बेटी की ममता
बेटी की ममता
आज दोपहर मैं जैसे ही खाना खाने घर पहुँचा, तो देखा कि मेरी छोटी-सी बेटी ज़मीन पर बैठी थी और उसकी गुल्लक टूटी पड़ी थी। उसके हाथों में उसका दुपट्टा था, जिसमें वह टूटे गुल्लक के सिक्के और नोट समेट रही थी।
मैंने ज़़रा हैरानी से पूछा, “बिटिया! तुमने यह गुल्लक क्यों तोड़ दी?“
सवाल सुनते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह दौड़कर मेरे गले लग गई और फूट-फूटकर रोने लगी।
“पापा... !चाची बहुत बीमार हैं...। उन्हें तेज़ बुखार है...। वे दर्द से कराह रही हैं और चाचा काम पर गए हैं। मैंने सोचा कि इन्हीं पैसों से डॉक्टर अंकल को बुला लूं।“
उसकी मासूमियत देखकर मैं कुछ पल स्तब्ध रह गया। मेरी आँखें भर आईं। फिर मैंने धीरे से कहा, “बिटिया...! चाची से तो तुम्हारी मम्मी का झगड़ा चल रहा है न...! तुम उनके लिए क्यों परेशान हो रही हो?“
उसने अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आँखों से मेरी ओर देखा और बोली, “पापा! मम्मी और चाची का झगड़ा है न!... मेरा तो नहीं है।“
उस पल जैसे मेरे भीतर कुछ टूट गया। मैंने तुरंत छोटे भाई को फोन लगाया। वह बोला कि मैं तो शाम तक ही आ पाऊँगा।
मैंने बिना देर किए डॉक्टर साहब को बुलाया और बिटिया की चाची का इलाज कराया।
जब मैं डॉक्टर को फीस देने लगा, तो मेरी बेटी सामने आकर बोली, “डॉक्टर अंकल! ये पैसे मत लीजिए...। आप ये पैसे ले लो। ये हमारी गुल्लक के पैसे हैं, इन्हीं से चाची का इलाज कर दीजिए।“
डॉक्टर साहब कुछ देर उसे देखते रहे और फिर मेरी ओर देखकर बोले, “भाई साहब! देखिए कैसी दयालू होती हैं बेटियाँ!“
उन्होंने मुझे पर्चा थमाते हुए कहा, “मुझे फीस नहीं चाहिए। हाँ! जब बिटिया की शादी हो, तो इन्हीं पैसों से मेरी तरफ से एक तोहफा ज़रूर ले लेना।“
मैं उनकी बात सुन कर स्तब्ध रह गया।
जिस समाज में लोग बेटों के लिए बेटियों का गर्भपात करवा देते हैं..., जहाँ बेटे बड़े होकर माँ-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं..., वहीं एक छोटी-सी बेटी आज मुझे ममता, मानवता और रिश्तों का असली अर्थ सिखा गई। रिश्ते लड़ाई से टूटते हैं और स्नेह से बनते हैं।
सीख - बेटियाँ केवल अपने घर की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की शान होती हैं। उनकी मासूमियत, संवेदनशीलता और ममता इंसानियत को जीवित रखती हैं। इसलिए -
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।
बेटी की सुरक्षा ही देश की रक्षा है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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