अदृश्य आशीर्वाद
👼👼💧💧👼💧💧👼👼 अदृश्य आशीर्वाद Image by Dalmava from Pixabay जल्दी-जल्दी घर के सारे काम निपटा कर बेटे को स्कूल छोड़ते हुए ऑफिस जाने की सोच कर वह घर से निकल ही रही थी कि फिर पिताजी की आवाज़ आ गई - “बहू! ज़रा मेरा चश्मा तो साफ़ कर दो।” और बहू झल्लाती हुई सॉल्वेंट ला कर चश्मा साफ़ करने लगी। आज फिर इसी चक्कर में बेटा स्कूल में और खुद ऑफिस में देर से पहुँची। गाहे बगाहे पिताजी की यूँ घर से निकलते हुए पीछे से आवाज़ देने की आदत बहू को अच्छी नहीं लगती थी, पर जानती थी कि पलँग से न उठ पाने के बावजूद पिताजी पूरे दिन में उसे यही एक दो काम ही तो कहते थे। काम छोटा-सा था पर ऑफिस जाने की भी तो जल्दी होती थी सुबह-सुबह। एक दिन पति से चर्चा की। पति की सलाह पर अब वह सुबह उठते ही पिताजी का चश्मा साफ़ करके रख देती। लेकिन फिर भी घर से निकलते समय पिताजी की बहू को जाते समय पीछे से बुलाने की आदत बन्द नहीं हुई। दिन बीते। एक समय वह आया कि समय से खींचातानी के चलते अब बहू ने पिताजी की पुकार को अनसुना करना शुरू कर दिया। पिताजी बुलाते तो भी अनसुना करके बहू चली जाती। एक दिन ऑफिस की छुट्टी थी तो बहू ने सोचा - क्य...