मेरे पति मेरे देवता (भाग - 16)
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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 16)
श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं
श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी
प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)
फालसे कहाँ गए
फलों में आम और फालसे शास्त्री जी को बहुत पसंद थे। जब तक फालसे का मौसम रहता, वे रोज़ पैसे-दो पैसे के फालसे ले आते। कुछ तो यों ही खाते और कुछ का रस पीते। एक दिन दोपहर में कुछ अधिक फालसे ले आए। उन दिनों घर में हम अकेली थी। अम्माजी रामनगर चली गई थी। तब कुसुम पेट में थी।
फालसे वाला दोना हम चटाई के पास रख कर हम सो गई। शास्त्री जी दूसरे कमरे में सो रहे थे। जागने पर जब हमारी नज़र फालसे की तरफ़ गई तो वहाँ दोने में 2-4 दानों के सिवा और कुछ नहीं था। हम धक से रह गई। क्योंकि हमारे और शास्त्री जी के सिवाय घर में तीसरा था ही नहीं, फिर फालसे गए कहाँ? कहीं शास्त्री जी कुछ और न समझ बैठें।
यह चिन्ता हमारी इतनी बढ़ी कि हमारी रुलाई छूट पड़ी। हम सिसकते हुए शास्त्री जी के कमरे में गई और बार-बार यही कहती रही कि ‘हम कसम से कहती हैं, हमने फालसे नहीं खाए हैं।’ पहले तो शास्त्री जी कुछ समझ न सके, लेकिन बाद में जब समझे, तब हंस कर बोले - ‘अच्छा! तो तुम इसलिए रो रही हो कि मैं तुम्हें चटोरिन न समझ बैठूँ। अरे भई! वे फालसे मैं तुम्हारे लिए ही ले आया था। गाँव जाते समय अम्मा कह गई थी कि तुम्हारे लिए फालसे का शर्बत पीना लाभकारी होगा। अगर तुमने खा भी लिया होता, तो भी मैं तुम्हें चटोरिन नहीं समझता। छोटी-छोटी बातों के लिए तुम क्यों इस तरह रोने लगती हो?’
क्रमशः
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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