चित भी मेरी, पट भी मेरी
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चित भी मेरी, पट भी मेरी
Image by Angela C from Pixabay
एक राजा था। अचानक दूसरे राजा ने उस पर आक्रमण कर दिया। उसका सारा राज्य छिन गया। कुछ समय पश्चात उसका एक संत से मिलना हुआ।
उसकी व्यथा सुनकर संत ने कहा - “देख! घबरा मत। मेरे पास एक चमत्कारी सिक्का है। जब मैं सिक्के को उछालूँ तो तू चित या पट में से एक का चुनाव कर लेना। जो बोला वह आ गया तो समझ लेना तेरी जीत निश्चित है।”
संत ने सिक्का उछाला, राजा ने चित कहा और चित आ गया। संत ने कहा, “जा! अब तेरी विजय सुनिश्चित है।” संत की प्रेरणा पाकर उसने अपने प्रतिपक्षी राजा पर हमला करके अपना खोया हुआ साम्राज्य जीत लिया।
वह विजय प्राप्त करने के बाद सीधा संत के चरणों में गया और कहा, “गुरुदेव! मैं आपका बहुत आभारी हूँ।” संत ने कहा, “मेरा इसमें कुछ नहीं है।” संत ने अपने झोले से सिक्के को निकाला और उसकी हथेली पर रख दिया। राजा ने सिक्के को पलट कर देखा तो वह भौचक्का रह गया क्योंकि उस सिक्के के दोनों तरफ चित ही था। संत ने कहा, “मैंने कुछ नहीं किया, मैंने बस तेरे विश्वास को जगा दिया। आशीर्वाद का चमत्कार नहीं होता, श्रद्धा और विश्वास का चमत्कार होता है।”
इसलिए यह कहानी आपको एक संदेश देना चाहती है कि जीवन-व्यवहार में अपने झोले में हमेशा एक ऐसा ही सिक्का रखो जिसके दोनों तरफ़ केवल चित हो, पट हो ही न। सब पॉजिटिव (सकारात्मक) सोचो, फिर देखो कि जीवन कितना आगे बढ़ता है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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धन्यवाद।
बहुत ही सुन्दर
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