भाई भगवतीचरण बोहरा की माँ - शीलवती
👼👼💧💧👼💧💧👼👼
वीर माताएँ
(क्रान्तिवीरों की माताओं के उद्गार)
लेखिका - श्रीमती संगीता अनिल पंवार
भाई भगवतीचरण बोहरा की माँ - शीलवती
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात् माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। पर मित्रों, जिन माताओं ने अपने बच्चों को अपनी मातृभूमि को स्वतन्त्र कराने के लिए मातृभूमि पर न्यौछावर कर दिए और वे बच्चे भी अपनी माताओं के सामने ही फाँसी पर ख़ुशी-ख़ुशी झूल गए, उन माताओं को क्या कुछ झेलना पड़ा होगा, क्या कुछ वेदनाएँ हुई होंगी, उन वेदनाओं, उन भावनाओं को लेखिका ने अपनी कलम से काग़ज़ पर उकेरा है।
बहुत धनी परिवार में शीलवती और गोविन्दचरण को पुत्र प्राप्त हुआ, मिन्नत माँगने पर देवी भगवती के आशीर्वाद से। घर में भगवतीचरण जी के कार्य में धर्मे च ... अर्थे च .... का मतलब पूरी तरह समझ कर पूरा-पूरा साथ निभाने वाली अर्धांगिनी दुर्गा के होने पर भी माँ शीलवती को किन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ा।
दुर्गा का सफेद माथा सामने देख कर मुझे तो रोना आता था। उसने भगवती की मृत्यु को कितनी शान्ति से स्वीकार कर लिया था। मेरे मन में बार-बार विचार आता था कि इस छोटे-से सचिन्द्र का क्या होगा?
भगवती का दसवाँ हुआ और दूसरे ही दिन भगवती के फोटो को नमस्कार करते हुए दुर्गा बोली - बा, आप तो सचिन्द्र को सँभाल लीजिए। मुझे तो इनका क्रान्ति का कार्य पूरा करने जाना ही होगा।
मैंने उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर वही निश्चय का भाव था, जो भगवती के चेहरे पर हमेशा होता था। मैंने आशीर्वाद के लिए हाथ ऊपर उठाया और उसने सचिन्द्र को मेरी गोद में रखा, मेरे पाँव छुए और एकदम बाहर निकल गई। ...
मेरा मन एकदम भूतकाल में चला गया। हमारा परिवार आर्थिक दृष्टि से बहुत सम्पन्न था। किसी बात की कोई कमी नहीं थी। कमी थी तो केवल यह कि मेरी शादी हुए काफी साल हो गए थे, पर मेरी कोई सन्तान नहीं थी। पास-पड़ोसियों का व्यवहार मुझे बहुत उदास कर देता। ऐसे ही किसी ने सुझाया कि हम दोनों वैष्णव देवी के दर्शन कर आएं। और आश्चर्य! देवी भगवती के आशीर्वाद से दूसरे ही वर्ष हमारे घर एक सुन्दर बालक का जन्म हुआ। माँ भगवती के आशीर्वाद से जन्मा, इसलिए बालक का नाम भगवतीचरण रखा।
भगवती जब 7 साल का हुआ तो उसे यहीं आगरा में ही स्कूल में भर्ती कराया। स्कूल आते-जाते उसके क्या ठाठ थे! आगे-पीछे नौकर! आगरा में मुसलमान बहुत थे, जो सारे के सारे भारत को अपनी जान समझते थे। इसी कारण अंग्रेज़ों के विरोध में सभाएँ, जुलूस, आन्दोलन बहुत होते थे।
एक बार भगवती स्कूल से काफ़ी देर से आया।
मैंने नौकरों से पूछा - देर क्यों हो गई?
पर भगवती ने झट से जवाब दिया - रास्ते में एक सभा हो रही थी, वहाँ रुके थे।
मैंने कहा - ऐसी सभाओं में खड़े नहीं रहना।
क्यों? ...
