अयोध्या का दिव्य प्रांगण!

अयोध्या का दिव्य प्रांगण! 


श्री अयोध्या जी में कनक भवन और हनुमानगढ़ी के मध्य स्थित है 'बड़ी जगह' जिसे दशरथ महल भी कहा जाता है। वर्षों पूर्व, यहाँ एक परम विरक्त संत निवास करते थे— श्री रामप्रसाद जी। उनका जीवन और आश्रम पूरी तरह प्रभु की कृपा पर निर्भर था।

नियम सरल था: मंदिर में जो चढ़ावा आता, वह पलटू बनिया नाम के एक व्यापारी के पास भेज दिया जाता। बदले में पलटू राशन भेजता, जिससे ठाकुर जी का भोग बनता और संत-अभ्यागतों का भंडारा होता। न कोई संचय था, न कल की चिंता।

एक दिन प्रभु ने कौतुक रचा। मंदिर में एक धेला भी चढ़ावा नहीं आया। सूर्यास्त होने को था, पर भंडार खाली था। विवश होकर रामप्रसाद जी ने दो साधुओं को पलटू के पास भेजा: "भैया, आज हाथ खाली है, प्रभु के भोग के लिए थोड़ा राशन उधार दे दो।"

पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। पलटू बनिया रूखा होकर बोला— "महाराज, मेरा और महंत जी का व्यवहार तो नकद का है। उधार की यहाँ कोई जगह नहीं।"

जब रामप्रसाद जी को यह पता चला, तो उन्होंने ठंडी आह भरी और कहा— "जैसी मेरे राघव की इच्छा।" 

उस दिन मंदिर में केवल जल का भोग लगा। भूखे संत और भूखे ठाकुर जी। रात को शयन के समय रामप्रसाद जी ने भगवान को कोमल पीताम्बर ओढ़ाया और नियम के अनुसार एक घंटा बैठकर विरह के भजन गाए। उनकी आँखों से आँसू गिर रहे थे, पर शिकायत एक भी न थी।

रात के सन्नाटे में जब पूरी अयोध्या सो रही थी, पलटू बनिया के किवाड़ किसी ने ज़ोर-ज़ोर से खटखटाए।

"अरे पलटू! ओ पलटू सेठ! दरवाज़ा खोल!"

पलटू झुंझलाकर उठा। मन में आया कि इन शरारती बच्चों को आज मज़ा चखाऊँगा। पर जैसे ही किवाड़ खुले, उसके होश उड़ गए। सामने चार बालक खड़े थे, जिनकी उम्र बारह वर्ष से कम रही होगी। उनकी आभा ऐसी थी कि मानो साक्षात चंद्रमा धरा पर उतर आया हो। चारों ने एक ही लंबा पीताम्बर ओढ़ रखा था।

पलटू का सारा क्रोध कपूर की तरह उड़ गया। उसने मंत्रमुग्ध होकर पूछा— "तुम कौन हो बच्चों? इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो?"

बालक मुस्कराए— "हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है। इस पीताम्बर की गाँठ खोलो, इसमें सोलह सौ रुपए हैं। इन्हें संभालो और कल सुबह आश्रम में राशन भिजवा देना।"

उस ज़माने में सोलह सौ रुपए एक विशाल धनराशि थी। चांदी के सिक्कों की खनक से पलटू का घर गूँज उठा। वह ग्लानि से भर गया— "हाय! आज मैंने मना किया तो महंत जी नाराज़ हो गए और रात में ही पैसे भिजवा दिए!" उसने हाथ जोड़कर कहा— "बच्चों, यह तो बहुत ज़्यादा हैं। इतने में तो सालों का राशन आ जाएगा।"

बालकों ने चलते-चलते कहा— "तो थोड़ा-थोड़ा करके रोज़ भेज देना, पर आज के बाद कभी मना मत करना।" वे बालक अँधेरे में विलीन हो गए, पर पलटू का हृदय चुरा ले गए।

सुबह जब पुजारी ने मंदिर के पट खोले, तो हाहाकार मच गया— प्रभु का पीताम्बर गायब था! चोरी की आशंका से सब परेशान थे। तभी बैलगाड़ी में ढेरों सामान लादे, आँखों में आँसू लिए पलटू बनिया वहाँ पहुँचा और रामप्रसाद जी के चरणों में लोट गया।

"महाराज! मुझे क्षमा कर दें। रात को उन बालकों के हाथ इतने पैसे भेजने की क्या ज़रूरत थी? यह रहा आपका पीताम्बर, वे बालक इसे मेरे पास ही भूल गए थे। बस एक बार मुझे उन दिव्य बालकों के दर्शन फिर से करा दीजिए।"

रामप्रसाद जी का कलेजा धक से रह गया। उन्होंने पीताम्बर पहचाना— यह वही था जिसे उन्होंने रात को ठाकुर जी को ओढ़ाया था। वे समझ गए कि भक्त की भूख मिटाने के लिए स्वयं चारों भाई (राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) पीताम्बर ओढ़कर बनिए की दुकान पर गए थे।

रामप्रसाद जी मंदिर की ओर भागे और गर्भगृह में दहाड़ मारकर रोने लगे—

 "हे भक्तवत्सल! मेरे कारण आपको आधी रात को नंगे पैर भटकना पड़ा? मैंने जीवन भर सेवा की और दर्शन इस बनिए को दे दिए?"

इस अलौकिक घटना ने दो जीवन बदल दिए:

 * पलटू बनिया को ऐसा वैराग्य हुआ कि वे सब छोड़-छाड़ कर संत बन गए और आगे चलकर सुप्रसिद्ध संत श्री पलटूदास जी के नाम से विख्यात हुए।

 * श्री रामप्रसाद जी विरह में मूर्छित हो गए। उस मूर्च्छा में उन्हें चारों भाइयों और माता जानकी के साक्षात दर्शन हुए। माँ जानकी ने अपने हाथ से उनके मस्तक पर बिंदी लगाई।

तभी से अयोध्या के इस आश्रम में बिंदी वाले तिलक की परंपरा चली आ रही है, जो इस बात का प्रमाण है कि भगवान अपने भक्त के स्वाभिमान के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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धन्यवाद। 

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