मेरे पति मेरे देवता (भाग - 17)

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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 17)

श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं

श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी

प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)

सत्याग्रह में भाग लेना

शास्त्री जी बहुत चाहते थे कि हम सत्याग्रहों में भी भाग लिया करें, पर अम्माजी के कारण ऐसा नहीं हो पाता था। उन्हें यह सब पसन्द नहीं था। उन्हीं दिनों गांधी जी ने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का आन्दोलन चलाया और शहर में जगह-जगह दुकानों पर पिकेटिंग होने लगी। एक दिन कमला जी (श्रीमती कमला नेहरू) ने शास्त्री जी से पूछा - ‘आप अपनी श्रीमती जी को क्यों नहीं निकालते?’

‘उन्हें तो आप निकालेंगी, तभी वे निकल पाएंगी। हम से मुश्किल है।’ शास्त्री जी ने जानबूझकर ऐसा उत्तर दिया था क्योंकि वे समझते थे कि कमला जी के आने पर अम्माजी हमें भेजने से इंकार नहीं कर सकती थी और यही हुआ भी।

एक दिन एक्का पर बैठ कर कमला जी आई। बड़ी सरल और सीधी थी वे। हम से बातचीत के बाद अम्माजी से हमें पिकेटिंग में भेजने के लिए कहा। अम्माजी उनकी बातों का ‘नाही’ न कर सकी। दूसरे दिन हमारी तैयारी हो गई। जाने से पहले हमने शास्त्री जी से पूछा कि हमें वहाँ क्या करना होगा?

शास्त्री जी ने समझाया कि हमें कपड़े की किसी एक दुकान के आगे खड़े होकर उन बहिन-भाइयों से, जो कपड़ा ख़रीदना चाहते हों, नम्रतापूर्वक विदेशी कपड़ा न ख़रीदने का निवेदन करते रहना है। उन्होंने इस बात को कई बार कहा और चलते-चलते भी कहा कि हम जो कुछ भी किसी से कहें, बड़ी नम्रता के साथ कहें। हमारी बातों से किसी भाई-बहिन को दुःख नहीं पहुँचना चाहिए।

गौतम जी की पत्नी और हम एक दुकान के सामने खड़ी हो गई और जो लोग आते, उन्हें कपड़ा लेने से मना करने लगी। पर संकोचवश हम स्त्रियों से ही अपनी बात कह पाती थी। मर्दों  से कहने में हमें झेंप लगती थी। हम लोगों की जो ड्यूटी लगी थी, वह 11 से 2 बजे तक की थी।

लगभग बारह-साढे बारह बजे बगल के दुकानदार और किसी पिकेटिंग करने वाले में कहा-सुनी हो गई। जैसे-जैसे बात बढ़ती गई, भीड़ भी जमा होती गई। इसी बीच किसी ने दुकान में आग लगा दी। दुकान जलने लगी। फिर पुलिस आ गई। भगदड़ मची। गौतम जी की पत्नी घबरा कर बोली - ‘चलिए, हम लोग भी चलें। यहाँ खड़े रह कर क्या हम लोग अपनी बेइज्जती कराएंगी?’

घबराहट तो हमें भी हो रही थी, पर यह सोच कर कि समय से पहले जाने पर कहीं शास्त्री जी बुरा न मानें, इसलिए हमने उनसे कहा - ‘कहीं गौतम जी और शास्त्री जी बुरा न मान जाएं। 2 बजे तक हम लोगों को यहाँ रहना चाहिए न!’ लेकिन वे तैयार न हुई और अंत में हमें भी उनके साथ लौट कर घर आना पड़ा।

शास्त्री जी और गौतम जी घर पर नहीं थे। रात में लौटने पर जब उन लोगों को सारा हाल मालूम हुआ तो गौतम जी ने अपनी पत्नी को चिढ़ाते हुए कहा - ‘तुम बड़ी कायर हो। इसी हिम्मत पर देश आज़ाद कराओगी? जब बहु रुकने को तैयार थी, तब भी तुम डर गई। बड़ी शर्म की बात है।’ वैसे गौतम जी से शास्त्री जी साल-डेढ़ साल ही छोटे होंगे, लेकिन गौतम जी हमें बहु कह कर ही सम्बोधित करते थे।