कुझ भी बता कर मैंने विषय टाल दिया। उसका समाधान तो हुआ ही नहीं था। उसके मन में जो तूफ़ान उठा था, वह शान्त नहीं हुआ था। रात को उसके बाबूजी आए, तो उसने फिर वही बात छेड़ी। उन्होंने उसे समझाया - अंग्रेज़ लोग अपने हिन्दुस्तान में कैसे आए और कैसे राज कर रहे हैं और कैसे अत्याचार कर रहे हैं? यह विस्तारपूर्वक सुनने के बाद उसने पूछा - बाबूजी, आप क्यों नहीं गए आन्दोलन करने? - तब इन्होंने समझाने की कोशिश की - बेटे, अपना कारोबार बड़ा है। हम आन्दोलन में जाएंगे, तो अंग्रेज़ लोग हमें परेशान करेंगे।
भगवती को बात जँची नहीं, पर वह आगे कुछ बोला भी नहीं। कई बार नींद में अंग्रेज़-अंग्रेज़ चिल्लाता और हड़बड़ा कर उठ बैठता।
बड़ा हुआ तो पढ़ाई में और खेल में भी अगुआ रहने लगा। हमने सोचा कि वह पुराना सब कुछ भूल गया होगा। पर स्कूल के एक अध्यापक के कारण वह मन ही मन देशभक्ति के पाठ दोहराने लगा था।
मैट्रिक में उसे आगरा में पहला स्थान मिला था, इसलिए हमने उसे कॉलेज में दाख़िला दिलाया। दो कमरे किराए पर लिए, साथ में दो नौकर भी दिए।
भगवती लाहौर गया तो मुझे अकेलापन अखरने लगा। फिर मैंने इनके पीछे पड़कर दुर्गा को बुला लिया। जब भगवती 15 वर्ष का था और दुर्गा 11 वर्ष की - तो उनकी शादी हो गई थी। पर दुर्गा पढ़ रही थी, इसलिए वह गुजरात में ही थी। आख़िर, दुर्गा को हम आगे पढ़ाएंगे, इस शर्त पर उसके पिता ने उसे आगरा भेजा। वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी, इसलिए अपने वचन के अनुसार दुर्गा की पढ़ाई चालू रखी।
भगवती शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई में बहुत आगे रहा। कॉलेज में उसने स्वयं लिखी हुई कविताओं का वाचन किया और वहीं उसकी भगतसिंह से मुलाकात हुई। उसने भगतसिंह के साथ “नौजवान भारत” नामक संस्था में प्रवेश किया। वहीं से उसका देशकार्य का प्रयास शुरू हुआ। भगवती एक बार अपने साथ भगतसिंह और शिववर्मा को आगरा अपने घर पर रहने के लिए ले आया था। भगत के विचार सुनकर मैं तो डर गई। वैसा मैंने उससे कहा भी।
उस पर बहुत ज़ोर से हँसकर उसने कहा - माँ जी, आपको मालूम ही नहीं है कि भगवती हमारे ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातन्त्र’ का उच्चकोटि का चिन्तनशील प्रचारक है। आगे उसने कहा - माँ जी, एक न एक दिन आपको भगवती के दूरदर्शी, कुशल संघटक, प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ उसमें ध्येयनिष्ठा, साहस और निःस्वार्थता के दर्शन होंगे, तब आपकी आँखें चौंधिया जाएंगी। हमारी पार्टी का घोषणा-पत्र शचिन्द्रनाथ सान्याल ने तैयार किया है, पर भगवती ने पूरा घोषणा-पत्र पंजाबी में अनुवादित करके वितरण की व्यवस्था भी की है। भगवती यानि सब क्रान्तिकारियों के बीच का पुल है।
ऐसे ही गर्मी तेज़ थी और सायमन कमीशन के आने की तारीख़ नज़दीक आ रही थी। लाहौर में हिन्दू, मुसलमान, सिख सभी ने लाला लाजपतराय के नेतृत्व में सायमन कमीशन का विरोध करने के लिए जुलूस निकाला। उसमें भगतसिंह, भगवती, सुखदेव, चन्द्रशेखर सभी थे। क्रान्तिकारियों को किसी बाढ़ की शक्ल में आते देख कर एस.पी. ने हुक्म दिया - चलाओ लाठी! मरने दो सालों को। यह कहते हुए लाठी-चार्ज शुरू कर दिया।
