संस्कारों का प्रभाव - वैज्ञानिक दृष्टिकोण

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जीवन में संस्कारों का महत्त्व (2)

संस्कारों का प्रभाव - वैज्ञानिक दृष्टिकोण

यदि हम इसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर विचार करें तो श्री के. सी. गुप्ता (रिटायर्ड इलैक्ट्रिकल इंजीनियर) द्वारा लिखित ‘एकाग्रता योग’ नामक पुस्तक से ज्ञात होता है कि कोई घटना चाहे सुखद हो या दुःखद, उसके विषय में विचार करने पर एक संवेदना उत्पन्न होती है। इस पुस्तक की Editing का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। 

वे लिखते हैं कि हम उस सुखद या दुःखद अनुभव को जितना अधिक पसंद या नापसंद यानि Like या Dislike करते हैं, उसी अनुपात में हमारे शरीर में Bio-Chemical-Reaction होने से अम्ल (Acid) की उत्पत्ति होती है। अधिक Acid बनने से वह संवेदना संस्कार बन कर हमें कई घातक बीमारियों का शिकार भी बना देती है। जैसे ख़ुशी का प्रसंग याद आते ही मन का पुलकित या रोमांचित हो जाना और दुःखद घटना की याद आने पर पसीना आना, घबराहट, दर्द, तनाव की अनुभूति होना या High B.P. हो जाना आदि। इस प्रकार उस घटना से संबंधित विचार हमारे चेतन मन (Conscious Mind) में दृढ़ता पूर्वक स्थिर हो जाते हैं जिन्हें हम कभी भुला नहीं पाते। इसलिए स्वस्थ व खुश रहने के लिए हमें अच्छे विचारों को ही अपने मन में स्थान देना चाहिए।

एक महात्मा जी समय-समय पर विद्यालयों में जाकर संस्कारशाला का आयोजन करते थे ताकि बच्चों में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण किया जा सके। उन्होंने बच्चों से एक प्रश्न पूछा कि बताओ, हमारे देश में  कितने महापुरुष पैदा हुए हैं?

वैसे मुनि श्री तरुणसागर जी के अनुसार एक कुशल वक्ता बीच-बीच में प्रश्न पूछता रहे तो सुनने वाले जागते रहते हैं, वरना वह बोलता रहता है और सुनने वाले सोते रहते हैं। एक स्थान पर भाषण हो रहा था और आगेवाली लाइन में एक सेठ जी सो रहे थे। वक्ता उन की ओर देखता तो बार-बार उस का ध्यान भंग हो जाता। 

वक्ता ने आख़िर पूछ ही लिया - 'सेठ जी, सो गए क्या?' 

वे बोले - 'नहीं तो।' 

कुछ समय बाद फिर वही हाल। फिर पूछा - 'सेठ जी, सो गए क्या?' 

वे बोले - 'नहीं तो।'

पर नींद तो और गहरी हो गई। 

अब की बार वक्ता ने पूछा - 'सेठ जी, जाग गए क्या?' 

वे बोले - 'नहीं तो।' 

फिर तो सभा के ठहाकों से ही उनकी नींद खुली। 

हाँ, तो चलो। महात्मा जी के पास संस्कारशाला में चलते हैं। महात्मा जी ने प्रश्न पूछा कि बताओ, हमारे भारत देश में कितने महापुरुष पैदा हुए हैं?

तो बच्चे बोले कि बस! इतनी सी बात। यह प्रश्न तो बहुत आसान है। किसी ने कहा - महात्मा गांधी, किसी ने सुभाष चंद्र बोस, किसी ने भगत सिंह, किसी ने गुरु नानक देव। महात्मा जी बोले कि किसी का भी उत्तर ठीक नहीं है। अब तो बच्चों के साथ-साथ अध्यापक भी सोचने लगे कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं? 

