सब दिन न होत एक समान

सब दिन न होत एक समान 


कहते हैं समय की धारा कभी एक सी नहीं बहती। जैसे नदी का पानी हर पल बदलता है, वैसे ही जीवन भी हर क्षण नया रूप लेता है। पेड़ पर लगे पत्ते एक जैसे नहीं होते, मौसम हर महीने बदलता है, और आकाश में हर दिन नया रंग घुल जाता है। यही परिवर्तन जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।

एक छोटे से गाँव में करण नाम का युवक रहता था। वह स्वभाव से थोड़ा अधीर था। जब उसके जीवन में कठिनाइयाँ आईं, खेती में नुकसान हुआ, मित्र दूर हो गए और परिवार में बीमारी ने दस्तक दी तो वह अक्सर आकाश की ओर देखकर शिकायत करता, मेरे साथ ही ऐसा क्यों? क्या मेरा समय कभी नहीं बदलेगा?

गाँव के बाहर एक विशाल पीपल का पेड़ था। करण रोज़ उसके नीचे बैठता और अपने दुःखों को सोचता रहता। एक दिन वहाँ से गुजरते हुए एक वृद्ध साधु ने उसे उदास देखा। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, “बेटा, क्यों इतने चिंतित हो?”

करण ने कहा, “मेरा समय खराब चल रहा है। सब कुछ उल्टा हो रहा है। लगता है जीवन ऐसा ही रहेगा। 

साधु ने पीपल के पेड़ की ओर इशारा करते हुए पूछा, “क्या तुमने कभी इस पेड़ को ध्यान से देखा है? 

करण ने कहा, “हाँ, यह तो हमेशा ऐसा ही रहता है।”

साधु मुस्कुराए, “क्या सच में? बसंत में इसकी शाखाएँ नई कोपलों से भर जाती हैं, गर्मी में घनी छाँव देता है, वर्षा में पत्तों पर मोती जैसे पानी की बूँदें चमकती हैं, और पतझड़ में इसके पत्ते झड़ जाते हैं। क्या यह हर मौसम में एक जैसा रहता है?" 

करण चुप हो गया। साधु बोले, "जब पतझड़ आता है तो क्या पेड़ रोता है? नहीं। उसे पता है कि बसंत फिर आएगा। समय का पहिया घूमता रहता है। न सुख स्थायी है, न दुःख।”

कुछ महीनों बाद गाँव में अच्छी बारिश हुई। करण की फसल लहलहा उठी। जिन मित्रों ने दूरी बना ली थी, वे भी लौट आए। घर में बीमारी ठीक हो गई। करण ने फिर उसी पीपल के पेड़ के नीचे खड़े होकर आकाश की ओर देखा। आज वही आकाश उसे अधिक नीला और उजला लगा। तभी उसे साधु की बात याद आई—“पेड़ पर पत्ते एक जैसे नहीं होते, फिर जीवन कैसे एक-सा रहेगा?”

अब जब भी गाँव में कोई व्यक्ति कठिन समय से गुजरता, करण उसे पीपल के पेड़ के पास ले जाकर यही कहानी सुनाता। वह कहता, “यदि आज पतझड़ है तो घबराओ मत, बसंत रास्ते में है।” धीरे-धीरे करण समझ गया कि जीवन का सौंदर्य ही परिवर्तन में है। यदि हर दिन एक जैसा होता, तो न आशा होती, न उत्साह। अँधेरी रात के बाद ही तो सूरज की किरणें सबसे अधिक चमकती हैं।

समय कभी एक-सा नहीं रहता। न दुःख स्थायी है, न सुख। जैसे मौसम बदलते हैं और पेड़ के पत्ते झड़कर फिर हरे हो जाते हैं, वैसे ही जीवन में भी हर कठिनाई के बाद नई शुरुआत होती है। इसलिए धैर्य रखें, आशा बनाए रखें क्योंकि परिवर्तन ही जीवन का नियम है।

सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश l 

सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।

 सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।

 सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय।

 सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण।

सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण।

 सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह।

ढलते ढलते ढल गई, तरवर की सी छाँह।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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