मानवता की सेवा

 मानवता की सेवा

संत फ्रांसिस युवावस्था से ही परोपकार और दुःखियों की सेवा में लगे रहते थे। उनके पिता कपड़े की दुकान करते थे। फ्रांसिस को भी दुकान में उनका हाथ बंटाना होता था । वे मौका लगते ही दुकान से कपड़े उठाकर गरीबों को दे देते थे। 

एक बार एक अनाथ आश्रम को उन्होंने कपड़े की पूरी गांठ ही दे दी। जब उनके पिता के एक मित्र को इसका पता चला तो वह बहुत खिन्न हुए। वह तुरंत फ्रांसिस के पिता के पास पहुंचे। उनकी शिकायत करते हुए कहा - तुम्हारा बेटा तो दुकान का दिवाला निकाल देगा। वह जिसे चाहे उसे कपड़े की गांठ निकालकर सौंप देता है या नगदी दे देता है।

उनके पिता ने संत फ्रांसिस को डांट लगाई और चेतावनी दी कि यदि आगे से धन-दौलत या कपड़ा लुटाया, तो मैं तुम्हें अपनी संपत्ति से बेदखल कर दूंगा। 

फ्रांसिस ने उत्तर दिया - पिताजी, मैं ऐसी संपत्ति लेकर क्या करूगां, जो दीन-दुःखियों के काम न आ सके। वैसे भी मैंने मानवता की सेवा का व्रत ले रखा है।

यह कहकर उन्होंने तत्काल घर छोड़ दिया और पूरी तरह पीड़ितों उपेक्षितों की सेवा में लग गए।

ऐसे थे संत फ्रांसिस और ऐसी थी उनकी मानवता की सेवा।।

--

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद। 

Comments

Popular posts from this blog

ईश्वर की कृपा

समर्पण भाव होना चाहिए

समस्या का सामना

चरणों की धूल

आधे रास्ते को मंजिल न समझें

एक बुढ़िया की रोचक कहानी

Y for Yourself

जो चाहोगे सो पाओगे

राजा मोरध्वज

जहाँ प्रेम वहीं ईश्वर