अनमोल उपहार
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अनमोल उपहार
Image by Manfred Richter from Pixabay
पापा जी.... पापा जी.... आपसे कुछ पूछूं?
हां मेरी प्यारी-सी राजकुमारी! पूछो।
आप रोज रात में इतनी देरी से क्यों आते हो?
मैं और आराध्या दोनों सो जाती हैं। हम दोनों बहनों का बड़ा मन होता है कि हम भी परी और शानू की तरह अपने पापा के साथ खेलें। छः वर्षीय आध्या ने अपने पापा मोहनबाबू के गालों को चूमते हुए पूछा।
बिटिया मन तो मेरा भी करता है आप दोनों के साथ खेलने का। मगर क्या करूँ? मजबूरी ऐसी है कि....
मजबूरी! कैसी मजबूरी पापा जी! पांच वर्षीय आराध्या भी मोहनबाबू के गले लगकर बडे प्यार से बोली।
अच्छा! तो आपको भी जानना है। बेटा, मेरी फैक्ट्री हमारे घर से बहुत दूर है। वहाँ से पैदल आता हूँ न!
तो पापाजी आप भी एक साईकिल ले लो न! शानू के पापा की तरह। वो ट्रिन-ट्रिन करते हुए आते हैं।
अच्छा मेरी बेटियों! ले लूँगा जब पैसे इकट्ठे हो जाएंगे। जाओ, अब तुम दोनों जाकर खेलो।
आध्या .... आराध्या .... चलो, अपने पापा को सोने दो बेटा। आज रविवार का ही तो दिन मिलता है उन्हें। चलो शाबाश। बाहर खेलो। सुधा दोनों बेटियों से बोली।
दोनों मुँह बनाते हुए बाहर जाकर बैठ गई।
थोडी देर में सुधा बाहर आई। दोनों को उदास देखकर बोली, क्या हुआ! तुम दोनां यहां क्यों बैठी हो? खेल लो।
नहीं मम्मी! पहले ये बताओ, पापा के पास साईकिल क्यों नहीं है?
बेटा वो ….
मम्मी प्लीज! सच-सच बताओ न। आराध्या बोली।
आराध्या! तुम्हारे पापा के पास एक साईकिल तो थी मगर एक बार चोरी हो गई थी।
तो पापा दूसरी क्यों नहीं ले लेते मम्मी, इस बार आध्या बोली।
बेटा हमारे हालात ऐसे नहीं हैं। वहां गांव में तुम्हारे दादाजी, दादीजी, बुआजी और यहां हम। हमारे लिए खान-पान, घर-खर्च, तुम दोनों की पढ़ाई, घर का किराया, इन सब में कुछ बचता भी तो नहीं। इसलिए तो मैं भी समय निकालकर सिलाई करती हूँ लोगों के कपड़ों की।
ओह! दोनों एक साथ बोली।
सुधा के अंदर जाते ही दोनों बहनों ने एक दूसरे की ओर देखा। बहिन आराध्या, इसका मतलब पापा के पास पैसे नहीं बचते, इसलिए वो अपनी फैक्ट्री पैदल आते- जाते हैं।
हां दीदी! इसीलिए वो देरी से आते है और जल्दी चले जाते हैं।
बहिन आराध्या! कुछ सोचना पड़ेगा, आध्या बोली।
क्या? हम तो छोटे-छोटे बच्चे हैं दीदी, आराध्या बोली।
तुझे याद है, पापा रोज़ हमें जेबखर्ची के लिए मम्मी को पांच-पांच रुपये देकर जाते है जो हम दोनों अक्सर अपनी ड्रेस के लिए गुल्लक में जोड़ती रहती हैं।
हां दीदी, तो!
