देह में रहते विदेही

देह में रहते विदेही


 हिदीं शब्दकोष में विदेह का अर्थ होता है बिना देह का ....लेकिन विदेही उसे कहते हैं, जो देह में रह कर भी देह से पूरी तरह अनासक्त (कहीं दूर चले जाना) हो गया हो। 

महाराजा जनक के एक मंत्री ने उनसे एक दिन पूछा - महाराज! आप देहधारी होकर भी विदेही क्यों कहे जाते है?

महाराज जनक बोले - कुछ दिनों बाद इसका जवाब देंगे। 

एक दिन राजा जनक ने दूत को बुलाकर कहा - जाकर शहर में ढिंढोरा पिटवाओ कि मंत्री के हाथों घोर अपराध होने के कारण उन्हें शाम चार बजे सूली पर चढ़ा दिया जाएगा। ढिंढोरे की कार्यवाही होने के बाद राजा ने मंत्री को दोपहर बारह बजे भोजन के लिए आमंत्रित किया।

मंत्री नियत समय पर भोजन के लिए पहुंचा। राजा ने भोजन पर अनेकों प्रकार के व्यंजन बनवाए, किंतु भोजन में जहां जरूरत थी, वहां नमक बिल्कुल भी नहीं डलवाया। मंत्री का ध्यान तो सूली की तरफ था। खाने की बिल्कुल भी इच्छा न होने पर भी उन्होंने राजा के निमंत्रण को स्वीकार करते हुए जैसे तैसे भोजन किया। 

भोजन के पश्चात जनक ने पूछा - कैसा लगा भोजन? 

मंत्री डरते हुए बोला - महाराज मौत के भय के कारण मुझे भोजन में कुछ भी स्वाद महसूस नहीं हुआ। मुझे नहीं पता क्या मीठा था, क्या खट्टा था और क्या फीका था।

 तब राजा जनक बोले - भोजन करते समय आपको यह मालूम था कि कुछ ही घंटों में आपको सूली दी जाने वाली है, जिस कारण आप देह में होते हुए भी सुध बुध भूल भूल कर विदेही हो गए। मुझे तो अपनी देह के अस्तित्व पर क्षण भर के लिए भी विश्वास नहीं है। अगले क्षण में इस शरीर में रहता हूं अथवा नहीं, कोई भरोसा नही इसलिए मुझे इस जीवन में किसी भी व्यक्ति, वस्तु अथवा पदार्थ में कोई आकर्षण नहीं है। माया, ममता, लोभ और आकर्षणों में मैं कभी लिप्त नहीं होता। मैं महल में अवश्य हूँ किन्तु महल मुझ में नही ऐसी स्थिति में लोग मुझे विदेही कहें तो इसमें आश्चर्य क्या!

  ज्ञानी का यही परम लक्षण है कि वह संसार में अवश्य है किन्तु संसार रंचमात्र भी उसमें नहीं है। वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।          

 द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद 

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