सीता-हरण
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रामायण के प्रसंगः आज के सन्दर्भ में
सीता-हरण
दुनिया में ऐसा कौन व्यक्ति होगा जिसका हृदय सीता-हरण के प्रसंग को सुन कर द्रवित न होता हो। राम के साथ जंगल के कंटीले रास्तों पर चलते हुए सीता को 13 वर्ष व्यतीत हो गए थे। वनवास का अंतिम वर्ष चल रहा था। सीता अपने पति राम की सेवा करती और राम उसकी सुरक्षा में तत्पर रहते। छोटा भाई लक्ष्मण रात भर पहरा देता ताकि माता-पिता समान भाई-भाभी के आराम में कोई विघ्न न आने पाए।
नारी-प्रताड़ना व सीता-हरण जैसी घटनाएं हर युग में होती आई हैं। दोष चाहे स्त्री का हो या न हो पर यातना सदैव स्त्री को ही भुगतनी पड़ती है।
जुए में युधिष्ठिर ने द्रोपदी को दांव पर लगा दिया लेकिन चीर-हरण की पीड़ा से तो द्रोपदी को ही गुज़रना पड़ा न!
कंस को अपने प्राणों का भय था पर कारागार की यातनाएं तो उसकी बहिन देवकी ने ही भोगी।
हनुमान के पिता पवनंजय की बेरुखी का परिणाम उसकी माता अंजना सती ने 22 वर्ष तक भोगा।
असुर के षड्यन्त्र का शिकार होकर अहिल्या पाषाण की शिला बन कर रह गई।
सीता-हरण में सीता का क्या दोष था?
सुन्दर वस्तु या व्यक्ति के प्रति आकर्षण किस को नहीं होता?
सीता के मन में नारी-सुलभ स्वभाव के कारण स्वर्ण-मृग को पाने की इच्छा जागृत हुई। जब राम के समझाने पर भी उसने अपनी हठ न छोड़ी तो राम ने सीता की सुरक्षा का दायित्व अपने भाई लक्ष्मण को सौंपा और सीता की मनोकामना पूरी करने के लिए उस स्वर्ण-मृग की ओर चल पड़े।
लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि वे किसी की कुटिल नीति के शिकार बनने जा रहे हैं?
यह सारा प्रपंच तो रावण का रचा हुआ था। लक्ष्मण को वहां से दूर भेजने के लिए राम की आवाज़ में आर्तनाद किया - हे भाई लक्ष्मण! मुझे बचाओ! मैं मुसीबत में हूँ।
जिसका पति संकट में हो, वह नारी भला कहाँ चुपचाप बैठ सकती थी? सीता ने लक्ष्मण को विवश कर दिया कि तुम्हारे भाई के प्राण संकट में हैं और तुम मेरी सुरक्षा की दुहाई दे रहे हो कि माता! मैं तुम्हें अकेला छोड़ कर नहीं जा सकता! तुम्हें अपने भ्रातृ-प्रेम पर शर्म आनी चाहिए।
लक्ष्मण बहुत बड़े धर्म-संकट में पड़ गया। जाता हूँ तो माता सीता असुरक्षित हो जाएगी और नहीं जाता हूँ तो एक ओर माता के आदेश की अवहेलना का पाप तथा दूसरी ओर भैया के प्राणों की सुरक्षा का प्रश्न?
कुछ देर सोचने के बाद उसके मन में एक उपाय सूझा। माता मेरी किसी बात का अनादर नहीं करेंगी। ऐसा मुझे दृढ़ विश्वास है। मैं माता की कुटिया के चारों ओर एक अग्नि-रेखा खींच देता हूँ जो कालान्तर में लक्ष्मण-रेखा के नाम से आज भी जानी जाती है।
जिसने इस रेखा का उल्लंघन करने की चेष्टा की, वह अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा। इस प्रकार माता सीता की भी रक्षा हो जाएगी और मैं अपने भाई के प्रति कर्तव्य का भी निर्वाह कर पाऊँगा।
लक्ष्मण ने माता सीता को कठोर हिदायत दे दी कि आप किसी भी हालत में इस रेखा को पार नहीं करेंगी। मैं अभी अपने भाई को सुरक्षित आपके सामने लाकर खड़ा कर दूँगा।
इतना कह कर उसने अग्नि-रेखा खींच दी और जाते-जाते फिर हिदायत दी - उस रेखा से बाहर कदम न रखने की। चल दिया वह कर्तव्यनिष्ठ भाई अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए।
विधि के विधान ने तो कुछ और ही खेल रच रखा था। रावण केवल कूटनीतिज्ञ ही नहीं, कुटिलनीतिज्ञ भी था। उसे माता सीता की इस कमज़ोरी का ज्ञान था कि वे अपने द्वार पर आए हुए किसी याचक को खाली हाथ लौटने नहीं देती।
बस! फिर क्या था? बनाया साधु का वेश और चल पड़ा सीता के द्वार पर भिक्षा मांगने।
