गुणों की परिभाषा
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कैसे बनें गुणवान (1)
गुणों की परिभाषा
“हम अनंत गुणों की खान, फिर भी हैं इनसे अनजान।
साथी अपने को पहचान, जान ले कैसे बनें गुणवान।।”
हमारे लेख का मुख्य उद्देश्य है - अपने देश का और अपने समाज का उत्थान।
व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। चूंकि व्यक्ति समाज की सबसे छोटी इकाई है अतः मेरा मानना है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने आचार, विचार और व्यवहार को उन्नत कर ले तो उसका समाज और राष्ट्र भी आकाश की बुलंदियों को छू सकता है।
आज जब दो आदमी आपस में बात करते हैं तो उनकी बातचीत का विषय चाहे कहीं से भी आरम्भ हो, पर वह समाज में फैले भ्रष्टाचार पर आकर ही समाप्त होता है। हमें इसके कारण ही नहीं अपितु निवारण पर भी बातचीत करनी चाहिए। इस ज्वलंत समस्या का मूल कारण है - गुणों के प्रति लगाव का अभाव।
इसके निवारण का छोटा सा उपाय मुझे एक साइकिल-मरम्मत की दुकान पर मिला जब वह साइकिल के टायर की ट्यूब में पंचर लगा रहा था। वह साइकिल के टायर में हवा तो भरता था पर वह अधिक देर तक टिक नहीं पाती थी। अब उसे वह छेद खोजना था जो हवा के निकलने का मूल कारण था। उसने ट्यूब को टायर से बाहर निकाला और उसमें हवा भरकर पानी में डालकर देखा कि छेद कहाँ है? उस स्थान को खुरदरे पत्थर से रगड़ कर साफ किया और पेस्ट लगाकर वह छिद्र बंद कर दिया। अब उसमें हवा भरी भी जा सकती थी और वह टिक भी सकती थी।
हमारे समाज में अवगुणों के छोटे-छोटे छिद्र हो गए हैं जो हमें दिखाई तो नहीं देते पर उन्होंने हमारी गति में अवरोध खड़ा कर दिया है। इन छिद्रों को गुणों के पेस्ट से भरना होगा तभी हम देश को उन्नति की ओर ले जा सकते हैं।
गुणों की प्राप्ति कैसे हो - इस का विश्लेषण आरम्भ करने से पहले हम यह जान लें कि गुण किसे कहते हैं?
जब हम किसी एक विषय पर चिंतन करना प्रारंभ करते हैं तो हमारे मन में कुछ प्रश्न आ खड़े होते हैं - यह क्या है? इसे प्राप्त करना क्यों आवश्यक है और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
आज के युग में गुण और अवगुण में भेद करना उतना ही कठिन है, जितना दूध में मिले हुए पानी को अलग करना। आज की पीढ़ी झूठ बोल कर या चालाकी से अपना काम निकालने को अवगुण नहीं बल्कि गुण मानती है। वह सोचती है कि गुणों का झंडा लेकर चलने वाले को दुनिया बैक फुट पर धकेल देती है, पर हमें ‘सत्यमेव जयते’ पर कायम श्रद्धा को डगमगाने नहीं देना चाहिए।
कहा जाता है कि झूठ कभी टिकता नहीं और सत्य कभी डिगता नहीं। सत्य पर काल व स्थान का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सत्य को हम बिना परिवर्तित किए किसी भी समय और किसी भी स्थान पर बोल सकते हैं। पर झूठ समय और स्थान के अनुसार बदलता रहता है। वास्तव में झूठ के पाँव नहीं बल्कि पँख होते हैं।
