मायाः महाठगिनी

मायाः महाठगिनी (लघु नाटिका) हरियाणवी भाषा में



मंच सज्जा - एक चारपाई, दूसरी ओर मटका, उसके ऊपर एक गिलास

पात्र- परिचय

1. सूत्रधार

2. अम्मा (स्व॰ मायाराम की पत्नी)

3. छुआराम (सबसे बड़ा पुत्र)

4. रसना बाई (पुत्री)

5. नकटाराम (दूसरा पुत्र)

6. नयन सिंह (तीसरा पुत्र)

7. कर्णसिंह (चौथा पुत्र)

8. सुरसती की माँ और लछमी की आवाज़ नेपथ्य से ही सुनाई देगी।

(सूत्रधार का प्रवेश)

(इधर उधर देखता हुआ मोदी की आवाज़ में) ”मित्रों! ..............।

(नेपथ्य से - सारे पात्र मिल कर - मोदी......... मोदी..........)

नहीं....नहीं... आपने मुझे सही नहीं पहचाना। मैं मोदी नहीं हूँ। चलो! फिर से शुरू करता हूँ।

भाइयों और बहनों!...... क्या आपने सुना है?..........(इधर उधर देखकर)

( कुछ आवाज़ें नेपथ्य से - सुना है..., सुना है..., नहीं सुना... नहीं सुना...)

अरे!...... पूरी बात तो सुन लो। यह भी कोई बात हुई! कोई कहता है - सुना है, कोई कहता है - नहीं सुना। अरे! सब शांत कैसे हो गए? मैं मोदी जी के भाषण की बात नहीं कर रहा। मैं तो यह पूछ रहा हूँ कि क्या आपने वह सुना है, जो मैंने सुना है?

(कान पर हाथ लगा कर) क्या कहा?.... नहीं सुना.....। 

चलो! मैं बताता हूँ। 

(कान पर हाथ रख कर, धीरे से बोलते हुए) मैंने सुना है कि अपने गाँव में कोई ज्ञानी, ध्यानी महात्मा जी आए हुए है क्या तुमने उनका प्रवचन सुना है? भाई! मैं तो प्रवचन के बारे में पूछ रहा था। पता है....आज सुबह 8 बजे उन्होंने अपने प्रवचन में बहुत ज्ञान की बातें बताई थी। अब शाम को 4 बजे से 5 बजे तक चैपाल पर फिर उनका प्रवचन होगा। मैं भी सुनने जाऊँगा। तुम भी चलोगे क्या?.....(इधर उधर देखकर)

(नेपथ्य से - हाँ.....हाँ..., नहीं...नहीं...)

 फिर वही बात! कुछ लोग कह रहे हैं - हाँ और कुछ कह रहे हैं -नहीं....

अरे भाई! अपना क्या जाता है? तुम्हें जाना हो तो जाओ, वरना अपने तो दोनों हाथों में लड्डू है प्रवचन समझ में आ जाएगा तो ज्ञान मिलेगा, वरना नींद तो पूरी हो ही जाएगी।

बताऊँ कैसे?

वो ऐसा है कि एक बार मैं एक महात्मा जी की सभा में गया। एक सेठ जी सबसे आगे बैठ कर सभा में सो रहे थे। महात्मा जी का ध्यान प्रवचन से हट कर सेठजी की ओर चला गया।

उन्होंने पूछा - सेठजी... सो रहे हो क्या?

सेठ जी हड़बड़ा कर बोले - नहीं तो।

और वे फिर सो गए।

थोड़ी देर के बाद फिर महात्मा जी का ध्यान उनकी ओर चला गया और ध्यान भटका, तो प्रवचन अटका।

उन्होंने पूछा - सेठजी..., सो रहे हो क्या?

सेठ जी फिर हड़बड़ा कर बोले - नहीं तो।

तीसरी बार तो हद हो गई। महात्मा जी ने पूछा - सेठजी..., जाग रहे हो क्या?

सेठ जी अंगड़ाई लेते हुए बोले - नहीं तो।

इसका मतलब था कि वे सो रहे थे।

अब की बार तो उनकी नींद लोगों के ठहाके से ही खुली।

भाई! जो समय पर जाग जाए और महात्मा जी का प्रवचन सुन ले, उसका भी भला और जो सो रहा है, उसका भी भला, हमें क्या?

