अच्छे संस्कार जीवन निर्माण में सहायक
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जीवन में संस्कारों का महत्त्व (3)
अच्छे संस्कार जीवन निर्माण में सहायक
अपने जीवन को उन्नत बनाने के लिए भारतीय मनीषियों ने हमारे लिए 16 संस्कार बनाए थे, जो जन्म से पहले ही शुरू हो जाते थे और जीव को सद्गति में पहुँचाने के लिए अंतिम संस्कार तक चलते थे। इसीलिए दाह-संस्कार को अंतिम संस्कार भी कहा जाता है।
जैन धर्म के अनुसार जिन भव्य जीवों का जन्म संसार के कल्याण के लिए होता है, वे तीर्थ का प्रवर्तन करने वाले तीर्थंकर कहलाते हैं। देवों द्वारा उनके पाँच कल्याणक मनाए जाते हैं - गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, तप कल्याणक और मोक्ष कल्याणक। अभिमन्यु ने माता के गर्भ से ही वीरता के संस्कार ग्रहण कर लिए थे अन्यथा वह चक्रव्यूह में प्रवेश करने का साहस न कर पाता।
किसी को संस्कारित करने का अर्थ है - उसके तन, मन व मस्तिष्क को शुद्ध करना और अभीष्ट गुणों का बीजारोपण करना। जैसे नामकरण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार आदि। विभिन्न संस्कार-विधियों द्वारा शुद्ध व पवित्र मन में अच्छे विचारों का समावेश किया जा सकता है।
इन सभी संस्कारों में केवल विचारों व मन की शुद्धि पर ही बल नहीं दिया जाता अपितु अन्न की शुद्धि का भी विशेष ध्यान रखा जाता था क्योंकि कहा भी गया है कि -
‘जैसा खाओ अन्न, वैसा होवे मन और जैसा पीवे पानी, वैसी होवे बानी।’
पर आज ये कहावतें कागज़ पर ही सिमट कर रह गई हैं। हम न तो भोजन पकाने में शुद्धि का ध्यान रखते हैं और न ही खाने में, तो हमारे मन में अच्छे संस्कार कहाँ से आएंगे। रही सही कसर Junk Food ने पूरी कर दी है जो हमारे तन के साथ साथ मन को भी जंग लगा रही है।
आज के संदर्भ में हम इतना ही कह सकते हैं कि अच्छे संस्कार सिखाए नहीं जाते, दिखाए जाते हैं।
एक पति-पत्नी अपने बच्चे को संत का आशीर्वाद दिलवाने के लिए ले गए। बच्चा पहली बार किसी संत के दर्शन करने जा रहा था। वहाँ जा कर उन्होंने बच्चे से कहा कि महाराज को धोक दो। वह नहीं झुका। जब दो तीन बार कहने पर भी बच्चे ने चरण स्पर्श नहीं किए तो पिता को क्रोध आ गया। वे उसे डांटने लगे कि ‘सुनता नहीं है क्या? हम कह रहे हैं कि महाराज को धोक दो, धोक दो तो क्यों नहीं देता?’
अब तो संत के भी कान खड़े हो गए। उन्हें लगा कि ये कह रहे हैं - ‘महाराज को ठोक दो, ठोक दो।’ उन्होंने सोचा कि बच्चा है, कहीं वास्तव में मुझे ठोक ही न दे। उन्होंने अपना मौन तोड़ा और जब मामला समझ में आया तो बोले कि ‘कोई बात नहीं, बच्चा है; इसे डांटो नहीं। जैसा मैं कहता हूँ, तुम भी वैसा ही करो। क्यों बेटा? ठीक है न!’
