लोभ पाप को बाप बखानो
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लोभ पाप को बाप बखानो
Image by Pezibear from Pixabay
हमारे आचार्यों ने यूँ ही लोभ को पाप का बाप नहीं कहा है। जैसे ही मन में लोभ का प्रवेश होता है वैसे ही सभी पाप मन में जन्म लेने लगते हैं। आदमी हिंसा, झूठ, चोरी आदि की प्रवृत्ति की ओर बढ़ने लगता है।
एक राजा बहुत कुशलता से अपने राज्य का संचालन कर रहा था। उसके राज्य में सब सुखी और सम्पन्न थे। एक बार उसके राज्य में खूब वर्षा हुई। जल-थल एक हो गया। एक लकड़हारा लकड़ियां काट कर अपना जीवन-यापन करता था। वर्षा के कारण कोई भी अपने काम पर नहीं जा पाया, पर वह लकड़हारा अपनी कुल्हाड़ी लेकर जंगल की ओर चल पड़ा। कुछ लोगों की नज़र उस पर पड़ी।
राजा तक भी यह समाचार पहुँचा। उसने अपने झरोखे में से देखा कि नदी के तेज़ प्रवाह में एक ग़रीब लकड़हारा बहते हुए लक्कड़ को अपनी पूरी ताकत लगा कर किनारे तक लाने की कोशिश कर रहा है। राजा ने अपने आदमियों को यह देखने के लिए भेजा कि क्या यह लकड़हारा इतना गरीब है जो इसके पास इतनी बरसात में अपने परिवार को खिलाने के लिए एक दिन का भी भोजन नहीं है?
आदमियों ने खोजबीन की तो पता चला कि उसके पास एक ही बैल है। वह अपनी बैलों की जोड़ी पूरी करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है। राजा को उस पर दया आ गई और उसने अपने आदमियों को आदेश दिया कि इसे गौशाला में से एक बैल दे दिया जाए।
उसे कई बैल दिखाए गए पर उसने कहा कि इनमें से कोई भी बैल उसके बैल का जोड़ीदार नहीं है। राजा को संदेश भिजवाया गया। राजा को समझ में नहीं आया कि इतने उम्दा नस्ल के बैल भी उसके बैल के समान नहीं हैं तो ऐसी क्या खासियत है उसके बैल में?
राजा ने कहा कि चलो, मैं खुद चल कर देखता हूँ, कैसा है उसका बैल?
लकड़हारे को संदेशा दिया गया कि राजा साहब तुम्हारा बैल देखने तुम्हारे घर आ रहे हैं।
फिर क्या था! वह दौड़ा-दौड़ा अपने घर पहुँचा राजा साहब की अगवानी करने। एक सोने के थाल में रत्नों के दीपक सजाए, उनकी आरती उतारी। थाल में रत्नों की जगमगाहट देखते ही बनती थी। राजा तो पहले ही आश्चर्य में पड़ गया कि जब स्वागत इतना शानदार है तो पता नहीं, इसका बैल कितना हृष्ट-पुष्ट होगा! तभी तो उसकी जोड़ी का बैल मेरे पास भी नहीं है।
राजा ने कहा कि चलो, अपना बैल तो दिखाओ।
लकड़हारा उन्हें तलघर में ले गया। वहाँ भी रत्नों, हीरों, पन्नों की रोशनी फैली हुई थी। विभिन्न जानवरों की आकृतियों में तरह-तरह के रत्न और मणियाँ जड़े हुए थे। फिर उसने एक बैल की आकृति दिखाई जो एक ही था। लकड़हारे ने बताया कि महाराज, इसी बैल की जोड़ी पूरी करने के लिए मैं दिन-रात मेहनत कर रहा हूँ।
राजा उसे हतप्रभ होकर देखता ही रह गया। उसे क्या कहे और क्या न कहे?
राजा तो नहीं, पर ऐसे आदमी को तो कोई ज्ञानी, ध्यानी, संत ही समझा सकता था कि भाई, लक्ष्मी तो चँचल होती है। चाहे जितना भी धन जोड़ लो, अंत में तो नष्ट होना ही है।
लक्ष्मी की तीन गति होती हैं। दान, भोग या नाश। धन मिला है तो उसको भोग लो और कुछ अंश दान कर दो। अगर न भोग किया और न ही दान किया तो यह किसी काम नहीं आएगी और जो यह झूठ बोल, खून-पसीना एक करके पैसा कमाया है, उसका एक-न-एक दिन नाश हो जाएगा।
राजा ने उसे एक संन्यासी का पता बताया कि वह तुम्हारी इच्छा पूरी करने का मंत्र दे सकता है। इसके लिए तुम्हें मेहनत करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
वह व्यक्ति तुरन्त राजा के बताए पते पर जाने के लिए तैयार हो गया।
संन्यासी की कुटिया के बाहर सुरम्य शांति का वातावरण था, जिसने उस व्यक्ति का मन मोह लिया। ऐसी शांति का अनुभव इससे पहले कभी नहीं हुआ था। भीतर जाने पर देखा कि संन्यासी एक चटाई पर आसन लगाए ध्यान में मग्न था। उसके चेहरे पर अलौकिक शांति का साम्राज्य था। परिग्रह के नाम पर एक जोड़ी कपड़े और कुछ बर्तन, जो उसके लिए जीवन भर के लिए पर्याप्त थे।
संन्यासी ने धीरे-से आँख खोली और उसके आने का प्रयोजन स्वयं ही जान लिया। संन्यासी ने कहा - कहो वत्स! धन की खोज में आए हो! मैं तुम्हें ऐसे धन का पता बता सकता हूँ जो कभी नष्ट नहीं हो सकता।
व्यक्ति की उत्सुकता बढ़ी जा रही थी।
“हाँ! हाँ महाराज! बताओ न!”
संन्यासी ने कहा - वत्स! उसका नाम है ‘संतोष-धन’।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
“गो धन, गज धन, वाजि धन और रतन धन खान,
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान।”
मनुष्य के पास भले ही गो (गाय आदि) रूपी धन हो, गज (हाथी) रूपी धन हो, वाजि (घोड़ा) रूपी धन हो और रतनों के रूप में धन का अपार भण्डार हो, वह कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। जब उसके पास संतोष रूपी धन आ जाता है, तो बाकी सब धन उसके लिए धूल या मिट्टी के समान लगने लगते हैं अर्थात् संतोष धन ही संसार में सबसे बड़ी सम्पत्ति है।
वह व्यक्ति मंत्रमुग्ध होकर संन्यासी की बात सुनता रहा। आज तक किसी ने उसे इस प्रकार नहीं समझाया था। उसकी सोचने की ‘दिशा’ क्या बदली, उसके ‘जीवन की दशा’ ही बदल गई।
उसने अपना सारा संचित खज़ाना वंचित लोगों के कल्याण में लगा दिया और उस संन्यासी का सच्चा शिष्य बन गया।
“धन्य हैं ऐसे संत और धन्य है उनके ऐसे निष्ठावान शिष्य।”
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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