Control over impulses
अति आवेग
अति आवेग को नियंत्रित करो, अपनी मर्यादा (सीमा) और धैर्य को पहचानो।
Control over impulses, observe self-restraint and patience.
दैनिक जीवन में अपने आवेगों के पीछे मत भागो और कुछ भी कहना या करना शुरू न कर दो। ये केवल कमज़ोर मन के लक्षण हैं।
अपने मन पर नियंत्रण रखो, कभी इसके दास मत बनो। मन व इन्द्रियों को अपने नौकर की तरह काम करने दो और उन्हें कभी अपनी हदें पार करने की आज्ञा न दो। इन निम्न कोटि की भावनाओं पर तुम्हारी बुद्धि को चेतना के साथ अपना अधिपत्य बनाए रखना चाहिए।
कितना भी आवेग या उत्तेजना जो तुम्हारे अवचेतन मन में दबी हुई अवस्था में रहती है, उसे उसी पल मन व इन्द्रियों पर हावी न होने दो। पहले अच्छी तरह परख़ लो और तब उसके अनुसार कुछ समय के बाद उन पर प्रतिक्रिया करो या पूरी तरह उपेक्षा (ignore) कर दो। इस प्रकार धैर्य का अभ्यास करने से तुम्हारी इच्छा-शक्ति धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी, यह सफल जीवन के लिए एक आवश्यक नियम है।
रमेश और सुरेश बचपन के दोस्त थे, लेकिन स्वभाव में विपरीत। रमेश शांत और धैर्यवान, सुरेश उतावला और गुस्सैल। एक दिन रमेश ने सुरेश के लिए अपनी बचत से एक सुंदर घड़ी खरीदी, जो सुरेश हमेशा से चाहता था। रमेश ने घड़ी को एक छोटे डिब्बे में रखा और सुरेश के घर पहुँचा।
“यह तुम्हारे लिए है,“ रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा।
सुरेश ने डिब्बा झटके से छीना, खोला और घड़ी देखते ही उसकी आँखों में चमक आ गई। “वाह! कितनी सुंदर है!“
तभी, सुरेश की नज़र भी रमेश की पुरानी, घिसी हुई घड़ी पर पड़ी।
“यह घटिया घड़ी तुम कब से पहन रहे हो? मैं तुम्हें यह नई और अच्छी घड़ी देता हूँ,” सुरेश ने आवेग में आकर कहा और वह नई घड़ी रमेश की ओर बढ़ाई, “लो, यह तुम पहन लो।“
रमेश हैरान रह गया।
“पर सुरेश, यह तो तुम्हारे लिए...“
सुरेश ने उसे बीच में ही टोका, “अरे, तुम क्या समझोगे! तुम्हें तो हमेशा पुरानी चीज़ों से ही लगाव रहता है। ले लो और मुझे यह पुरानी बेकार की घड़ी दोबारा़ मत दिखाना।“
रमेश ने काँपते हाथों से घड़ी ली। उसके मन में आवेग की एक लहर उठी। उसे अपने दिए गए उपहार को वापिस लेना अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन उसने खुद को रोका। वह जानता था कि सुरेश की यह हरकत उसके स्वभाव का ही हिस्सा थी। वह चुपचाप घर लौट आया।
अगले दिन, सुरेश को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसकी नई घड़ी रमेश के हाथ में थी, पर वह दोस्त का प्यार और विश्वास खो चुका था। उसे समझ आया कि आवेग में आकर उसने न केवल दोस्त का दिल दुखाया, बल्कि एक प्रेम से भरा उपहार और मित्र के साथ अपने अनमोल रिश्ते को खो दिया। उस दिन उसे एहसास हुआ कि आवेग की आग में सब कुछ जल जाता है, सिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं बचता।
आवेग में लिया गया निर्णय या बोला गया शब्द रिश्ते और सम्मान को भारी नुकसान पहुँचा सकता है। क्षणिक भावनाएँ स्थायी रिश्तों पर भारी पड़ सकती हैं।
मन में कोई भी इच्छा होने पर उसको नियंत्रित करो। उदाहरण के लिए मान लो तुम्हारे मन में अचानक यह आ जाए कि तुम्हें गोलगप्पे या चाट खानी है तो इच्छा की इस अवस्था में तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं।
एक है उसी समय दौड़ो और अपनी इच्छा को सन्तुष्ट करो,
दूसरा है अपने मन को नियंत्रित करो और दिमाग़ से सोचो कि यह कितना युक्तिसंगत है कि इसी समय कुछ मील दूर जाया जाए और अपनी इच्छा को पूरा किया जाए। यदि तुम दूसरा उपाय अपनाते हो तो अपनी इच्छा-शक्ति को नियंत्रित करके उसे बढ़ा सकते हो। तुम्हें हर जगह इस प्रकार का अभ्यास करने की कोशिश करनी चाहिए और जल्दबाज़ी, उत्सुकता और सांसारिक बातों और इन्द्रिय सुखों के प्रति तीव्र इच्छा को टालना (avoid करना) चाहिए। केवल भगवान को प्राप्त करने के क्षेत्र में अधीरता की आज्ञा दी गई है। नियंत्रित मन की शक्ति उसी ढंग से बढ़ती है जैसे पानी की शक्ति, जब उसे विद्युत बनाने के लिए नियंत्रित किया जाता है और एक डैम की ओर मोड़ दिया जाता है।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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