मेरे पति मेरे देवता (भाग - 15)
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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 15)
श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं
श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी
प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)
कान पकड़ कर वायदा
शास्त्री जी के जेल जाने से पहले की दो-तीन घटनाएं हम बताना भूल गई। लीडर रोड के मकान में आने के कुछ ही दिनों बाद हमारे सामने एक बड़ी विचित्र समस्या आ खड़ी हुई। शोलापुर में कांग्रेस से सम्बन्धित कोई काण्ड हो गया। क्या हो गया था, यह मुझे याद नहीं है। उस काण्ड के कारण मार्शल-ला लग गया था, लेकिन फिर भी देश के कोने-कोने से कांग्रेस के वालेंटियर वहाँ जा रहे थे और गोलियों का शिकार हो रहे थे। शास्त्री जी ने भी अपना नाम वहाँ भेज दिया था। जब टंडन जी (राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन) को यह बात मालूम हुई, तब उन्होंने शास्त्री जी को हर तरह से समझाते हुए न जाने की सलाह दी, पर शास्त्री जी अपनी बात पर अडिग रहे। टंडन जी को बड़ी चिन्ता हुई।
और कोई उपाय न देखकर उन्होंने हमारे पास कहला भेजा कि हम अम्माजी से कह कर उन्हें रोकने का यत्न करें। हमारी आधी जान तो वहाँ जाने की ख़बर सुनकर ही सूख गई। हमने तुरन्त अम्माजी को बताया और शास्त्री जी को जाने से रोकने के लिए कहा। अम्माजी थेड़ी देर तो चुप रही, पर फिर धीरे से बोली - ‘ना, हम बचवा को वहाँ जाने से मना नहीं कर सकती। उन्होंने जब पैर आगे बढ़ाया है तो पीछे हटाना ठीक नहीं है। आगे भगवान की जैसी इच्छा हो। तुम चाहो तो कहो।’
अम्माजी की बात सुन कर हमारी बची-खुची आशा भी जाती रही और हमें रुलाई-सी आने लगी। जैसे-तैसे शाम हुई और शास्त्री जी आए, पर पूछने-कहने का मौका नहीं था। खाना-पीना हुआ। फिर चौका बर्तन किया। इस के बाद तब कहीं रात में उनसे पूछने का समय मिला। यह सुनकर कि उन का जाना ‘बिल्कुल निश्चित है’, हम बोली - ‘तो हमें भी साथ ले चलिए।’
‘क्यों? तुम वहाँ चलकर क्या करोगी? यहाँ अम्माजी को भी कोई देखने वाला चाहिए न!’
‘नहीं, हम यहाँ अकेली नहीं रहेंगी। जहाँ आप जाएंगे, वहीं हम भी जाएंगी।’
‘नहीं, यह नहीं हो सकता’ कह कर शास्त्री जी चुप हो गए।
हम रोने लगी। शास्त्री जी उसी तरह कुछ देर चुप लेटे रहे। फिर कुछ रूखी आवाज़ में बोले - ‘तुमने अगर गाली दे दी होती, तब भी मुझे इतना दुःख नहीं होता, जितना तुम्हारी इन बातों से हो रहा है। मुझे तो आए दिन इस तरह के कामों में भाग लेते रहना है। तुम्हें मैं कहाँ-कहाँ लेकर चलता फिरूंगा। अच्छा! एक शर्त पर मैं इस बार शोलापुर नहीं जाऊँगा और वह शर्त यह है कि फिर कभी-भी तुम मेरे इन कामों में अड़ंगा नहीं डालोगी। इस का वादा करो और अपनी गलती के लिए कान पकड़ो।’
हमने झट से दोनों कान पकड़ लिए और भविष्य में उन के कामों में दख़ल न देने का वादा किया। उस दिन से उनके अन्तिम समय तक भगवान की कृपा से हम सदा अपने वादे पर दृढ़ बनी रही।
लीडर रोड वाले मकान में अम्माजी, छोटी बीबी, बड़ी बीबी और उनके छोटे-छोटे बच्चों के अतिरिक्त गाँव के भी 1-2 लोग बने ही रहते थे। इस तरह 8-9 व्यक्तियों का एक बड़ा परिवार था। हम सवेरे 5 बजे से उठती और रात को 12 बजे तक सोने जा पाती थी।
सवेरे से घर में झाड़ू-बोहार के बाद चौका-बर्तन करती थी। फिर रसोई और रसोई के बाद सब के कपड़े धोती थी। इन्हीं कपड़ों में बच्चों के गंदगी वाले कपड़े भी होते थे। इन से फुर्सत मिलने पर नहाना-खाना होता। इस के बाद फिर चौका-बर्तन और रसोई की तैयारियां होने लगती। रात में भोजन के बाद थोड़ी देर रामायण पढ़ कर अम्माजी को सुनाती। इस के बाद उनके और ननदों के पैर दबाती। इस तरह 12 बजे तक सोना हो पाता।
संकोचवश शास्त्री जी न तो अम्माजी से कुछ कह पाते थे और न ही अपनी बहनों से, पर साथ ही उनसे हमारी मेहनत भी नहीं देखी जाती थी। इसलिए खाना बनाने के बाद जब हम कपड़े धोने के लिए गुसलखाने को जाती, तो वे भी नहाने के लिए झट से आ जाते और जल्दी से सारे कपड़े फींच डालते। बाद में जब वे नहा कर चले जाते, तब हम उन कपड़ों को कुछ थम कर बाहर पसारने का लग्गा लगाती, जिससे किसी को सन्देह न हो।
किसी-किसी दिन हमें अधिक थका देख कर सवेरे उठते समय थोड़ी देर और सो लेने को कहते। हम सो जाती, पर बाद में देर से उठने के लिए जब अम्माजी बिगड़ती, तब शास्त्री जी सही बात न बता कर कह दिया करते - ‘मैंने एक काम से रोक लिया था, अम्मा! इसलिए उन्हें देर हो गई थी।’
अम्माजी उस समय तो चुप हो जाती लेकिन शास्त्री जी के जाने के बाद जब वे कारण पूछती, तब हमसे जवाब देते नहीं बनता। चूंकि झूठ बोलने की आदत थी नहीं, इसलिए बहुत सोचने पर भी जल्दी उत्तर समझ में न आ पाता। नतीजा यह हुआ कि हमें शास्त्री जी से कहना पड़ता और बाद में उनके बार-बार कहने पर भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करना पड़ता था।
क्रमशः
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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