‘हाँ, महाराज।’ उन्होंने पति-पत्नी से कहा कि तुम अपने दोनों हाथ जोड़ो। उनको देखकर बच्चे ने भी हाथ जोड़ लिए। अब तुम झुक कर प्रणाम करो तो बच्चे ने भी झुक कर प्रणाम किया।
इसलिए जो संस्कार हम किसी को सिखाना चाहते हैं, पहले खुद उसे अपनाना चाहिए और अपने व अपनी संतान के संस्कारों को पुष्ट करते रहना चाहिए। कई बार बच्चे भी हमें संस्कारित करने का काम करते हैं।
एक व्यक्ति Chain Smoker था। पहली सिगरेट से दूसरी सिगरेट सुलगाता और पहली सिगरेट को वहीं पर फेंक देता। एक दिन उसने देखा कि उसकी ढाई साल की बच्ची ने वह फेंकी हुई सिगरेट उठाई और उसी अंदाज़ से अपने मुँह से लगाने की कोशिश करने लगी। यह देखकर उसे महसूस हुआ कि क्या मैं अपने बच्चों को यही संस्कार दे रहा हूँ और उसने उसी समय सिगरेट पीना छोड़ दिया।
जब एक माँ अपने बच्चे को चाँटा मारती है तो अबोध बच्चा भी अपना छोटा सा हाथ उठाता है। माँ उसे और पीटती है कि ‘मुझ पर हाथ उठाता है!’ क्या इस तरह उसे समझ में आएगा कि उसने कहाँ गलती की है? हम बच्चे को गाली दे कर समझाने की कोशिश करते हैं कि ‘........ मुझे गाली देता है, तेरी इतनी हिम्मत!’
यह तो वही बात हो गई कि हम कीचड़ से कीचड़ धोने की कोशिश कर रहे हैं। आप यह बताएं कि क्या कीचड़ से मैल धुल सकता है? मैल तो साफ़ पानी से ही धुल सकता है और उससे ही धुलेगा। यह बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए।
जब तक हम स्वयं गाली देना या मारना-पीटना नहीं छोड़ेंगे तब तक बच्चे से ऐसी उम्मीद करना बेकार है।
यह बात हमेशा याद रखें कि पानी का स्वभाव है ढलान की ओर बहना और मनुष्य का स्वभाव है बुराइयों की तरफ़ आकृष्ट होना। जहां हमें मनोरंजन के साधन दिखाई देते हैं, जहां मनभावन पकवान खाने को मिलते हों यानि जहां हम स्वयं जाना चाहते हैं वहीं जाने की उत्सुकता दिखाते हैं और जहां हमें जाना चाहिए, जो हमारे मन-मस्तिष्क का पोषण करे या जहाँ से हमें अच्छे संस्कार मिलें, वहां हम जाने से कतराते हैं।
पानी को ऊपर चढ़ाने के लिए यंत्र की आवश्यकता होती है और अच्छे संस्कार को सुदृढ़ करने के लिए मंत्र की आवश्यकता होती है। अच्छे संस्कार प्राप्त करने के लिए अच्छे लोगों की संगति सबसे बड़ा मंत्र है।
“जैसा खाए अन्न - वैसा होवे मन“
बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा ।
सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है, तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।
एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजन-प्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की।
साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खाई।
दोपहर का समय था। सेठ ने कहा - “महाराज! अभी आराम कीजिए। थोड़ी धूप कम हो जाये फिर प्रस्थान कर लेना।
साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली।
सेठ ने उस कमरे में 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ चादर से ढँककर रखी हुई थी।
साधु बाबा आराम करने लगे।
खीर थोड़ी हजम हुई। साधु बाबा के मन में आया कि देखूँ! इस चादर के नीचे क्या है? उसने देखा कि इतनी सारी नोटों की गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा?
साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली।
शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।
सेठ दूसरे दिन रुपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली।
सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे.................. ?
बस! नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।
इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोले - “नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।“
सेठ ने कहा - “महाराज! आप क्यों लेंगे? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरू हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आए हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते हैं।”
साधु ने कहा - “यह दयालुता नहीं है। मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था।”
साधु ने कहा - “सेठ ....तुम सच बताओ कि तुम ने कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी .......... ।”
सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी और अपने को पाप से बचाने के लिए आपको खिला दी।
साधु बाबा - “चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि हे राम .... यह क्या हो गया? मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी। इसलिए मैं तेरे पैसे लौटाने आ गया।”
इसीलिए कहते हैं कि.........
“जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन।”
“जैसा पीओ पानी ... वैसी होवे वाणी।”
“जैसी शुद्धि ... वैसी बुद्धि।”
“जैसे विचार ... वैसा संसार।”
“जैसी संगत ... वैसी रंगत।”
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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धन्यवाद।
Very eye opener story. The whole message on sanskaar is very well written
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