तो हम अपनी गुल्लक तोड़कर देखते हैं, कहते हुए आध्या के चेहरे पर चमक आ गई।
अरे वाह दीदी! चलो! आराध्या बोली।
शशशशशशश .... आराम से। पापा सो रहे हैं और मम्मी को बताएंगे मगर बाद में। चल अभी। कहकर आध्या, आराध्या का हाथ थामे हुए चल पड़ी। दोनों ने चुपचाप अपनी गुल्लक तोड़ दी। सारे सिक्के और रुपये गिनने के बाद कुल सात सौ रुपये निकले। पैसे गिनने के बाद दोनों निराश हो गई।
बहिन आराध्या! इतने में साईकल नहीं आएगी। मैंने शानू की मम्मी को कहते हुए सुना था, पूरे हज़ार रुपये की आई है उनकी साईकिल।
तो दीदी, अब क्या करें! आराध्या उदास होते हुए बोली।
चल! मम्मी से पूछते हैं, शायद कुछ बात बन जाए।
दोनों ने सुधा को जाकर पूरी बात बताई तो वह भी रो पड़ी। दोनों बच्चियों को गले लगाकर वह बोली - कितनी प्यारी, कितनी मासूम सोच है तुम्हारी। रुको, मैं भी कुछ ढूंढती हूँ, कहकर सुधा चावलों और दालों के डिब्बों को टटोलने लगी। आखिर उसकी मेहनत रंग लाई और उसकी बचत के रूप में साढ़े तीन सौ रुपये इकट्ठा हो गए। अब तीनों की एकत्रित जमा राशि एक हजार पचास रुपये थी। सुधा मोहन को जगाने के लिए जाने लगी तो आध्या ने रोक दिया। मम्मी! पापा को उपहार स्वरूप देंगे वरना वह नहीं लेंगे साईकिल। कोई बहाना बनाकर मना कर देंगे।
सुधा की ओर देखकर आराध्या भी यही बोली।
ठीक है! सुधा मुस्कुरा कर बोली।
अगले दिन तीनों एक पुरानी साईकल की दुकान पर पहुँच गए और दूर से खड़े होकर साईकिलों को देखते रहे।
दुकानदार बहुत देर से देख रहा था सो उसने उन्हें बुला कर पूछा - क्या बात है बहनजी? बच्चों के लिए साईकिल लेनी है क्या।
सुधा कुछ कहे, इससे पहले आध्या और आराध्या ने अपने दिल की बात बता दी। अंकलजी! हमें पापाजी के लिए साईकिल चाहिए वो रोज़ हमारे लिए पैदल चलकर फैक्ट्री आते-जाते हैं।
दोनों बच्चियों की बात सुनकर दुकानदार की आँखें भी भीग उठी। उसने एक पुरानी पर अच्छी वाली साईकल दिखाई तो दोनों बच्चियां वहीं खुशी से उछल पड़ी।
कितने की है, अंकलजी!
बेटा! इसकी कीमत का तुम्हारे एहसासों से कोई मुकाबला नहीं है। मैंने इसे खरीदकर सही रूप में तैयार करके लगभग बारह सौ तक बेचने की सोची थी मगर तुम दोनों की बातों को सुनकर मुनाफा कमाने की सोचना भी पाप लगता है। तो तुम इसकी खरीद मात्र आठ सौ रुपये ही दे दो।
सचमुच, अंकलजी! दोनों बच्चियां एक साथ बोली।
उन्होंने दुकानदार को आठ सौ रुपये देकर साईकिल ले ली।
रात को जब मोहन थकाहारा फैक्ट्री से घर लौटा तो साईकल घर के अंदर खड़ी थी और दोनों बेटियां छुपकर देख रही थी पापा के चेहरे को।
मोहन ने यूँ ही साईकल को देखा तो वह सोच में पड़ गया। उसने इधर-उधर देखा और फिर साईकिल पर ऐसे स्नेह भरा हाथ फिराने लगा मानो वह कोई छोटा-सा बच्चा हो। इससे पहले वो सुधा से साईकिल के बारे मे पूछता कि ये किसकी है तभी आध्या और आराध्या उसके सामने ताली बजा कर नाच उठी। पापा जी! कैसा लगा उपहार!
उपहार! मोहन ने सुधा की ओर देखा तो वह भी भीगी हुई पलकों को साफ करते हुए बोली - जी! आपकी बेटियों ने आपके लिए अपनी ओर से उपहार खरीदा है और तमाम बातें बताने लगी। मोहन की आँखों से आँसू बहने लगे। वह तुरंत दोनों बच्चियों से लिपट गया।
और बोला, सचमुच ये तो उसके लिए अनमोल उपहार है क्योंकि इसमें उसके परिवार का प्यार और एहसास जुडा हुआ है। थैंक्यू मेरे बच्चों! कहकर आध्या और आराध्या दोनों को सीने से लगा लिया।
तभी आराध्या बोली! पापा इसमें मम्मी का भी प्यार जुड़ा है, तो उन्हें भी ....
लग रहा था कि एक सुखी परिवार सबको एकजुटता का संदेश दे रहा हो।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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