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Showing posts from September, 2020

सद्व्यवहार ही गुणों का दर्पण

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👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼 कैसे बनें गुणवान (2) गुणों की परिभाषा अवगुणों से बचने से पहले हमें यह जानना अति आवश्यक है कि हम कैसे बनें गुणवान? गुणवान बनेंगे तो अवगुण स्वयं ही हमसे दूर हो जाएंगे, पर विडम्बना तो यह है कि हम स्वयं को सबसे अधिक गुणवान मानते हैं। आज हम कुछ बिन्दुओं पर विचार करेंगे कि क्या हम वास्तव में इन कसौटियों पर खरे उतरते हैं? एक धनवान व्यक्ति के विषय में हम सोच लेते हैं कि यह गुणवान भी होगा। मान लो एक व्यक्ति बहुत धनवान है पर मिष्टभाषी नहीं है, अपने धन का अभिमान करके बैठा है तो कोई व्यक्ति उससे मित्रता नहीं करना चाहेगा। वह अपने सच्चे और अच्छे शुभचिंतकों से सदा वंचित ही रहेगा। जो मित्र बनेंगे, वे भी किसी स्वार्थ-भावना से ही उसके पास आएंगे। यदि वह विनम्रता और सेवाभाव के गुणों से युक्त होगा तो वह अपने धन का उपयोग दान-धर्म आदि भलाई के कार्यों में करेगा और समाज में सम्मान भी प्राप्त कर सकेगा।  एक बार रहीम खानखाना ग़रीब लोगों को नज़रें झुका कर दान दे रहे थे। याचक के रूप में आए लोगों को बिना देखे, वे दान देते थे। अकबर के दरबारी कवियों में महाकवि गंग प्रमुख थे और रहीम के तो ...

गुणों की परिभाषा

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👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼 कैसे बनें गुणवान (1) गुणों की परिभाषा “हम अनंत गुणों की खान, फिर भी हैं इनसे अनजान। साथी अपने को पहचान, जान ले कैसे बनें गुणवान।।” हमारे लेख का मुख्य उद्देश्य है - अपने देश का और अपने समाज का उत्थान।   व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। चूंकि व्यक्ति समाज की सबसे छोटी इकाई है अतः मेरा मानना है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने आचार, विचार और व्यवहार को उन्नत कर ले तो उसका समाज और राष्ट्र भी आकाश की बुलंदियों को छू सकता है। आज जब दो आदमी आपस में बात करते हैं तो उनकी बातचीत का विषय चाहे कहीं से भी आरम्भ हो, पर वह समाज में फैले भ्रष्टाचार पर आकर ही समाप्त होता है। हमें इसके कारण ही नहीं अपितु निवारण पर भी बातचीत करनी चाहिए। इस ज्वलंत समस्या का मूल कारण है - गुणों के प्रति लगाव का अभाव। इसके निवारण का छोटा सा उपाय मुझे एक साइकिल-मरम्मत की दुकान पर मिला जब वह साइकिल के टायर की ट्यूब में पंचर लगा रहा था। वह साइकिल के टायर में हवा तो भरता था पर वह अधिक देर तक टिक नहीं पाती थी। अब उसे वह छेद खोजना था जो हवा के निकलने का मूल कारण था। उसने ट्यूब को टायर से...

मीठी वाणी बहुत बड़ा वरदान है

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👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼 वाणी बने वीणा (9) मीठी वाणी बहुत बड़ा वरदान है कहते हैं कि वाणी में इतनी शक्ति होती है कि कड़वा बोलने वाले का तो शहद भी नहीं बिकता और मीठा बोलने वाले की मिर्ची भी बिक जाती है। जानते हो कि ऐसा क्यों? हर कथन के साथ कोई न कोई घटना जुड़ी होती है। एक बार कुछ शिक्षक पांडिचेरी के अरविन्द आश्रम गए। वहाँ वे श्री माताजी से मिले और उनसे पूछा कि हमें सदैव प्रसन्न रहने के लिए क्या करना चाहिए? उन्होंने कहा कि अपनी वाणी से सदैव अमृत बिखेरते रहो, सभी से प्रेम करो और सभी से प्रेम पाओ। इसी से प्रसन्नता मिलेगी। उन्होंने एक कथा सुनाई कि फारस देश में एक स्त्री शहद बेचने का काम करती थी। वह स्वयं जितनी सुंदर थी, उसकी वाणी भी उतनी ही मीठी थी शहद के समान। उसकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। 2 घंटे में ही उसका सारा शहद बिक जाता था। आमदनी भी अच्छी हो जाती थी। एक ओछी प्रकृति वाला व्यक्ति यह देख कर मन ही मन उससे जलता था। उसने भी उस के पास ही अपनी शहद की दुकान लगा ली। उसकी दुकान पर एक ग्राहक आया और सहज भाव से पूछने लगा कि क्यों भाई, शहद नकली तो नहीं है न! उस आदमी ने भड़क कर कहा कि जो ...