महात्मा जी ने कहा कि लगता है, तुमने मेरा प्रश्न ध्यान से नहीं सुना। कभी-भी कोई महापुरुष पैदा नहीं होता है। पैदा तो बच्चा ही होता है। उसके महान कार्य ही उसे महापुरुष बनाते हैं। 

आप किसी महापुरुष की जीवनी पढ़ोगे तो उसमें यह पंक्ति अवश्य लिखी हुई मिलेगी कि उनके मन में बचपन से ही देश भक्ति, जन कल्याण, भगवद्भक्ति आदि के संस्कारों का बीजारोपण हो गया था। महात्मा गांधी ने भी बचपन में सत्यवादी हरिश्चन्द्र का नाटक देखा और श्रवणकुमार की कहानी पढ़ी तो उन घटनाओं का प्रभाव उनके मन मस्तिष्क पर सत्य, अहिंसा आदि का संस्कार बन कर स्थापित हो गया जिसने उन्हें महात्मा बना दिया। उनकी महानता के कारण ही भारतीय Currency पर उन की फोटो छापी जाती है। 

कहा जाता है कि पूत के पाँव तो पालने में ही दिख जाते है कि वे किस रास्ते पर चलने वाले हैं। इस प्रकार हरेक के जीवन में कोई न कोई ऐसी घटना घटती है जिसे वह कभी नहीं भुला पाता। केवल बचपन की घटनाएं ही नहीं, ऐसे कई कारण हैं जो हमारे वर्तमान जीवन के संस्कारों को प्रभावित करते हैं - जैसे पूर्वजन्म के संस्कार, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक माहौल, अच्छी संगति आदि। 

यदि माली एक अच्छी गुणवत्ता वाले बीज को बोने के बाद उचित खाद पानी देता है तो उस छोटे से बीज को विशाल वृक्ष बनने से कोई नहीं रोक सकता। एक मोटे तने वाला विशाल वृक्ष अपनी अनेक डालियों और पत्तों को फैलाए शान से खड़ा था। एक-इन्द्रिय जीव होते हुए भी वह लोक कल्याण में लगा हुआ था और स्वयं को धन्य मान रहा था। अनेक यात्री और जीव-जन्तु उसकी छाया में विश्राम करते, अनेक पक्षी उस पर अपना घौंसला बना कर रहते और दिन भर उनकी चहचहाहट सुन कर वृक्ष भी आनन्दित रहता था। 

तभी वर्षा के दिनों में उसके नज़दीक एक छोटे पौधे ने जन्म लिया। जैसे एक नवजात शिशु आँखें खोलकर दुनिया को देखने की कोशिश करता है, वैसे ही उस नन्हे पौधे ने जब अपने समीप एक विशाल वृक्ष को खड़े देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। तभी एक हल्का-सा हवा का झौंका आया तो वह नन्हा पौधा काँपने लगा, पर उसने देखा कि वृक्ष तो उसी तरह सिर उठाए खड़ा था। उसने वृक्ष दादा से कहा कि दादा! मैं तो हल्के-से हवा के झौंके से ही काँप गया। मैं भी आपके समान ऊँचा व मज़बूत बनना चाहता हूँ ताकि जीवन में आने वाला बड़े-से-बड़ा तूफान भी मुझे हिला न सके। मुझे भी इसका रहस्य बताओ। 

वृक्ष ने उत्तर दिया कि तुम मेरी ऊँचाई और लम्बाई को ही देख पा रहे हो पर मेरी मज़बूती का रहस्य मेरी गहराई में छिपा हुआ है। हमारी जड़ें जितनी अधिक गहराई तक ज़मीन को पकड़ कर रखेंगी, हम उतनी ही अधिक ऊँचाई और दृढ़ता को प्राप्त कर सकेंगे। 

ठीक इसी प्रकार यदि हम भारतीय संस्कृति की जड़ों को मज़बूती से पकड़े रहेंगे तो हम सुसंस्कारवान बन कर अपने भारत को फिर से विश्वगुरु बना सकते हैं और यदि हम पाश्चात्य संस्कृति की अंधी दौड़ में ही भागते रहे तो वही बात हो जाएगी कि कौआ चला हंस की चाल और अपनी चाल भी भूल गया। या हम इस को उलट कर भी कह सकते हैं कि हंस चला कौए की चाल .............।

हमारी प्राचीन संस्कृति हंस की तरह उजली और गौरवशाली है, जिसमें विश्वगुरु बनने की योग्यता आज भी विद्यमान है। हमें कौए की तरह काला बन कर इस पर कालिख नहीं लगानी है।

अतः अपने पूर्वजों द्वारा दिए गए उच्च विचारों की संस्कृति व संस्कारों की रक्षा करना हमारा पहला कर्त्तव्य है। संस्कृति की रक्षा ही संस्कारों को सुरक्षित रख सकती है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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