पूर्व के 24 महापाप के कारण

पूर्व के 24 महापाप के कारण

विद्यारण्य नाम के एक बहुत बड़े संन्यासी थे। उनका जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। गरीब होने के कारण उनके पास अपने माता-पिता के पोषण के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। 

वह ब्राह्मणत्व में स्थित थे और उन्होंने संतों का संग किया था। धन की व्यवस्था के लिए उन्होंने गायत्री का अनुष्ठान किया। 

चौबीस लाख बार गायत्री मंत्र का जप करने से एक पुरश्चरण होता है। उन्होंने ऐसे तेईस पुरश्चरण किए, परंतु उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। .इस समय में उनके माता पिता का भी निधन हो गया। उनकी आयु भी अधिक हो गई और उन्होंने संन्यास ले लिया! 

जैसे ही उन्होंने सन्यास लिया, माता गायत्री उनके सामने प्रकट होकर बोलीं, ‘तुम्हें जो भी माँगना हो माँग लो, मैं तुम्हें कुछ भी देने के लिए तत्पर हूँ।’ 

उन्होंने कहा, ‘अब तो मैं संन्यासी हूँ, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। उन्होंने पूछा आप पहले क्यों नहीं आईं?’ 

तब माता गायत्री ने कहा, ‘तुम्हारे पूर्व के चौबीस महापाप थे। तुम्हारे तेईस पाप पुरश्चरण से और अंतिम पाप संन्यास लेने से नष्ट हुआ और इसके बाद मैं तुरंत आ गई।’

इस कहानी से हमें यह पता चलता है कि जब तक हमारे पूर्व के पाप बाकी हैं, वो हमारी उन्नति में बाधा डालते रहेंगे। 

हमें प्रयास करते रहना चाहिए और साथ ही साथ भगवान के नाम का जप भी करना चाहिए। प्रभु का जो भी नाम आपको प्रिय हो, उसका जप करें। 

भगवान के नाम में पापों का नाश करने की सामर्थ्य है। असफलता मिलने पर निराश न हों, हम प्रभु के अंश हैं, पशु नहीं!

जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए दो साधन होने चाहिए, एक आंतरिक नाम जप और एक बाह्य प्रयास! इससे हम सफल हो जाएंगे। 

गीता में भगवान ने अर्जुन जी से यही कहा है, ‘मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो।’ यह स्मरण पाप का नाश करेगा और बाह्य प्रयास आपकी उन्नति का मार्ग खोलेगा।

.चरित्र को पावन रखें, धर्म-पूर्वक चलें और नाम-जप करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करें। अगर आप यह सब करते हैं तो जीवन में उत्साह-हीनता कभी आ ही नहीं सकती। 

और अगर पूर्व का पाप हमें गिराने आया, तो हम उसे अपने भजन के बल से मिटाएंगे। पापों का नाश भजन के बल से ही होता है, बाहरी व्यवहार से नहीं।

 द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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