तीसरे दिन हमारी हिम्मत कुछ खुल गई थी और हम मर्दों से जब-तब कपड़ा न लेने का आगह करने लगी थी। 2 बजे जब शास्त्री जी और गौतम जी आए, तब हम लोग घर आ गई। चौथे दिन फिर उसी समय आना हुआ। जिस दुकान के सामने हम पिकेटिंग कर रही थी, उस में एक भाई साहब अपनी पत्नी या बहिन के साथ शादी के कपड़े ख़रीद रहे थे और अन्दाज़े से 500-700 का माल ले भी चुके थे। हम अन्दर जाकर उनसे मना करने लगी, तो दुकानदार चिढ़ कर बोला - ‘विदेशी कपड़े ख़रीदने के लिए आप लोग मना तो करती हैं, मगर स्वयं आप विदेशी चूड़ियाँ पहने हुए हैं।’

हम कुछ सिटपिटाई। फिर भी हमें विश्वास था कि हमारी चूड़ियाँ विदेशी नहीं होंगी, इसलिए हमने अपनी चूड़ियों की ओर संकेत करते हुए कई बार उससे सकरवाया - ‘ये विदेशी हैं? ये विदेशी हैं?’

‘हाँ! है। मैं तो सब कुछ विदेशी बेचता हूँ। विदेशी से नफ़रत आपको है, मुझे नहीं।’

इसी बीच मेरे मन में आया कि अगर कहीं चूड़ियाँ फोड़नी पड़ी, तो घर आकर अम्माजी को क्या जवाब देंगी। इसीलिए हमने शॉल के भीतर हाथ करके एक-एक चूड़ी उतार ली और पीछे चोटी से बांध लिया। इसके बाद हमने दुकानदार से पूछा - ‘अच्छा! अगर आप इन्हें विदेशी चूड़ियाँ बतलाते हैं और हम इन चूड़ियों को फोड़ दें, तो आप भी अपनी घड़ी फोड़ देंगे?’

झटाक से दुकानदार न मालूम कैसे कह उठा - ‘हाँ! फोड़ दूँगा। लेकिन पहले आप अपनी चूड़ियाँ तो फोड़िए।’ दुकानदार का वाक्य समाप्त हुआ ही था कि अचानक शास्त्री जी और गौतम जी आ पहुँचे। हमने उन्हें देखते ही पूछा - ‘यह कह रहे हैं कि ये चूड़ियाँ विदेशी हैं।’

शास्त्री जी सहज भाव से बोले - ‘जब वे कह रहे हैं तो हो सकती हैं।’ और उन्होंने सामने रखे हुए गज की ओर आँखों से संकेत किया तथा चूड़ियों को फोड़ देने का भाव व्यक्त किया।

हमने चोटी से दो डोरे तोड़ कर दोनों हाथों में बांध लिए, फिर सारी चूड़ियाँ उतार कर गज से फोड़ डाली। हमारा फोड़ना था कि गौतम जी की पत्नी ने दुकानदार से घड़ी उतार कर तोड़ने को कहा। दुकानदार इधर-उधर करने लगा। वह घड़ी तोड़ने को तैयार नहीं था। इस पर वही महिला, जो सामान ले रही थी, दुकानदार पर बिगड़ पड़ी - ‘यह तो आपकी धूर्तता है। इस लड़की की आपने चूड़ियाँ भी तुड़वा दी और अब अपनी घड़ी तोड़ने से इंकार कर रहे हैं। यह तो कोई बात नहीं हुई।’

फिर क्या था? बात बढ़ गई और इतनी बढ़ी कि साथ वाले सज्जन ने अपने मोल लिए हुए कपड़ों में तो आग लगाई ही, दुकान में भी आग लगा दी। शास्त्री जी और गौतम जी कब चले गए थे, हम लोगों को जानकारी न हो सकी।

घर पहुँचने पर अम्माजी की नज़र हमारे हाथों पर पड़ी। कुछ नाराज़ होकर चूड़ियों के टूटने का कारण पूछने लगी। सही बात बताने पर वे बिगड़ती, इसलिए हमने दूसरा कारण बता दिया।

क्रमशः

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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धन्यवाद।

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