एक बार दो व्यक्ति साइकिल पर सवार हो कर सड़क पर जा रहे थे। अचानक चौराहे पर मुड़ते समय दोनों की टक्कर हो गई। दोनों गिर पड़े, चोट भी लगी और खून भी बहने लगा। दोनों उठे और एक दूसरे को दोष देने लगे। तीसरा उन्हें जानता था। उस ने यह दृश्य देखा तो वह चौथे के पास भागा और बोला कि चौराहे पर अली और आनंद की लड़ाई हो रही है। चौथे ने पाँचवें को बताया। पाँचवें ने कहा कि चलो, चलकर देखते हैं। छठा बोला कि मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ। सातवें ने देखा तो बोला कि ये तो अली और आनंद हैं। अरे भाई! यह तो हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई है। हमें इनके पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए। पुलिस को खबर कर देते हैं।
आठवें ने ज्यों ही पुलिस का नाम सुना, उसने नौंवे से कहा कि चौराहे पर हिन्दू-मुसलमान का दंगा हो गया है। पुलिस आ रही है। नौंवा भी दसवें के साथ चौराहे की तरफ दौड़ने लगा। फिर क्या था? खबर आग की तरह फैलने लगी। दस से सौ और सौ से हजार, सभी चौराहे की भीड़ में शामिल हो गए।
आधे आनंद की तरफ हो गए और आधे अली का पक्ष लेने लगे। शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। पुलिस आई और दोनों को पकड़ कर ले गई। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे दोनों तो पड़ोसी थे और साथ ही अच्छे दोस्त भी।
अब तक वे समझ गए थे कि दोष तो दोनों का ही था। वे बोले कि हम तो एक दूसरे को समझा रहे थे कि सड़क पर सावधानी से चलना चाहिए था। साहब, दंगे वाली बात तो किसी तीसरे ने ही फैलाई है। और पुलिस आज तक उस तीसरे को खोज रही है जिसने हिन्दू-मुसलमान के दंगे की बात फैलाई थी। तो यह था झूठ जो पँख लगा कर उड़ गया और किसी के हाथ नहीं आया।
हमें गुणों की इस शाश्वत परिभाषा का सम्मान करना चाहिए कि हम हमेशा सत्य का पक्ष लें और किसी के साथ वह व्यवहार न करें जो हम अपने साथ नहीं होने देना चाहते। स्वयं को दूसरे के स्थान पर रख कर सोचें कि मैं उसकी जगह होता तो मुझे कैसा लगता। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस व्यवहार से स्वयं को ग्लानि न हो और दूसरे को प्रसन्नता मिले, वही व्यवहार ‘गुण’ कहलाता है।
केवल किताबी ज्ञान हमें सद्गुण सिखाने में सक्षम नहीं है।
एक तेली अपने बैलों को कोल्हू पर जोत कर तेल निकाल रहा था। उसके बैल कोल्हू घुमा रहे थे और वह बाहर खाट पर बैठा था। तभी दो वकालत में पढ़ने वाले युवक वहाँ से गुज़रे। उन्होंने देखा कि बैलों के गले में घंटी बंधी हुई है और आँखों पर पट्टी। तेली उन्हें हांक भी नहीं रहा, फिर भी बैल अपनी गति से चलते जा रहे हैं।
युवकों ने तेली से पूछा कि ‘तुम तो यहाँ बैठे हो, तुम्हें कैसे पता चलेगा कि बैल चल भी रहे हैं या नहीं।’
‘क्यों? जब तक घंटी की आवाज आती रहेगी, तब तक मुझे पता चलता रहेगा कि बैल चल रहे हैं।’
‘अच्छा! अगर बैल खड़े-खड़े सिर हिलाते रहें तो?’
‘अरे साहब! मेरे बैल वकालत नहीं पढ़े हुए।’
आज हर आदमी चाहता है कि वह विद्वान बने, धनवान बने, पहलवान बने पर इन गुणों के साथ-साथ वह ‘अभिमान’ के अवगुण के चंगुल में भी फंस जाता है जिसके कारण उसके सभी गुण उसी प्रकार छिप जाते हैं जिस प्रकार चमकते सूर्य का तेज़ प्रकाश एक छोटे से काले बादल के पीछे छिप जाता है।
अतः अवगुणों को पहचानें और अपने जीवन को गुणों के प्रकाश से प्रकाशित करें।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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