जमी हुई नदी

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जमी हुई नदी

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डर पर जीत हासिल करने की सीख देती कहानी।

सुमित और अमित लद्दाख के एक छोटे से गाँव में रहते थे। एक बार दोनों ने फैसला किया कि वे गाँव छोड़कर शहर जायेंगे और वहीं कुछ काम-धंधा खोजेंगे। अगली सुबह वे अपना-अपना सामान बांधकर निकल पड़े। चलते-चलते उनके रास्ते में एक नदी पड़ी। ठण्ड अधिक होने के कारण नदी का पानी जम चुका था। जमी हुई नदी पर चलना आसान नहीं था, पाँव फिसलने पर गहरी चोट लग सकती थी।

इसलिए दोनों इधर-उधर देखने लगे कि शायद नदी पार करने के लिए कहीं कोई पुल हो। पर बहुत खोजने पर भी उन्हें कोई पुल नज़र नहीं आया।

अमित बोला, “हमारी तो किस्मत ही खराब है। चलो वापस चलते हैं, अब गर्मियों में शहर के लिए निकलेंगे।”

“नहीं”, सुमित बोला, “नदी पार करने के बाद शहर थोड़ी दूर पर ही है और हम अभी शहर जायेंगे।”

और ऐसा कह कर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।

“अरे! ये क्या कर रहे हो....? पागल हो गए हो....तुम गिर जाओगे....”, अमित चिल्लाते हुए बोल ही रहा था कि सुमित पैर फिसलने के कारण गिर पड़ा।

“कहा था न! मत जाओ....”, अमित झल्लाते हुए बोला।

सुमित ने कोई जवाब नहीं दिया और उठ कर फिर आगे बढ़ने लगा....। एक-दो-तीन-चार....और पाँचवें कदम पर वह फिर से गिर पड़ा....।

अमित लगातार उसे मना करता रहा। मत जाओ....आगे मत बढ़ो....गिर जाओगे....चोट लग जायेगी....लेकिन सुमित आगे बढ़ता रहा।

वह शुरू में दो-तीन बार गिरा ज़रूर, लेकिन जल्द ही उसने बर्फ पर सावधानी से चलना सीख लिया और देखते-देखते नदी पार कर गया।

दूसरी तरफ पहुँच कर सुमित बोला, “देखा! मैंने नदी पार कर ली....और अब तुम्हारी बारी है।”

“नहीं, मैं यहाँ पर सुरक्षित हूँ....।”

“लेकिन तुमने तो शहर जाने का निश्चय किया था।”

“मैं यह नहीं कर सकता।”

“नहीं कर सकते या करना नहीं चाहते।”

सुमित ने मन ही मन सोचा और सपनों को उड़ान देने शहर की तरफ आगे बढ़ गया।

दोस्तों! हम सबकी ज़िन्दगी में कभी न कभी ऐसे मोड़ आ ही जाते हैं, जब जमी हुई नदी के रूप में कोई बड़ी बाधा या चैलेंज हमारे सामने आ जाता है और ऐसे में हमें कोई ठोस निश्चय करना होता है। तब क्या हम ख़तरा उठाने का निश्चय लेते हैं और तमाम मुश्किलों, डर, और असफलता के भय के बावजूद नदी पार करते हैं? या हम सुरक्षित बने रहने के लिए वहीं खड़े रह जाते हैं, जहाँ हम सालों से खड़े थे।

जहाँ तक दुनिया के सफल लोगों का सवाल है, वे रिस्क लेते हैं.... लेकिन समस्या से मुँह छिपा कर भागते नहीं। अगर आप रिस्क नहीं लेते, तो हो सकता है आज आप बिलकुल सुरक्षित हों, आपके शरीर पर एक भी घाव न हो....लेकिन जब आप अपने भीतर झाकेंगे, तो आपको अपने अन्दर ज़रूर कुछ ऐसे ज़ख्म दिख जायेंगे जो आपके द्वारा अपने सपनों को साकार करने के लिए कोई प्रयास न करने के कारण आज भी हरे होंगे। ऐसे सपने हमारे हृदय में हरदम सिसकते रहते हैं।

मित्रों! पंछी सबसे ज्यादा सुरक्षित एक पिंजरे में होता है....लेकिन क्या उसका जन्म पिंजरे में बंद रहने के लिए बना है? या फिर वह आकाश की ऊँचाइयों को चूमने और आज़ादी से घूमने के लिए दुनिया में आया है? फैसला आपका है। आप पिंजरे का पंछी बनना चाहते हैं या खुले आकाश की ऊँचाइयों को पाकर अपने सपनों को साकार करना चाहते हैं?

गिर-गिर कर संभलना ही ज़िन्दगी की सफलता का रहस्य है।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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