मार सहते हुए “वन्दे मातरम्”, “गो बैक सायमन”, “अंग्रेज़ी सरकार नहीं चाहिए” के नारे लगाते हुए जुलूस आगे बढ़ रहा था। लोग नीचे गिरते गए। खून का कीचड़ बनता गया। लाला जी के लिए लोगों ने सब तरफ़ से घेरा डाल दिया, पर पुलिस वाले मारते ही जा रहे थे। जब लाला जी ने लौटने के लिए इशारा किया, तब भगवती ने और सुखदेव ने हाथ जोड़ कर लोगों को वापिस जाने को कहा। तब ‘लाला जी जिन्दाबाद’ ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगाते हुए लोग पीछे हटे।
लाला जी डी.एस.पी. नील के सामने आए और गुस्से से बोले - निरपराध प्रजा पर हमला करने वाली सरकार के लिए ‘नालायक’ यही शब्द है। ऐसी सरकार को धिक्कार है। - डी.एस.पी. नील को गुस्सा आया, उसने लाला जी के सीने पर और सिर पर डण्डे से प्रहार किए। लाला जी ने नीचे गिरते-गिरते कहा - आज मुझ पर जितनी लाठियाँ बरसी हैं, वे सारी भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्य के कफ़न की कीलें साबित होंगी। दो दिन बाद लाला जी का स्वर्गवास हो गया। साण्डर्स को मार कर भगत, सुखदेव और चन्द्रशेखर ने लाला जी की मौत का बदला लिया।
भगत, सुखदेव और साथीदारों के साथ भगवती का भी वारण्ट निकला था। पर भगवती तो ग़रीब किसान के वेष में घूम रहा था।
वह एक बार घर पर आया था, तो मैंने कहा - बहू इतनी पढ़ी-लिखी है, उसे भी नौकरी के लिए लाहौर भेज दो। मेरा भाई उसे कॉलेज में नौकरी दिला देगा।
भगवती को बहुत आश्चर्य हुआ - तुम्हारा तो विरोध था, बा।
मैंने कहा - इतनी पढ़ी-लिखी है तो जाने दो न!
वह जब लाहौर में थी, तब उस पर एक कठिन काम आया। उसे भगत सिंह की पत्नी बन कर अंग्रेज़ महिला के वेष में कलकत्ता भाग निकलना पड़ा। वहीं भगवती से उसकी अन्तिम मुलाकात हुई।
उसके बाद बाबाराव के पास बम बनाने का काम सीख कर भगवती आगरा आया था। बाद में भगतसिंह को रिहा करने का काम था, तो वह लाहौर गया।
28 मई 1930 को वह काला दिन आ ही गया।
बम की पिनें ढीली हैं। सुखदेव, राज और यशपाल उसे बता रहे थे कि बम का परीक्षण न करे। पर भगवती ने बात नहीं मानी। उसने कहा - जिस दिन पहला कदम इस मार्ग पर रखा था, उस दिन मृत्यु के डर को भी भगा दिया था। बायाँ पैर आगे लेकर, दाहिना हाथ आकाश की ओर अर्धचन्द्राकार घुमा कर बम फेंका। भयंकर विस्फोट हुआ। भगवती के एक हाथ की अंगुलियाँ और दूसरा हाथ कोहनी से उड़ गया। क्षण भर तो किसी को कुछ समझ में नहीं आया। बाद में यश आगे आया। भगवती को सीने से लगाया और रोने लगा।
भगवती ने कहा - नहीं छुड़ा सका मैं अपने भगत को। मैं तो जा रहा हूँ, पर मेरी मौत की ख़बर पुलिस को मत लगने देना। इसका ध्यान रखना। दुर्गा से कहना - मेरा काम आगे चालू रखे।
फिर किसी को ख़बर न लगे, इसलिए भगवती की देह एक शॉल में लपेट कर पत्थर बाँध कर रावी के सुपुर्द कर दी। जैसे करतारसिंह, विष्णु पिंगळे को रावी ने अपने अन्दर समा लिया, वैसे ही मेरे लाडले बेटे को भी समा लिया। मेरा पेट जन्मा भगवती अब रावी की गोद में सो गया। हमेशा-हमेशा के लिए सो गया।
।।भारतमाता की जय।।
--
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद।
Comments
Post a Comment