सफलता का रहस्यः धैर्य

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सफलता का रहस्यः धैर्य

यदि हम जीवन में सफल होना चाहते हैं तो केवल धैर्य ही वह कुंजी है जो हर सफलता का ताला खोल सकती है।

चाहे हम किसी काम में निपुण हों या न हों, धैर्य से किया गया काम हमें हर काम में निपुण बना सकता है। जो लोग असफलता के डर से काम को आरम्भ ही नहीं करते या बीच में छोड़ देते हैं, उनमें सफल होने के सभी गुण विद्यमान होते हैं, बस कमी रहती है तो केवल धैर्य की। मान लो हमने आम प्राप्त करने का लक्ष्य बनाया और आम की गुठली जमीन में बो दी।

हम चाहते हैं कि तुरन्त काम किया और तुरन्त ही उसका फल मिल जाए। पर वही हुआ। हमारे अन्दर धैर्य की कमी थी। रोज पानी भी देते, खाद भी डालते लेकिन यह कोई बबूल का पेड़ तो था नहीं कि इधर बोया और उधर उग आया।  

एक दिन धैर्य ने जवाब दे दिया और जब हमने देखा कि आम का पेड़ तो उग ही नहीं रहा तो हमने मेहनत से बचने के लिए वह आम की गुठली ही जमीन में से बाहर निकाल कर फेंक दी कि न होगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी।

न गुठली बोएंगे और न मेहनत करनी पड़ेगी।

लेकिन भैया, फिर तो आम के मिलने की सारी सम्भावनाएं भी समाप्त हो जाएंगी, पर हमें क्या? बैठे रहो यों ही हाथ पर हाथ रख कर। न मेहनत करनी पड़ेगी और न मीठे आम खाने को मिलेंगे।

ऐसे ही एक लड़के को उसके माता पिता कहते थे कि कुछ काम भी कर लिया करो, क्या हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहते हो। तुमसे शादी कौन करेगा?

लड़के ने कहा - ‘तुम शादी की चिन्ता न करो, मैं तो राजा की लड़की से शादी करूँगा।’

‘अरे वाह! पाँव तो जमीन पर टिकते नहीं, काम कुछ करते नहीं और दिमाग है सातवें आसमान पर।’

बस! वह तो चल पड़ा राजा की लड़की से शादी करने। उसने राजा की लड़की से शादी करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। पहुँचा राजमहल के द्वार पर, तो पहरेदारों ने वहीं रोक लिया। 

‘कहाँ चले जा रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं, यह राजा का महल है?

‘हाँ! हाँ! पता है। मैं राजा की लड़की से शादी करने ही तो जा रहा हूँ।’

सभी पहरेदार ठठाकर हँसने लगे।

‘अरे! जरा अपनी शक्ल तो देखो। बड़े आए राजा का दामाद बनने वाले।’

और उन पहरेदारों ने मिलकर उसे धक्के दे कर बाहर निकाल दिया।

शाम को उसके मित्रों ने पूछा कि क्या हुआ? वापिस कैसे आ गए? तुम तो राजा की लड़की से शादी करने गए थे न!

‘कुछ नहीं, बस थोड़ी सी धक्कम-धक्का हुई है।’

अगले दिन वह फिर चल पड़ा राजमहल की ओर।

फिर वही बात दोहराई तो पहरेदारों ने आज दोबारा उसे केवल धक्के ही नहीं बल्कि मुक्के मार कर बाहर खदेड़ दिया। वह कहता ही रह गया कि एक बार राजा को मेरे आने की सूचना तो दे दो।

उसके मित्रों ने पूछा कि आज क्या हुआ? 

‘कुछ नहीं, बस आज थोड़ी सी मुक्कम-मुक्का हुई है।’

‘अरे वाह! कल धक्कम-धक्का और आज मुक्कम-मुक्का। अब तो नहीं जाओगे? छोड़ दो अपनी यह व्यर्थ की ज़िद। कुछ काम-धाम ही कर लो। दो पैसे कमाओगे तो कोई-न-कोई लड़की मिल ही जाएगी।’ लेकिन वह लड़का तो अपने लक्ष्य से डिगने वाला नहीं था। उसके पास धैर्य की कोई कमी नहीं थी।

अगले दिन वह फिर पहुँच गया राजमहल के द्वार पर। 

पहरेदारों ने देखा और सोचा कि यह युवक ऐसे मानने वाला नहीं है। आज तो इसे राजा के पास ही लेकर चलते हैं, वही इसे सजा सुनाएंगे।

पहरेदारों ने युवक को राजा के सामने पेश किया और पिछले दो दिन का सारा हाल राजा को कह सुनाया। रानी भी यह सब देख व सुन रही थी।

राजा ने युवक से रोज़-रोज़ राजमहल में आने का कारण पूछा तो युवक ने कहा कि महाराज! मैं आपकी पुत्री से विवाह करना चाहता हूँ।

यह सुनते ही राजा को क्रोध आ गया और बोला कि इसे उठा कर बाहर फेंक दो। इसकी इतनी हिम्मत!

