मिष्टभाषी बनो

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वाणी बने वीणा (8)

मिष्टभाषी बनो

हम वाणी के प्रयोग में सावधानी रख कर ही प्रेम के बीज बो सकते हैं। वाणी में सरसता, मिठास व लोच होना चाहिए। हमारी रसना को मिष्ठान्न तो बहुत अच्छे लगते हैं फिर मीठे बोल बोलने में कंजूसी क्यों?

एक संत अपने शिष्यों के साथ अपने आश्रम में रहते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को हर विद्या में पारंगत बनाया। एक बार संत बीमार हो गए और उन्होंने अपने शिष्यों को समझाया कि लगता है, मेरा अंतिम समय निकट है। बच्चों, तुम सब मिलजुल कर रहना और जहां तक हो सके समाज की इसी प्रकार सेवा करते रहना। सभी शिष्य उदास हो गए। 

तभी एक शिष्य ने कहा कि महात्मन्! अपने अंतिम उपदेश के रूप में हमें कुछ ज्ञान देते जाओ जो हमारे जीवन भर काम आए।

यह सुनकर संत ने अपना मुख खोल कर दिखाया और पूछा कि तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है? शिष्य हैरान हो गए कि क्या बताएं? एक ने हिम्मत कर के कहा कि इसमें तो जीभ दिखाई दे रही है। 

‘और कुछ नहीं दिखाई देता?’

‘नहीं, महाराज!’

‘क्यों? दाँत नहीं दिख रहे।’

‘नहीं, महाराज! पहले तो थे, अब नहीं हैं।’

‘कुछ समझ में आया क्या? जीभ तो जन्म के समय भी हमारे साथ थी और मृत्यु  के  समय भी हमारे साथ है पर दाँत जन्म के बाद मिले और मृत्यु से पहले चले गए। जानते हो क्यों? जीभ में कोमलता व लचीलापन था तो अंत तक टिकी रही और दाँत अपनी कठोरता को नहीं छोड़ सके तो उन्हें समय से पहले ही निकाल दिया गया। इसी प्रकार जो अपनी जुबान में कोमलता व लचीलापन रखते हैं, वे लंबे समय तक लोगों के दिलों में निवास करते हैं, पर जो कठोर शब्दों का प्रयोग करते हैं, वे जल्दी ही भुला दिए जाते हैं। उन्हें अपने दिल-दिमाग से उखाड़ कर फेंक दिया जाता है।

कुदरत को नापसंद है सख्ती बयान में,

पैदा हुई न इसलिए हड्डी जुबान में।

समझदार होती अगर, मुख में पड़ी जुबान,

करते बत्तीस दाँत क्यों, रखवाली दरबान।

अगर लगाई जीभ पर, मन ने नहीं लगाम,

उलटी सीधी बात से मच जाए कोहराम।।

--

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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