सुख की तलाश
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सुख की तलाश
हफ़ीज अफ्रीका का एक़ किसान था। खेती करता और जो ईश्वर इच्छा से प्राप्त हो जाता, रब का शुक्रिया किया करता। वह अपनी ज़िन्दगी से ख़ुश और सन्तुष्ट था।
अफ्रीका में हर जगह हीरे की खदानें थी। जहां से लोग हीरे तलाश कर दुनिया भर में बेचते और धनवान होते जाते। पर हफीज अपनी मेहनत से जो बन पड़ता, अपना और अपने परिवार के लिये पूर्ण पाता और उसमें ही अपने परिवार के साथ खुशी से सुख पूर्वक गुज़र बसर करता।
एक दिन हफीज का एक रिश्तेदार उसके घर पर आया। वह हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी था। उसने हफीज को अफ्रीका में रहते हुये इस तरह गरीबी में रहते देखा तो उसे समझाने लगा - तुम हीरों का काम करो! जितनी मेहनत तुम खेती में करते हो, उसके मुकाबले में कमाते ज़रूरत भर हो। अगर इतनी मेहनत तुम हीरे ढूंढने में लगाओ तो कहाँ से कहाँ पहुँच जाओगे। छोटे से छोटा हीरा भी बेशकीमती होता है और अगर कहीं अपने अंगूठे भर का भी हीरा पा लो तो तुम एक पूरा शहर खरीद सकते हो। और कहीं मुट्ठी भर हीरा मिल जाये तो पूरा अफ्रीका तुम्हारा होगा। सोचो क्या सुख नहीं होगा तुम्हारे पास। हर सुख और सुविधायें, बड़ा घर, गाड़ियां, बच्चों और परिवार के ऐशोआराम की सभी जरूरतों का सामान।
वह रिश्तेदार ये बातें कर शाम को अपने घर लौट गया। पर अपने पीछे एक चिंतित हफीज को छोड़ गया। आज उसे अपनी मेहनत की कमाई लानत लग रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि वह बेकार में ही आदर्शवादी बना फिरता है। उसके जानने वाले सभी कहाँ से कहाँ पहुंच गये और वह आज भी वहीं का वहीं है। आज उसे अपनी खुद्दारी बोझिल सी लग रही थी। उस रात हफीज सो न सका। उसके मन में आज सन्तुष्टता की बजाये असंतुष्टता घर कर गई थी इसीलिये वह आज दुखी था।
अगले दिन सुबह हफीज काम पर नहीं गया। उसने अपने परिवार को बुला अपनी सारी बात उनके सामने रखी। अब मुझे जीवन का मकसद मिल गया है। हमें भी अब अमीर होना है। अपने पति में यह परिवर्तन देख उसकी पत्नी ने समझाना चाहा, “हम अपनी छोटी सी दुनिया में बहुत सुख से हैं। नहीं चाहिये हमें कोई अन्य सुख सुविधायें। आप अपना यह विचार त्याग दीजिये।”
पर अब हफीज पर अमीर बनने का जुनून सवार हो चुका था। हफ़ीज ने अपने खेतों को बेचकर कुछ पैसे पत्नी को गुजर बसर के लिये दिये और हीरे खोज़ने के लिये रवाना हो गया। वह हीरों क़ी ख़ोज में पूरे अफ्रीका में भटकता रहा, बहुत परिश्रम भी किया पर उन्हें पा न सका। फिर भी वह मायूस न हुआ उसने और आगे जाने की सोची।
उसने उन्हें यूरोप में भी ढूंढा पर वे उसे वहां भी नहीं मिले। स्पेन पहुंचते-पहुंचते वह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुका था। उसका सारा धन समाप्त हो चुका था। उसके पास उस दिन के खाने भर के लिये भी पैसे नहीं थे फिर भी वह भटकता रहा कि काश मुझे कोई हीरा मिल जाये। पर आखिर वह इतना मायूस हो चुका था कि उसने बर्सिलोना नदी में कूदकर ख़ुद-कुशी कर अपनी जान दे दी।
इधर जिस आदमी ने हफ़ीज के ख़ेत ख़रीदे थे वह एक दिन उन ख़ेतों से होकर बहने वाले नाले में अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था। तभी सुबह के वक्त उग रहे सूरज की किरणें नाले के दूसरी ओर पड़े एक पत्थर पर पड़ी और वह इंद्र धनुष क़ी तरह जगमगा उठा। बहुत ही सुंदर लग रहा था वह जैसे बर्फ को किसी ने किसी टोकरे में रख दिया हो।
यह सोचकर कि वह पत्थर उसकी बैठक में अच्छा दिखेगा, उसने उसे उठा कर अपनी बैठक कक्ष में सजा दिया। संजोग से आज वही हफीज का रिश्तेदार ख़ेतों के इस नए मालिक़ के पास आया। उसने उस जगमगाते हुए पत्थर को देखा तो हैरानी से उछल पड़ा। ओह! इतना बड़ा और बेशकीमती पत्थर! उसने जमीन के नये मालिक से पूछा - क्या हफ़ीज लौट आया? नए मालिक ने जवाब दिया - नहीं, लेक़िन आपने यह सवाल क्यों पूछा?’
‘अमीर रिश्तेदार आदमी ने ज़वाब दिया - क्योंकि यह हीरा है। मैं उन्हें देखते ही पहचान जाता हूँ। नए मालिक ने कहा - नहीं, यह तो महज एक़ पत्थर है। मैंने उसे नाले के पास से उठाया है। चलिए, मैं आपको दिखाता हूँ। वहां ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैं। उन्होंने वहां से बहुत सारे पत्थर उठाए और उन्हें जांचने परखने के लिये भेज दिया। वे सभी पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होंने पाया कि उस ख़ेत में दूर-दूर तक़ हीरे दबे हुए थे। जमीन का नया मालिक दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन चुका था।
कथा सार -
परमात्मा ने मुझे और आप सभी को अपनी प्रारब्ध अनुसार भरपूर बख्शा हुआ है। जो इस नेमत को न देख कर और-और-और की चाह में भटकते हैं, वे सदा दुख ही पाते हैं। उसकी नेमत को देख अपनी भरपूरता का अनुभव कर सदैव मालिक का शुक्रगुज़ार होने में ही वास्तविक सुख है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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