खुशी प्राप्त करने के साधन

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Tips of Happiness

जानें कुछ व्यवहारिक सूत्र (5)

खुशी प्राप्त करने के साधन

हम अपने भीतर से खुशी को प्रकट करना चाहते हैं पर कैसे?

हमें यह तो मालूम होना चाहिए कि आखिर खुशी प्रकट करने के साधन कौन-से हैं? 

वास्तव में हमारी आत्मा का स्वभाव है - अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख; जो असीम शांति प्रदान करने वाला है। स्वभाव हमें खुशी देता है और विभाव हमें दुःख देता है।

स्व-भाव का अर्थ है - अपना वास्तविक गुण।

जैसे पानी का स्वभाव है - शीतलता। पानी हमेशा अपने स्वाभाविक गुण अर्थात् सम तापमान में रहना चाहता है। न अधिक गर्म और न अधिक ठंडा। यदि हम उसे स्वभाव के स्थान पर विभाव में लाना चाहें तो वह असहज हो जाता है।

मान लो हम उसे फ्रिज़ में रख देते हैं तो वह अधिक ठंडा हो जाएगा और फ्रीज़र में रख दें तो जम कर बर्फ में बदल जाता है, लेकिन जैसे ही उसे बाहर निकाला जाएगा वैसे ही वह शीघ्रातिशीघ्र अपने वास्तविक स्वभाव में आने की कोशिश में लग जाएगा।

इसी प्रकार अग्नि का स्वभाव है - उष्णता। अग्नि अपने संसर्ग में आने वाली हर वस्तु को उष्ण बना देती है। यदि पानी को अग्नि का संयोग मिल जाए तो वह कुछ समय बाद गर्म होने लगता है अर्थात् स्वभाव से विभाव में आ जाता है, पर संयोग को दूर करते ही वह फिर अपने वास्तविक स्वभाव में आने का प्रयास करेगा और कुछ समय बाद सम तापमान में आ जाएगा।

यही हमारे मन की दशा है। हमारा स्वभाव है - शांति और सुख। हम न तो अधिक खुशी सहन कर सकते हैं और न अधिक देर तक दुःखी रह सकते हैं। इन दोनों अवस्थाओं में अधिक समय तक रहना हमारे दिल व दिमाग़ दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। अधिक खुशी से भी लोगों के हार्ट फेल होते देखे गए हैं और अधिक देर तक दुःखी रहने वाले सारी उम्र के लिए अवसाद में भी जा सकते हैं।

इसलिए खुशी प्राप्त करना चाहते हो तो समभाव में रहना ही इसका एकमात्र साधन है।

कहा गया है - 

Excess of everything is bad.

एक ही सिद्धांत अपना लेना चाहिए कि

‘न काहू से दोस्ती और न काहू से बैर।’

जीवन में दुःख आ जाए तो यह सोच लेना चाहिए कि रात के बाद कभी सुख का दिन भी आएगा और सुख अधिक आ जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि जब तक सुख है, इसका आनन्द ले लो। दिन के बाद रात भी आ सकती है।

विपरीत परिस्थितियों में हमारे मन में तनाव उत्पन्न हो जाता है। उसे दूर करने के लिए हमारे अंदर उनका सामना करने की शक्ति का होना बहुत आवश्यक है।

एक बार एक गुरु ने अपने शिष्य को ऐसे नगर में जाने से मना किया, जहाँ के लोग दुष्ट व हिंसक प्रवृत्ति के थे। गुरु जानते थे कि वहाँ जाने पर वे हमारी शांति को भंग कर देंगे, पर शिष्य ने कहा कि जो स्वयं खुश नहीं होता, वह दूसरे को पीड़ा के सिवाय और क्या दे सकता है?

ऐसे लोगों को पीड़ा से बचाने के लिए ही तो मैं वहाँ जाना चाहता हूँ ताकि उन्हें भगवान का पवित्र संदेश सुना कर खुशी का मार्ग दिखा सकूँ। वरना वे इसी प्रकार अज्ञान की जंज़ीरों में जकड़े रहेंगे और सारी उम्र दुःख और क्लेश में बिता देंगे।

शिष्य के अधिक आग्रह पर गुरु ने कहा कि ठीक है, पर जाने से पहले तुम्हें मेरे कुछ प्रश्नों का जवाब देना होगा।

गुरु - यदि तुम्हें देखते ही उन लोगों ने गालियाँ देनी शुरू कर दी तो तुम क्या करोगे?

शिष्य - गुरु जी! मैं सोचूंगा कि वे कितने अच्छे हैं! केवल गालियों से ही स्वागत कर रहे हैं, चांटा तो नहीं मार रहे।

गुरु - यदि वे तुम्हें चांटा या घूंसे मारें तो!

शिष्य - गुरु जी! तब मैं सोचूंगा कि वे कम-से-कम लाठियाँ लेकर तो नहीं आए। मैं उनकी दुष्ट प्रवृत्ति को शांत करने ही तो आया हूँ।

गुरु - यदि वे तुम्हें लाठियों से मारने लगें तो!

शिष्य - गुरु जी! तब भी मैं उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करूँगा कि वे मेरा गला तो नहीं काट रहे। उनके जीवन में खुशी लाना ही मेरा पहला ध्येय है।

गुरु - यदि वे तुम्हारा गला काटने के लिए आगे बढ़ें तो तुम्हारे पास पीछे हटने के सिवा कोई उपाय नहीं रहेगा।

शिष्य - नहीं गुरु जी! मैं अपने लक्ष्य को पूरा किए बिना वहाँ से नहीं आऊँगा। तब भी मैं भगवान को धन्यवाद दूँगा कि मेरा जीवन उनके लिए खुशी का मार्ग खोलने के काम आ रहा है। चाहे मेरे प्राण ले लो, पर उन्हें हिंसा के मार्ग पर जाने से रोक लो।

शिष्य अपनी परीक्षा में पास हो गया और गुरु ने उसे ऐसे गाँव में जाकर शांति का संदेश सुनाने की आज्ञा दे दी।

यह है ‘सकारात्मक सोच’ की चाबी, जो हमारे मन में छिपे खुशी के खज़ाने को खोल सकती है।

जब हम दूसरे की मदद करते हैं तो खुशी हमारे पास स्वयं ही आ जाती है, जैसे भाई की नाव पार कराने के प्रयत्न में अपनी नाव भी स्वयं ही पार हो जाती है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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