संत की पोशाक
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संत की पोशाक
क्या आप जानते हैं कि एक संत केवल अपने प्रवचन से ही नहीं, अपनी पोशाक से भी लोगों को पवित्रता का संदेश देते हैं। एक संत की पोशाक उनके क्रोध, मान, माया और लोभ से मुक्त आचरण का प्रतीक होती है।
वे एक ही धोती अर्थात् अखण्ड (बिना सिला) वस्त्र का प्रयोग करते हैं, जो अधो शरीर पर पहनने व ऊपरी शरीर पर ओढ़ने के काम आती है।
उस धोती की पहली विशेषता यह है कि उसमें कमीज़ की तरह कॉलर नहीं होता। इससे मान का अभाव प्रकट होता है। हम थोड़ी सी सफलता प्राप्त करते ही अपनी कमीज़ का कॉलर ऊँचा करने लगते हैं, जिसे व्हाइट कॉलर्ड संस्कृति कहा जाता है। इससे सिद्ध होता है कि संत जन अपने मान और अपमान में समभाव रखते हैं। जब पोषाक में कॉलर ही नहीं होगा, तो वे अपने मान का कभी प्रदर्शन करने वाले नहीं हैं क्योंकि उनके मन में मान का अभाव है। हमारे मन में एक पोशाक धुली हुई होने पर भी रोज़ नई पोशाक पहन कर लोगों को दिखाने का भाव होता है ताकि हमारे मान की पुष्टि हो सके, वरना लोग क्या कहेंगे कि क्या इसके पास केवल एक ही पोशाक है, जो यह प्रतिदिन उसे ही पहन कर आ जाता है।
उनकी पोशाक की दूसरी विशेषता यह है कि उनकी धोती में बाजू सिली हुई नहीं होती। संत की बिना बाजू की यह पोशाक उनके मन में क्रोध के अभाव का प्रतीक है। हम किसी से ज़रा-सा मतभेद होते ही अपनी कमीज या कुर्ते की आस्तीन ऊपर चढ़ाते हुए सामने वाले को लड़ने के लिए ललकारते हैं कि माँ का दूध पीया हो, तो आ जा मैदान में। अरे! छुपकर वार क्यों करता है? दूसरी ओर संत की पोशाक में बाजू न होने से वे किसी को लड़ने के लिए नहीं उकसाते, अपितु सामने वाले को शांत भाव से समझा कर झगड़े को समाप्त करने की कोशिश करते हैं।
उनकी पोशाक की तीसरी विशेषता यह है कि उनकी पोशाक में जेब नहीं होती, इसलिए लोभ का तो प्रश्न ही नहीं उठता। सामान्य आदमी की पोशाक में तो एक जेब नहीं अपितु कई जेबें होती हैं। पैंट में एक जेब पीछे, दो जेबें आगे की ओर बनी होती हैं, जो उसके लोभ का प्रदर्शन कर रही होती हैं। इतना ही नहीं यदि कमीज की सुंदरता के लिए एक जेब सामने की ओर लगाई जाती है तो पैंट में एक गुप्त पॉकेट भी बनाई जाती है जो दुनिया से अपना धन छिपाने के काम आती है। आप कहेंगे कि महिलाओं की पोशाक में भी तो जेब नहीं होती, पर महिलाएं अपने हैंडबैग या पर्स की क्वालिटी से अपनी समृद्धि का प्रदर्शन किया करती हैं। संत की पोशाक में जेब का न होना उनके मन में लोभ के अभाव का परिचायक है।
संत की पोशाक की चौथी विशेषता सबसे महत्वपूर्ण है कि वे प्रतिदिन एक ही रंग की पोशाक पहनते हैं। एक जैसी सफेद धोती पहनते हैं जो उनके मायाचारी से रहित स्वच्छ जीवन का परिचायक है। हम एक दिन पहले पहने हुए वस्त्र धुले हुए होने के बावजूद भी दोबारा जल्दी से नहीं पहनते, केवल मान का पोषण करने के लिए नहीं, दूसरों को जलाने के लिए भी और हम सारा दिन इसी मायाचारी में लगे रहते हैं। महिलाओं में तो विशेष रूप से यह आदत होती है। जब किसी पार्टी या समारोह में जाना हो, तो उन्हें नई पोशाक खरीदने का बहाना मिल जाता है कि हमें सबके सामने उनसे अच्छा दिखने के लिए नई पोशाक लेनी है। हम अपने विचारों से नहीं, अपनी पोशाक से सबको प्रभावित करना चाहते हैं।
इस प्रकार संत बन कर समाज में सम्मान पाना चाहते हो, तो संतों के समान आचरण करना सीखो। उनकी पोशाक हमें बताती है कि यही है संतों के क्रोध, मान, माया और लोभ से रहित होने का रहस्य।
आचार्य रत्नसुंदर जी महाराज।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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