मेरे पति मेरे देवता (भाग - 13)

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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 13)

श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं

श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी

प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)

हंसते-हंसते जेल-यात्रा

रात के लगभग 9 बजे अम्माजी आई। हमने शास्त्री जी की गिरफ्तारी का हाल बताया। अम्माजी को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने पूछा - ‘तुमने बचवा को ठीक से पहचाना था?’

‘हाँ, वे टोपी लगाए लॉरी के बिल्कुल किनारे बैठे थे और इधर मकान की तरफ़ देख रहे थे।’ हमने शास्त्री जी के हाथ हिलाने वाली बात छिपा ली। वह कुछ छिपाने जैसी ही बात थी।

‘टोपी तो सभी लगाते हैं। वह बचवा नहीं, कोई और होगा। तुम पहचान नहीं पाई हो। चला! सब लोग खाना-वाना खाओ।’

एक तो तबियत ख़राब, दूसरे दिल में हौल, खाना कहाँ खाया जा सकता था? फिर भी अम्माजी को दिखाने के लिए हम 2-4 कौर खा कर उठ पड़ी। अम्माजी सोते समय रामायण सुनती थी, इसलिए रामायण लेकर उनकी खटिया के पास बैठ गई और सुन्दर-काण्ड सुनाने लगी। थोड़ी देर बाद अम्माजी सो गई। हम रामायण पढ़ती रही। चूल्हे की आग को अभी बुझाया नहीं था। हो सकता था, शास्त्री जी रात में आ जाते। ऐसा विश्वास अम्माजी के कहने पर हमें हो गया था, जबकि होना नहीं चाहिए था क्योंकि हमने अपनी आँखों से उन्हें लॉरी में जाते देखा और पहचाना था।

लगभग 11 बजे किसी ने दरवाज़े को थपथपाया। पहले हम हड़बड़ा कर उठ पड़ी, लेकिन बाहर आकर रुक गई। शास्त्री जी जिस तरह थपथपाया करते थे, उस तरह की थपथपाहट नहीं थी। हमने लौटकर अम्माजी को जगाया। अम्माजी ने जाकर दरवाज़ा खोला। जो सज्जन आए थे, उन्हें शास्त्री जी ने भेजा था। शास्त्री जी कोतवाली में बन्द थे।

अम्माजी ने उनको अन्दर बिठाया। हमसे पूरियां बनाने को कहा। हम रुआंसी हो गई और ऐसा मालूम पड़ा कि आँखों से आँसू बह निकले। हमारी रुलाई कोई देख न ले, इसलिए जल्दी से चौके में घुसकर चूल्हा फूंकने लगी। हमारी ननदें भी जग गईं थी और उन्हें भी रुलाई आ रही थी। पर वे लोग भी हमारी तरह अपनी रुलाई को छिपाने की कोशिश कर रही थी।

पूरियां लेकर अम्माजी उन्हीं सज्जन के संग कोतवाली गई। यद्यपि शास्त्री जी और दूसरे सत्याग्रही खाना खा चुके थे, तथापि अम्माजी के कहने पर शास्त्री जी ने एक पूरी खा ली। लौट कर आने पर अम्माजी ने हमें पूरियां थमाते हुए कुछ खाने के लिए मज़बूर किया। उन का कहना था - ‘जब बचवा सत्याग्रह करके हंसते हुए जेल जा रहे हैं, तब तुम्हारा ख़ाली पेट सो रहना अशुभ होगा।’

हमें अम्माजी की आज्ञा का पालन करना पड़ा। रात भर बहुत कोशिश करने पर भी नींद नहीं आ सकी थी। धीरज बंध नहीं पाता था और आँखें भर-भर आती थी।

क्रमशः

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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