ज़़रा हैरानी से पूछा, “बिटिया! तुमने यह गुल्लक क्यों तोड़ दी?“ सवाल सुनते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह दौड़कर मेरे गले लग गई और फूट-फूटकर रोने लगी। “पापा... !चाची बहुत बीमार हैं...। उन्हें तेज़ बुखार है...। वे दर्द से कराह रही हैं और चाचा काम पर गए हैं। मैंने सोचा कि इन्हीं पैसों से डॉक्टर अंकल को बुला लूं।“ उसकी मासूमियत देखकर मैं कुछ पल स्तब्ध रह गया। मेरी आँखें भर आईं। फिर मैंने धीरे से कहा, “बिटिया...! चाची से तो तुम्हारी मम्मी का झगड़ा चल रहा है न...! तुम उनके लिए क्यों परेशान हो रही हो?“ उसने अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों से मेरी ओर देखा और बोली, “पापा! मम्मी और चाची का झगड़ा है न!... मेरा तो नहीं है।“ उस पल जैसे मेरे भीतर कुछ टूट गया। मैंने तुरंत छोटे भाई को फोन लगाया। वह बोला कि मैं तो शाम तक ही आ पाऊँगा। मैंने बिना देर किए डॉक्टर साहब को बुलाया और बिटिया क...

मृग मरीचिका

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  मृग मरीचिका   मैंने एक कथा सुनी है। एक आदमी को शिव की पूजा करते-करते और रोज एक ही धुन, एक ही रट कि हे प्रभु! कुछ ऐसी चीजें दे दो कि जिंदगी में मजा आ जाए। एक ही बार मांगता हूं। मगर देना कुछ ऐसा कि फिर मांगने को ही न रह जाए।  आखिर शिव ने इसे वरदान में एक शंख उठाकर दे दिया, जो उन्हीं के पूजा स्थल में इसने रख छोड़ा था और इसको कहा - इस शंख की आज से यह खूबी है कि तुम इससे जो मांगोगे, यह तुम्हें देगा। अब तुम्हें कुछ और मांगने के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं और पूजा प्रार्थना की जरूरत नहीं। अब मुझे छुट्टी दो। जो तुम्हें चाहिए,वह इससे ही मांग लेना। यह तत्क्षण देगा। तुमने मांगा और मौजूद हुआ।  उसने मांगकर देखा, ‘सोने के सिक्के’ और सोने के सिक्के बरस गए। वह धन्य भाग हो गया। शिव कहां गए, क्या हुआ, इस सब की कोई फिकर भी न रही। फिर न कोई पूजा थी, न कोई पाठ। फिर तो यह शंख था और जो चाहिए, वह वस्तु थी। लेकिन एक मुसीबत हो गई। एक दिन एक महात्मा इसके महल में मेहमान हुए। महात्मा के पास भी एक शंख था। इसके पास जो शंख था, बिल्कुल वैसा ही, लेकिन दो गुना बड़ा। और महात्मा उसे बड़े संभाल कर ...

पापा का संघर्ष

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 पापा का संघर्ष    पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा.... छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया... अब फाइनल इंटरव्यू कंपनी के डायरेक्टर को लेना था...और डायरेक्टर को ही तय करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं... डायरेक्टर ने छात्र का C.V. (curricular vitae) देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ यह छात्र E.C.(extra curricular activities) में भी हमेशा अव्वल रहा... डायरेक्टर- “क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान कभी छात्रवृत्ति (scholarship) मिली...?” छात्र- “जी नहीं...” डायरेक्टर- “इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे..” छात्र- “जी हाँ , श्रीमान ।” डायरेक्टर- “तुम्हारे पिताजी क्या काम करते है?” छात्र- “जी! वो लोगों के कपड़े धोते हैं..” यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- “ज़रा अपने हाथ तो दिखाना...” छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे... डायरेक्टर- “क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की...?” छात्र- “जी नहीं, मेरे पिता हमेशा यही चाहते थे कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़...

