उम्मीद का घोड़ा
उम्मीद का घोड़ा
बहुत समय पहले राजा विक्रमादित्य नामक एक न्याय प्रिय, किंतु कठोर राजा था। उसकी सेना और राज्य वैभव दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। लेकिन एक बात और थी जिसके लिए वह और भी अधिक जाना जाता था। वह अपने प्रिय सफेद घोड़े “चंद्रकेतु” से बहुत प्रेम करता था। कहते हैं, वह घोड़ा हवा से बात करता था, परंतु फिर भी उड़ नहीं सकता था।
एक दिन चोरी और साजिश के झूठे आरोप में दो नौजवान पकड़े गए- आरव और नील। अदालत ने दोनों को मृत्युदंड सुनाया। दोनों को एक साल बाद फाँसी दी जानी थी, लेकिन तभी आरव के मन में एक अनोखा विचार आया। जब राजा विक्रमादित्य ने उनसे पूछा कि आखिरी इच्छा क्या है, तो आरव ने झुककर कहा - महाराज! यदि आप मुझे एक वर्ष की मोहलत दें, तो मैं आपके प्रिय घोड़े ‘चंद्रकेतु’ को उड़ना सिखा दूँगा।
राजा के दरबार में सन्नाटा छा गया। सबको लगा कि यह युवक पागल हो गया है। मंत्री और सैनिक हँस पड़े। राजा ने आश्चर्य से पूछा - क्या सच में तुम यह कर सकते हो? आरव ने शांत स्वर में कहा, “प्रयास करने की अनुमति दीजिए, परिणाम भगवान पर छोड़ दीजिए।
राजा, जो अपने घोड़े से बेहद प्रेम करता था, यह सोचकर उत्साहित हो गया कि अगर यह सच हुआ, तो वह संसार का पहला व्यक्ति होगा जो उड़ने वाले घोड़े की सवारी करेगा। उसने आदेश दिया कि इस युवक को एक वर्ष का समय दिया जाता है। अगर घोड़ा उड़ना सीख गया तो इसे मुक्त कर दिया जाएगा, अन्यथा इसकी मृत्यु निश्चित होगी।”
जब आरव और नील को वापस जेल लाया गया, तो नील ने नाराज़ होकर कहा - तू पागल है, आरव! घोड़ा कभी उड़ नहीं सकता। तूने अपनी मौत को बस एक साल के लिए टाल दिया है आरव मुस्कुराया और बोला - नहीं मित्र, मैंने अपने लिए चार रास्ते खुले रखे हैं।
”चार रास्ते?” नील ने हैरानी से पूछा।
आरव बोला, ”पहला - हो सकता है एक साल में राजा की मृत्यु हो जाए, तब सजा बदल सकती है। दूसरा - शायद मैं ही मर जाऊँ और यह चिंता समाप्त हो जाए। तीसरा - संभव है कि घोड़ा मर जाए और तब मुझ पर कोई दोष नहीं रहेगा और चौथा - कौन जाने, शायद मैं सचमुच घोड़े को उड़ना सिखा दूँ!“
नील अवाक् रह गया। आरव ने धीरे से कहा - देखो, नील! जब तक सांस है, तब तक उम्मीद है। कौन जानता है कि भविष्य क्या मोड़ ले आए?
दिन बीतने लगे। आरव हर दिन घोड़े की देखभाल करने लगा। वह उससे बातें करता, उसे सहलाता और कभी-कभी अपनी बाँसुरी बजाता। धीरे धीरे चंद्रकेतु और आरव में एक अनोखा रिश्ता बन गया।
राजा को भी यह देखकर आश्चर्य होता था कि जहाँ बाकी लोग घोड़े के पास जाने से डरते थे, वहीं आरव उसके साथ खेलता, दौड़ता और गाता था। लोग मज़ाक उड़ाते थे - देखो उस मूर्ख कैदी को। उड़ना सिखा रहा है घोड़े को!
लेकिन आरव हर हँसी को अनसुना कर देता।
समय के साथ कई घटनाएँ घटित हुईं। राज्य में युद्ध हुआ, बारिशें कम हुईं और राजा बीमार पड़ गया। राजा ने जब अपनी स्थिति देखी, तो उसे याद आया आरव और उसका वादा। वह बोला अगर यह युवक मेरे घोड़े को उड़ना नहीं भी सिखा सका, तो भी उसने मेरे दिल को छू लिया है। राजा ने आदेश दिया कि आरव की सजा माफ़ कर दी जाए, क्योंकि उसमें उम्मीद की ताकत थी।
कुछ महीनों बाद राजा विक्रमादित्य का निधन हो गया। नया राजा बना उसका पुत्र, जो अपने पिता की दयालुता का प्रशंसक था। उसने एक जैसे अपराध में बंद आरव और नील को आज़ाद कर दिया। नील ने आँसू भरकर कहा - तू सही था, आरव! तेरी उम्मीद ने सचमुच चमत्कार कर दिखाया। घोड़ा तो नहीं उड़ा, लेकिन अपनी ज़िंदगी ज़रूर उड़ान भर गई।
आरव मुस्कुराया और बोला - देख, नील! ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम सोचते हैं। पर जो व्यक्ति आशा नहीं छोड़ता, वह हर परिस्थिति में रास्ता बना लेता है। जब तक जीवन है, संभावनाएँ हैं। कभी भी हार मानने से पहले सोचो कि शायद कल कुछ ऐसा घट जाए जो आज नामुमकिन लगता है।
उम्मीद ही वह घोड़ा है जो हमें अंधकार से उजाले तक ले जाता है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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