सीता का आग्रह था कि वह साधु कुटिया के अंदर आकर भिक्षा ग्रहण करे तो वह उसकी झोली में अन्न का दान कर सकती है क्योंकि वह लक्ष्मण को दी गई प्रतिज्ञा से बंधी हुई थी। साधु के छद्मवेश में कुटिल रावण जानता था कि यह कोई साधारण रेखा नहीं है। इसके भीतर जाते ही वह भस्म हो जाएगा।
उसने विवश कर दिया सीता को कि आज यदि तुमने कुटिया से बाहर आकर मुझे भिक्षा नहीं दी तो लोग कहेंगे - सीता ने अपने द्वार से याचक को खाली हाथ भेज दिया। वह तो केवल अपने पति के भय से भिक्षा देती थी। आज उसका पति वहाँ नहीं था इसलिए साधु खाली हाथ लौटाया जा रहा है।
सीता स्वयं पर लगाए गए इतने बड़े लांछन को सहन नहीं कर पाई।
उसकी साधु को खाली न भेजने की ताकत ही उसकी कमज़ोरी बन गई और हाय! उसने लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन कर दिया।
परिणाम क्या हुआ, वह तो आप सभी को विदित ही है।
नारी, पुरुष द्वारा व तथाकथित सभ्य समाज द्वारा प्रताड़ित व उपेक्षित की जाती रही है अपनी मानवीय संवेदनाओं के कारण और अपनी स्त्री-सुलभ दुर्बलताओं के कारण। आज भी परिस्थितियां वही हैं। कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
आज भी नारी पुरुष के समान कठोर हृदया नहीं बन पाई है। किसी की कराह व पीड़ा को देखकर तुरंत उसका उपचार करने में तत्पर हो जाती है, फिर चाहे वह उसका पति हो, भाई हो या कोई और।
नारी को धरती के समान सहनशीलता का वरदान मिला हुआ है। स्वयं कष्ट सहन कर लेगी पर दूसरे को पीड़ा देने की बात तो वह सोच भी नहीं सकती। तभी तो वह जननी कहलाने का अधिकार प्राप्त कर पाई है।
याचक को खाली हाथ न भेजना उसके संस्कारों में बसा हुआ है। यदि रावण को सीता की इस कमज़ोरी का पता नहीं होता तो वह कभी इसका नाज़ायज फायदा नहीं उठा सकता था।
कष्टों से मुक्ति पाने का एक ही उपाय है कि किसी के सामने अपनी कमज़ोरी प्रगट न होने दो। जीवन में आने वाली समस्याओं का दृढ़ता पूर्वक सामना करो।
सबसे महत्व पूर्ण बात - नारी समाज द्वारा बनाई गई लक्ष्मण-रेखा की मर्यादा का उल्लंघन करेगी तो यह उसके जीवन के लिए घातक सिद्ध होगा।
आज भी पौराणिक आख्यान हमारे जीवन की दिशा व दशा बदलने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
एक बार की बात है। एक वृद्ध रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे। सामने वाली सीट पर एक नवदम्पति बैठे थे। वृद्ध ने समय काटने के लिए अपने थैले में से रामायण निकाली और उसे पढ़ने लगा। नवदम्पति ने आपस में चुहलबाजी करते हुए कहा कि देखो! देखो! ज़माना तो चांद पर पहुँच गया है और ये अभी जंगलों में लिखी हुई रामायण पर ही अटके हुए हैं।
वृद्ध ने कोई उत्तर नहीं दिया। अगले स्टेशन पर नवदम्पति ट्रेन से नीचे उतर कर चाय आदि पीने लगे। तभी ट्रेन ने चलने की सीटी दी और धीरे-धीरे चलने लगी। युवक भाग कर ट्रेन में चढ़ गया पर लड़की न चढ़ पाई। युवक ने जैसे-तैसे चेन खींचकर ट्रेन को रोका और लड़की को चढ़ाया।
वे दोनों बदहवास से सामने वाली सीट पर आकर बैठ गए। अब उस वृद्ध के हंसने की बारी थी। वे बोले - बेटा! अगर तुमने रामायण पढ़ी होती तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।
क्या? वह कैसे?
हाँ! देखो, इसमें क्या लिखा है? राम, सीता व लक्ष्मण नदी पार करने के लिए नाव पर सवार होने लगे। राम ने पहले हाथ पकड़ कर सीता को नाव पर चढ़ाया, फिर स्वयं चढ़े और अंत में लक्ष्मण ने सवार होकर केवट को नाव खेने का संकेत किया।
तुमने रामायण पढ़ी होती तो पहले लड़की को चढ़ने में मदद करते, बाद में स्वयं चढ़ते तो आज यह नौबत न आती।
अतः केवल पढ़ने में नहीं, उससे कुछ सीखने में ही पठन की सार्थकता है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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