मिष्टभाषी बनो

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👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼 वाणी बने वीणा (8) मिष्टभाषी बनो हम वाणी के प्रयोग में सावधानी रख कर ही प्रेम के बीज बो सकते हैं। वाणी में सरसता, मिठास व लोच होना चाहिए। हमारी रसना को मिष्ठान्न तो बहुत अच्छे लगते हैं फिर मीठे बोल बोलने में कंजूसी क्यों? एक संत अपने शिष्यों के साथ अपने आश्रम में रहते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को हर विद्या में पारंगत बनाया। एक बार संत बीमार हो गए और उन्होंने अपने शिष्यों को समझाया कि लगता है, मेरा अंतिम समय निकट है। बच्चों, तुम सब मिलजुल कर रहना और जहां तक हो सके समाज की इसी प्रकार सेवा करते रहना। सभी शिष्य उदास हो गए।  तभी एक शिष्य ने कहा कि महात्मन्! अपने अंतिम उपदेश के रूप में हमें कुछ ज्ञान देते जाओ जो हमारे जीवन भर काम आए। यह सुनकर संत ने अपना मुख खोल कर दिखाया और पूछा कि तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है? शिष्य हैरान हो गए कि क्या बताएं? एक ने हिम्मत कर के कहा कि इसमें तो जीभ दिखाई दे रही है।  ‘और कुछ नहीं दिखाई देता?’ ‘नहीं, महाराज!’ ‘क्यों? दाँत नहीं दिख रहे।’ ‘नहीं, महाराज! पहले तो थे, अब नहीं हैं।’ ‘कुछ समझ में आया क्या? जीभ तो जन्म के समय भी हमारे...

दुर्वचनों की अपेक्षा मौन अच्छा

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👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼 वाणी बने वीणा (7) दुर्वचनों की अपेक्षा मौन अच्छा एक बार बोले गए दुर्वचन हमारे द्वारा जीवन भर किए गए सभी उपकारों पर पानी फेर देते हैं। एक व्यक्ति ने दिल्ली जाने से पहले अपने मित्र को सूचित किया कि मैं दिल्ली आ रहा हूँ। मित्र ने बहुत आत्मीयता से उसे अपने घर खाने पर आमंत्रित किया। बाहें फैला कर उसका स्वागत किया और स्वादिष्ट भोजन खिलाया। उस व्यक्ति ने भी जी भर कर मित्र के द्वारा किए गए स्वागत और खिलाए गए भोजन की प्रशंसा की कि ऐसा स्वादिष्ट भोजन तो मैंने पहले कभी नहीं खाया। मित्र ज़रा मुंहफट था। बोला कि तूने तो क्या, तेरे बाप ने भी कभी ऐसा स्वादिष्ट भोजन नहीं खाया होगा। यह सुन कर उसके मुँह में मिठास के स्थान पर कड़वाहट घुल गई। कहा भी है - शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव, एक शब्द औषध करै, एक शब्द करै घाव। हमारे शब्द किसी दुःखी के दुःख को समाप्त करने में औषधि का काम करें, तभी उनकी सार्थकता है। ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना, जो सुखी व्यक्ति के सुख को भी मर्मभेदी घावों से छलनी-छलनी कर दे। यह हमारे पतन की पराकाष्ठा है। इसलिए हमें मर्मघाती शब्दों के प्रयोग से बचना ...

वाणी बने न बाण

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👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼 वाणी बने वीणा (6) वाणी बने न बाण हमारी वाणी जब व्यंग्योक्ति में बदल जाती है, तब वह बाण की तरह सुनने वाले के मन को क्षत-विक्षत कर डालती है। कहते हैं कि कमान से छूटा हुआ तीर और मुख से निकला हुआ बोल कभी वापिस नहीं आता। तीर से हुआ घाव तो फिर भी ठीक हो सकता है, पर वचनों से होने वाले घाव कभी नहीं भरते। द्रोपदी द्वारा की गई एक व्यंग्योक्ति ने 18 दिन तक चलने वाला महाभारत का युद्ध करवा दिया और हमारे आप के घरों में तो व्यंग्योक्ति के कारण न समाप्त होने वाली महाभारत हर रोज होती है। शायद हमने इस शीतयुद्ध के परिणाम पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। कबीर दास जी कहते हैं - मधुर वचन है औषधि, कटु वचन है तीर, श्रवण द्वार ह्वै संचरे, साले सकल शरीर। हमारे द्वारा बोले गए मधुर वचन दूसरे के तन-मन के घावों पर औषधि का काम करते हैं और कटु वचन ऐसे बाण हैं जो कान के द्वार से शरीर में प्रवेश करते हैं और दूसरे के तन-मन को घायल कर देते हैं। कटु वचन पीड़ा देने के अलावा कुछ नहीं दे सकते।  आपने देखा होगा कि यदि हम शांत झील में एक कंकर डाल दें तो वलय दर वलय पानी घूमने लग जाता है। उसे फिर से शांत होने ...

अवसर के अनुकूल बात करो

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👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼 वाणी बने वीणा (5) अवसर के अनुकूल बात करो यदि हम वाणी का विवेक से प्रयोग करते हैं तो वहाँ न उद्वेग होगा, न अतिरेक होगा और न ही उद्रेक होगा। हमें सदा अवसर के अनुकूल ही बोलना चाहिए। अवसर के प्रतिकूल बोली गई अच्छी बात भी किसी को अच्छी नहीं लगती। तभी तो भोजन के समय मौन रहने को कहा जाता है ताकि इस बात का विवेक रहे कि कितना खाना है और क्या खाना है। ठीक इसी प्रकार बोलते समय भी इस बात का विवेक रखना चाहिए कि हमें कितना बोलना है और क्या बोलना है। बोलने से पहले हर शब्द को Watch करो। W: Watch Your Words. A: Watch Your Action. T: Watch Your Thoughts. C: Watch Your Character. H: Watch Your Habits. यह है जीवन की सफलता का मूल मंत्र। वाणी हमारे दिमाग में उत्पन्न विचारों को सम्प्रेषित करने का केवल माध्यम है। यदि हम सबके प्रति अच्छा सोचने की आदत बना लें तो हम अपनी जुबान से हमेशा मधुर वचन ही निःस्सृत करेंगे।  हमारा दिमाग विचारों के Tank के समान है, जिसमें अलग-अलग तरह के विचार भरे हुए हैं। हमारा मुख एक टोंटी के समान है। जब हम बोलने के लिए अपना मुख खोलते हैं, तो वे विचार ही भाषा बन...