संस्कार की जड़ें
संस्कार की जड़ें
संस्कार ही वह वंशवृक्ष हैं, जिनकी जड़ों से पीढ़ियाँ पुष्पित-पल्लवित होती हैं।
इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पडा है,समय साक्षी है। एक और प्रसंग इसकी पुष्टि करता है।
पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के समय एक गाँव में गाय के दोनों सींग एक दीवार में फँस गये। लोग इकट्ठे हुए, कोई उपाय नहीं सूझा। सभी अपने अपने सुझाव दे रहे थे। तभी एक युवक बोला - सींग काट दो, गाय छूट जाएगी।
सब स्तब्ध रह गए! क्या यह समाधान है? अंततः मकान मालिक ने सोचा कि दीवार गिरा देते है, इससे गाय को बचा लेंगे और फ़िर ऐसा ही हुआ। घटना जब महाराज तक पहुँची, उन्होंने उस युवक को बुलाया। तू कौन है जिसने गाय के सींग काटने की बात कही? उसने अपना नाम बताया निहाल चंद पुत्र मानक चंद..
पर महाराजा को इसमें संदेह हुआ कि एक हिन्दू ऐसा कभी नहीं सोच सकता। जब जांच हुई, तो पता चला कि उसकी माँ ने एक मुस्लिम चरवाहे से संबंध बनाए थे और यही युवक उसका पुत्र था। राजा ने कहा - अब समझ आया। जिसके संस्कार की जड़ें इस मिट्टी में नहीं, उसकी सोच भी ऐसी ही होगी।
घटना एक ही सत्य का उद्घोष करती हैं - संस्कार रक्त में नहीं, विचार में प्रवाहित होते हैं। धन पद या रूप नहीं, व्यक्ति की पहचान उसके आचरण और संवेदन शीलता से होती है। आज भी गाँव नगरों में जब विवाह तय होते हैं, तो लोग पहले पूछते हैं, पता करते हैं, उसके खानदान का इतिहास टटोलते हैं?
परिवार की पृष्ठ भूमि क़्या है? किसी नें भाई के ऊपर कोर्ट कचहरी में मुकदमा तो नहीं कर रखा है, परस्पर बोलचाल तो बंद नहीं है, माता पिता के साथ व्यवहार तो अच्छा है? समाज और पास पडोस में प्रतिष्ठा है अथवा नहीं? और यह सब जानकारियाँ तय करती हैं कि लड़का, लड़की के संस्कार कैसे हैं?
क्योंकि संस्कार ही वे अदृश्य विरासत हैं, जो पीढ़ियों को आकार देती है। “संस्कार वे दीप हैं, जो पीढ़ियों के अंधकार में भी उजाला देते हैं। संतति का आचरण वही दिखाता है, जो घर की दीवारों ने सुना और माँ-पिता ने जिया।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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