संगत का प्रभाव

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  संगत का प्रभाव   दो मित्र थे, एक सज्जन और दूसरा जरा दुर्जन ( बदमाश ) किस्म का। सज्जन संत हो गए, प्रखर वक्ता के रूप में पूजे जाने लगे। दूसरा मित्र इधर उधर चोरी चकारी, हाथ की सफाई कर अपना जीवन यापन करने लगा।  एक दिन संत अपने गृह नगर आए। प्रवचन के लिए विशाल काय पंडाल बना। बदमाश भी प्रवचन सुनने पहुंच गया। संत ने मित्र को देखते ही पहचान लिया। प्रवचन शुरू हुआ। सभी मंत्रमुग्ध थे। तालियां गूंजने लगी। अंत में संत ने कहा कि यह शहर मेरी जन्म भूमि है, मैं चाहता हूं कि यहां दस लाख की लागत का एक अस्पताल बने और यह राशि इसी पंडाल से एकत्र करना है। एक टोकनी आपके पास आयेगी, जिसकी जितनी श्रद्धा हो राशि डालते जाएं। संत के शातिर मित्र ने भी दान देने की भावना के साथ दस हजार निकाल कर हाथ में रख लिए। लोग मुक्त हस्त से दान देने लगे। दो लाख, पांच लाख, दस लाख, एकत्र हो गए टोकनी अभी लोगों के पास घूम ही रही थी।  संत के मित्र ने सोचा - जब इतने पैसे इक्कठे हो ही गए हैं, तो मेरी छोटी-सी राशि का क्या महत्व? उसने चुपचाप दस हजार की जगह हाथ में पांच हजार रख लिए। टोकनी में पंद्रह लाख एकत्र हो गए तो उस...

सुंदरकांड

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  सुंदरकांड  सुंदरकांड में एक प्रसंग है.....!! “मैं न होता, तो क्या होता?” “अशोक वाटिका“ में  जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर, इसका सर काट लेना चाहिये। किन्तु, अगले ही क्षण, उन्होंने देखा कि “मंदोदरी“ ने रावण का हाथ पकड़ लिया! यह देखकर वे गद्गद् हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बढ़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता, तो सीता जी को कौन बचाता? बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है कि मैं न होता, तो क्या होता ?  परन्तु यह क्या हुआ? सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं। आगे चलकर जब “त्रिजटा“ ने कहा कि “लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!“ तो हनुमान जी बहुत चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा! जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमा...

संतान का रहस्य

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  संतान का रहस्य  राजस्थान के छोटे से गाँव सीकरपुर में हरिदास नाम का एक वृद्ध रहता था। जीवन भर उसने सत्य धर्म और सेवा का पालन किया था। उसके घर में सब कुछ था। धन, सम्मान, गौएं, खेत, पर एक बात की कमी थी, संतान की। हरिदास और उसकी पत्नी सावित्री ने अनेक तीर्थ किए, दान पुण्य किया, परंतु उन्हें कोई संतान न मिली। एक दिन गाँव में एक संत आए। हरिदास ने आदर पूर्वक उनका स्वागत किया और कहा - गुरुदेव! मैंने जीवन भर कोई अधर्म नहीं किया, फिर भी संतान के सुख का नवनीत मुझे क्यों नहीं मिला? संत मुस्कराए और बोले -  हरिदास! सब कुछ कर्मों से बंधा है। जो इस जन्म में मिलता है, वह पूर्व जन्मों के कर्मों का फल होता है। तुम्हारी संतान भी तभी आएगी, जब उसका तुम्हारे साथ कोई ऋण या संबंध होगा। हरिदास ने जिज्ञासु होकर पूछा - कैसा संबंध, गुरुदेव? संत ने कहा शास्त्रों में चार प्रकार की संतान बताई गई है  ऋणानुबंध, शत्रु, उदासीन और सेवक पुत्र। यदि तुमने किसी का धन लिया था, तो वह संतान बनकर तुमसे अपना हक लेगा। यदि किसी जीव को सताया था, तो वह तुम्हें दुख देकर बदला लेगा। यदि तुमने किसी की सेवा नहीं की, तो...

