मेरे पति मेरे देवता (भाग - 18)

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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 18)

श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं

श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी

प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)

शास्त्री जी की पड़ोसिन

6-7 महीने बाद शास्त्री जी जेल से छूट कर आए थे। कुछ दिनों तक रामनगर में रहने के बाद इलाहाबाद के बहादुरगंज मोहल्ले में मकान लिया गया और हम लोग वहाँ आ गए। एक दिन रामनगर में दोपहर के समय तौलिया सिर पर रखे शास्त्री जी नहाने जा रहे थे। वहीं पास में चारपाई पर लेटी हुई कुसुम हाथ-पैर चला रही थी। शास्त्री जी चारपाई पर बैठ गए और उसे प्यार करने लगे। अम्मा जी किसी काम से पड़ोस में गई थी। इसलिए उन्हें वह अवसर मिल गया था। वरना उनके सामने प्यार करना तो दूर, उसकी ओर वे देखते भी नहीं थे।

संयोग की बात, इसी बीच अम्माजी आ गई। शास्त्री जी बड़ी दुविधा में पड़ गए और कुछ लजाए भी। फिर भी सफ़ाई तो देनी ही थी। बोले - ‘क्या बताएं अम्मा! छोटे-छोटे बच्चों को देख कर खिलाने की तबियत होने लगती है।’

‘तो खिलाते क्यों नहीं बचवा! लड़कों को अपने बच्चों को खिलाना ही चाहिए।’

उनके कहने से उस दिन के बाद से शास्त्री जी सबके सामने कुसुम को गोद में लेने लगे थे।

हमारी शादी में चढ़ावे के नाम पर सिर्फ़ एक थान कपड़ु ही आए थे, लेकिन जब हम विदा होकर रामनगर आई, तो वहाँ मुँह-दिखाई में इतने गहने मिले थे कि पराँत भर गई थी। सभी गोतिया, नैया और पास-पड़ोस वालों ने कुछ-न-कुछ दिया। हंसली, करघनी, कड़ा, कर्णफूल आदि सब कुछ मिले थे। अंदाज़ में हज़ार-डेढ़ हज़ार के गहने ज़रूर होंगे। स्त्रियों में, विशेषकर हमारे समय की स्त्रियों में गहनों के लिए जो प्रबल लालसा हुआ करती थी, वह हमारी पूरी हो गई थी। हम बड़ी प्रसन्न थी।

क्रमशः

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

Comments

  1. परम श्रद्धेय भारत के अनमोल रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन से जुड़े प्रसंग उनकी जीवन संगिनी श्रीमती ललिता शास्त्री की लेखनी से पाकर अतीव सुन्दर लगा।
    आपने इन्हें शृंखलाबद्ध करके पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध कर दिया। हार्दिक आभार।

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  2. प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
    🙏🙏🙏

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