लड़के ने विरोध भी किया कि एक बार मेरी बात भी सुन ली जाए, पर उसकी एक न चली।

चार पहरेदारों ने युवक को उठाया और उसके विरोध करने के बावजूद उठा कर राजमहल से बाहर फेंक दिया।

उसके मित्रों ने फिर पूछा कि आज क्या हुआ? कुछ सफलता मिली या नहीं।

‘कुछ नहीं, बस थोड़ी-सी गुत्थम-गुत्था हुई।’

‘अरे वाह! परसों धक्कम-धक्का, कल मुक्कम-मुक्का और आज गुत्थम-गुत्था। अब तो नहीं जाओगे न राजमहल?

युवक ने कहा- ‘ऐसे लक्ष्य से पीछे हटने पर सफलता थोड़े-ही मिलती है। जब तक राजा की लड़की से मेरी शादी नहीं हो जाती, तब तक मैं पीछे हटने वाला नहीं।’

बस! अगले दिन वह फिर पहुँच गया राजमहल के द्वार पर। 

पहरेदारों ने सोचा कि आज राजा कहीं इसे फांसी की सजा ही न सुना दे।

चलो! हम तो इसे राजा के पास ही लेकर चलते हैं।

राजा और रानी राजदरबार में अपने सिंहासन पर बैठे थे।

पहरेदारों ने युवक को राजा के सामने लाकर खड़ा कर दिया।

राजा ने उसके लिए कोई दण्ड सुनाने से पहले रानी की ओर देखा जो उसे एकटक देख रही थी और कुछ सोच रही थी। 

‘महारानी! क्या सोच रही हो?’

‘महाराज! मैं सोच रही हूँ कि यह लड़का है तो धुन का पक्का। अपनी धुन पूरी करने के लिए जान की बाज़ी लगाए बैठा है। ऐसी विशेषता कम ही देखने को मिलती है। हम इसे जो भी काम सिखाएंगे, यह लगन से सीखेगा और उसे पूरा करने में जी-जान लगा देगा। राज काज में तो ऐसे दृढ़ निश्चय वाले ही कामयाब होते हैं।’

‘थोड़ी धन की कमी दिखाई दे रही है, पर वह तो हम भी पूरी कर सकते हैं। देखने में भी सुन्दर व हृष्ट पुष्ट है। व्यवहार में भी विनम्र है। क्यों न हम एक बार अपनी पुत्री से पूछ लें?’

अब तो आप समझ ही गए होंगे कि क्या हुआ होगा?

जब उसके मित्रों ने पूछा कि आज क्या हुआ? तुम तो राजा की लड़की से शादी करने गए थे।

‘अरे! पूछो मत, आज तो छक्कम-छक्का हो गई। रानी के कहने पर राजा ने अपनी पुत्री से पूछा तो वह बोली कि आप मेरे पिता हैं। मैं आपकी पसन्द से विवाह करने को राज़ी हूँ। अब राजा अपनी लड़की की शादी मेरे साथ करने के लिए तैयार हो गए हैं।’

युवक के धैर्य का फल उसे मिल गया और वह भी राजा-रानी की कसौटी पर खरा उतरा। युवक ने उन्हें जीवन-भर शिकायत का कोई मौका नहीं दिया। उनका राज्य पहले से भी अधिक समृद्ध हो गया।

तो यह था धैर्य का सुपरिणाम। 

लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पसीना बहाना पड़ता है, निंदा व आलोचना भी सुननी पड़ती है, तपस्या भी करनी पड़ती है लेकिन इसका फल लक्ष्य-प्राप्ति के रूप में मिलता है। आम का पेड़ लगाने वाला भी यदि धैर्य से पेड़ की सेवा करता रहता तो उसे भी आम के फलों का मीठा स्वाद चखने को मिल जाता।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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