संस्कारों पर नाज़

👼👼💧💧👼💧💧👼👼

संस्कारों पर नाज़

Image by dewdrop157 from Pixabay

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था। इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था। यह वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट बेटा पिता के कई बार समझाने पर भी इग्नोर कर देता और कहता, “यही तो उम्र है शौक पूरे करने की, खाने-पहनने की। जब आपकी तरह मुँह में दांत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।”

बहू खुशबू भी भरे-पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी अच्छी थी तो फ्रेंड सर्किल उसी हिसाब से मॉडर्न था। बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती।

वह कहता, “कमाल करती हो तुम! आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है, मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।”

और बहू कहती, “क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।”

आज अचानक पापा आई.सी.यू. में एडमिट हुए थे। हार्ट अटैक आया था। डॉक्टर ने पर्चा पकड़ाया, तीन लाख और जमा करने थे। डेढ़ लाख का बिल तो पहले ही भर दिया था, मगर अब ये तीन लाख भारी लग रहे थे। वह बाहर बैठा हुआ सोच रहा था कि अब क्या करे।

उसने कई दोस्तों को फोन लगाया कि उसे मदद की जरूरत है, मगर किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ बहाना कर दिया। आँखों में आँसू थे और वह उदास था। तभी खुशबू खाने का टिफिन लेकर आई और बोली, “अपना ख्याल रखना भी जरूरी है। ऐसे उदास होने से क्या होगा? हिम्मत से काम लो, बाबू जी को कुछ नहीं होगा। आप चिंता मत करो। कुछ खा लो फिर पैसों का इंतजाम भी तो करना है आपको। मैं यहाँ बाबू जी के पास रुकती हूँ, आप खाना खाकर पैसों का इंतजाम कीजिये।”

पति की आँखों से टप-टप आँसू झरने लगे।

“कहा न! आप चिंता मत कीजिये। जिन दोस्तों के साथ आप मॉडर्न पार्टियां करते हैं आप उनको फोन कीजिये, देखिए तो सही, कौन-कौन मदद को आता है।”

पति खामोश और सूनी निगाहों से जमीन की तरफ़ देख रहा था कि खुशबू का हाथ उसकी पीठ पर आ गया और वह पीठ को सहलाने लगी।

“सबने मना कर दिया। सबने कोई न कोई बहाना बना दिया, खुशबू! आज पता चला कि ऐसी दोस्ती तब तक ही है, जब तक जेब में पैसा है। किसी ने भी हाँ नहीं कहा, जबकि उनकी पार्टियों पर मैंने लाखों उड़ा दिये।”

“इसी दिन के लिए बचाने को तो मां-बाबा कहते थे। खैर! कोई बात नहीं। आप चिंता न करो, हो जाएगा सब ठीक। कितना जमा कराना है?”

“अभी तो तनख्वाह मिलने में भी समय है, आखिर चिंता कैसे न करूँ, खुशबू?”

“तुम्हारी ख्वाहिशों को मैंने सम्हाल रखा है।”

“क्या मतलब....?”

“तुम जो नई-नई तरह के कपड़ों और दूसरी चीजों के लिए मुझे पैसे देते थे, वे सब मैंने सम्हाल रखे हैं। माँ जी ने फ़ोन पर बताया था, तीन लाख जमा करने हैं। मेरे पास दो लाख थे। बाकी मैंने अपने भैया से मंगवा लिए हैं। टिफिन में सिर्फ़ एक ही डिब्बे में खाना है। बाकी में पैसे हैं।” खुशबू ने थैला टिफिन सहित उसके हाथों में थमा दिया।

“खुशबू! तुम सचमुच अर्धांगिनी हो, मैं तुम्हें मॉडर्न बनाना चाहता था, हवा में उड़ रहा था। मगर तुमने अपने संस्कार नहीं छोड़े, आज वही काम आए हैं।”

सामने बैठी माँ की आँखों में आँसू थे। उसे आज खुद के नहीं, बल्कि पराई माँ के संस्कारों पर नाज़ था और वह बहू के सिर पर हाथ फेरती हुई ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करने लगी।

--

 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

ईश्वर की कृपा

समर्पण भाव होना चाहिए

समस्या का सामना

चरणों की धूल

चिड़िया से सीख

आधे रास्ते को मंजिल न समझें

एक बुढ़िया की रोचक कहानी

Y for Yourself

जो चाहोगे सो पाओगे

राजा मोरध्वज