जीवन में संतुलन
जीवन में संतुलन
अंग्रेजी में कहावत है, 'Balance is bliss. जीवन आनंदमय तभी हो सकता है, जब जीवन के विभिन्न पहलुओं में संतुलन करते हुए चलें। निम्नलिखित दृष्टांत के द्वारा इस बात को समझा जा सकता है।
महात्मा बुद्ध के एक शिष्य थे - ’आनंद’। उन्होंने दीक्षा ग्रहण करते ही उग्र तपस्या शुरू कर दी। तपस्या में इतना लीन रहने लगे कि कुछ ही दिनों में उनका तन सूख कर कांटा सा हो गया। एक दिन अचानक महात्मा बुद्ध की नजर उनकी कृश काया पर पड़ी। बुद्ध ने आनंद को बुला कर कहा - “वत्स! तुम पहले बहुत अच्छी वीणा बजाते थे, आज मुझे वीणा पर एक राग सुनाइए।“
आनंद बोले - भंते! यह कैसे बजेगी? इसके तो सभी तार ढीले पड़े हुए हैं।
बुद्ध ने कहा - “लाओ, आनंद! मैं तारों को कस देता हूं, फिर तुम बजाना।“ जब दोबारा वीणा आनंद के हाथों में आई, तो आनंद उलझन में पड़ गए। बोले - भन्ते! अब भी यह नहीं बजेगी क्योंकि इसकी तारें बहुत ज्यादा कसी हुई हैं। बजाने का प्रयास करूंगा तो इसके तार टूट जाएंगे।
बुद्ध ने कहा - अच्छा! तुम स्वयं इसे ठीक कर लो, फिर बजाओ।
आनंद ने तार ठीक किये और वीणा बजाई। वादन क्रिया समाप्त होने पर बुद्ध ने आनंद से कहा - वीणा के तार ढीले थे, तो स्वर नहीं निकल रहा था और जब तार बहुत अधिक कस गए तो भी उन्हें बजाने के प्रयास में तार ही टूट जाते। यह जीवन भी वीणा की तरह है। जैसे वीणा के तार से स्वर तभी निकलेगा, जब उसे मध्य में रखा जाएगा। न बहुत ढीला, न बहुत तना हुआ। इसी प्रकार जीवन की वीणा से आनंद प्रेम सुख शांति के स्वर तभी झंकृत होंगे, जब जीवन में संतुलन होगा।
भाव यह है कि अपेक्षित परिणाम के लिए जीवन के विभिन्न पहलुओं में संतुलन एवं आदर्श होना आवश्यक है। आध्यात्मिकता में भी ज्ञान और योग का बैलेंस चाहिए। योग बल को बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन जिस शरीर के द्वारा हम यह पुरुषार्थ कर रहे हैं, उस का ध्यान रखना भी नितांत आवश्यक है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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