सूर्य आराधना का फल

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  सूर्य आराधना का फल   महाराज सत्राजित का भगवान भास्कर में स्वाभाविक अनुराग था। उनके नेत्र-कमल तो केवल दिन में भगवान सूर्य पर टकटकी लगाये रहते हैं, किंतु सत्राजित की मन रूपी आंखें उन्हें दिन-रात निहारा करती थीं। भगवान सूर्य ने भी महाराज को निहाल कर रखा था। उन्होंने ऐसा राज्य दिया था, जिसे वे अपनी प्यार भरी आंखों से दिन-रात निहारा करते थे। इतना वैभव दे दिया था, जिसे देखकर सबको विस्मय होता था औऱ स्वयं महाराज भी विस्मित रहते थे। इसी विस्मय ने उनमें यह जिज्ञासा जगा दी थी कि ‘वह कौन सा पुण्य है जिसके कारण यह वैभव उन्हें मिला है। यदि उस पुण्य कर्म का पता लग जाएं तो उसका फिर से अनुष्ठान कर अगले जन्म में इस वैभव को स्थिर बना लिया जाए।’ उन्होंने ऋषि-मुनियों की एक सभा एकत्र की। महारानी विमलवती ने भी इस अवसर से लाभ उठाना चाहा। उन्होंने महाराज से कहा - नाथ! मैं भी जानना चाहती हूं कि मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, जिससे मैं आपकी पत्नी बन सकी हूं। महाराज ने सभा को संबोधित करते हुए कहा - पूज्य महर्षियों! मैं और मेरी पत्नी दोनों यह जानना चाहते हैं कि पूर्व जन्म में हम दोनों कौन थे और किस ...

विश्वास

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  विश्वास मशहूर सूफी संत उमर अपने पास आने वाले हर व्यक्ति की किसी न किसी रूप में परीक्षा लेते थे। वे ऐसे प्रश्न करते कि सामने वाला उलझन में पड़ जाता लेकिन उमर खुद ही उसका समाधान भी कर देते थे।  एक बार वह जंगल की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक चरवाहा मिला, जो बकरियां चरा रहा था। उमर उसके पास पहुंच गए और बोले, ‘एक बकरी मुझे दे दो।’ चरवाहे ने कहा कि वह उन्हें बकरी नहीं दे सकता क्योंकि उसका मालिक नाराज हो जाएगा। तब उमर ने कहा, ’अरे इतनी बकरियां हैं, एक कम हो भी गई तो मालिक को थोड़े ही पता चलेगा।’ चरवाहा बोला, ’मेरा मालिक तो यहां नही है, लेकिन जो सारी दुनिया का मालिक है, वह तो हमें देख रहा है। उसके विश्वास को मैं नहीं तोड़ सकता। मुझे माफ करें। मैं आपको बकरी नहीं दे सकता।’  उमर उससे बेहद प्रभावित हुए। वह उसके साथ उसके मालिक के पास पहुंचे। चरवाहा गुलाम था। उमर ने उसके मालिक से कहा, ‘तुमने इस नेक बंदे को गुलाम बनाकर गुनाह किया है।’  मालिक को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने चरवाहे को आजाद कर दिया और उसे ढेर सारे उपहार भी दिए।    -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्य...

सुपात्र को दान

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  सुपात्र को दान  यह महाभारत काल की कथा है। युद्ध समाप्त हो गया था। महाराज युधिष्ठिर ने दो अश्वमेघ यज्ञ किये। उन यज्ञों के बाद उन्होंने इतना दान किया कि उनकी ख्याति चारों दिशाओं मे फैल गयी। तीसरे यज्ञ के पूर्ण होने पर यज्ञशाला में एक अजीब सा नेवला आ गया जिसका आधा शरीर सुनहरा था। यज्ञभूमि में पहुँच कर नेवला यहाँ-वहाँ लोट-पोट होने लगा। कुछ देर वहाँ इस प्रकार लोट-पोट होने के बाद वह बड़ी कर्कश आवाज़़ में बोल पड़ा- ‘पाण्डवों! तुम्हारे यज्ञ का पुण्यफल तो कुरुक्षेत्र के एक ब्राह्मण के थोड़े से सत्तू के दान के समान भी नहीं है।’ लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे। एक स्वर में पूछा गया कि तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? यज्ञ के अतुलनीय दान की तुलना किसी सामान्य ब्राह्मण के थोड़े से सत्तु के साथ क्यों कर रहे हो?’ नेवले ने कहा - यदि आपको विश्वास न हो, तो मैं उस महादानी ब्राह्मण की कथा सुनाता हूँ। आप खुद ही फैसला कर लीजिए। कुरुक्षेत्र के एक गाँव में धर्मात्मा ब्राह्मण रहते थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी पुत्र और पुत्रवधु थी। वे पूजा-पाठ और कथा करते थे और उसी से अपनी तथा परिवार ...