तो भाइयों और बहनों! मैं तो स्व॰ मायाराम जी के साथ ही जाता था प्रवचन सुनने। अब वे तो रहे नहीं, उन की पत्नी से पूछता हूँ कि वे चलेंगी क्या प्रवचन सुनने, अरे वही....जिनको सब अम्मा-अम्मा कह कर बुलाते हैं। वैसे तो उनको पता ही है कि गाँव में महात्मा जी आए हुए हैं। क्या? आप नहीं जानते अम्मा को। चलो, मैं इनसे और इनके परिवार से आपका परिचय करा देता हूँ।

(अम्मा मंच पर आकर नमस्कार करती हुई चली जाती है।)  

ये हैं अम्मा, स्व॰ मायाराम जी की पत्नी। वही माया राम...., जो अपनी मायाचारी से सबको ठगने में माहिर थे।

और पता है! इनके चार बेटे हैं - छुआराम, नकटाराम, नयन सिंह और कर्ण सिंह और एक बेटी भी है - रसना बाई।

(छुआराम मंच पर आकर चीजों को छूने का अभिनय करता हुआ नमस्कार करता हुआ चला जाता है।)

तो मिलिए इनसे। ये हैं छुआराम। इसकी एक बुरी आदत है। वह सब चीज़ों को छूकर देखता रहता है, गर्म है या ठंडा, नरम है या सख्त।

(रसनाबाई चूरण चाटती हुई और चटकारे लेती हुई मंच पर आकर नमस्कार करती हुई चली जाती है।)

वाह! रसना बाई के तो अंदाज़ ही निराले है इस को चटकारे लेने से ही फुरसत नहीं मिलती। 

(नकटाराम मंच पर आकर कुछ सूंघता हुआ नमस्कार करता हुआ चला जाता है।)

देख रहे हैं इस नकटाराम को। इसे सूंघते रहने की बीमारी है।

(नयनसिंह मंच पर आकर नमस्कार करता हुआ चला जाता है।)

यह है नयन सिंह। (अपनी अंगुलियों कोे गोल बनाते हुए और आँखों पर रखते हुए)

यह अपनी पलकों की खिड़की खोल कर बाहर के नज़ारों का ही आनन्द लेता रहता है।

(कर्णसिंह मंच पर आकर कान से सुनने का अभिनय करते हुए नमस्कार करता हुआ चला जाता है।)

और इस कर्णसिंह के कान पर ढक्कन तो हैं नहीं, बस! कान लगाकर सबकी बातें सुनता रहता है।

चलो! देखते हैं अम्मा क्या कर रही है?

(सूत्रधार मंच के एक कोने पर चला जाता है)

(दूसरी ओर से अम्मा का प्रवेश)

(अम्मा साधारण वस्त्र पहने हुए है, बालों में हल्की-सी सफेदी)

अम्मा - ”हैं ए सुरसती की माँ, न्यू कहवैं सै, गाम मैं एक महात्मा जी आ रे सैं! चालै सै के महात्मा जी का ज्ञान सुणन।“

(नेपथ्य से आवाज़ आती हुई) 

(”हाँ अम्मा, आऊँ सू“)

”ए लछमी! तै भी चालेगी के?“

(नेपथ्य से आवाज़ आती हुई) 

(”अम्मा, मैं भी चालूंगी। थारे गैल तो भेज भी देंगे। जरा जूती पहन ल्यंू“)

”ए पुरानी जूती पहन लियो। आजकल तो लोग सतसंग मैं सै जूती ठावैं अर बाजार मैं बेच देवैं। थमनैं के बताऊँ? मैं जूती लेण गई एक दुकान पै। पुराणी-सी जूती दिखाण लगा। मैं बोली अक नई कोनी के? तो बोला - अम्मा! लाॅकडाउन मैं मंदिर अर बाबाओं के सतसंग बंद कर राखे सैं। नया माल कोनी आंदा इब। लै बता। मैं तो नई जूती के दाम मैं पुरानी जुती ले कै आ गी। यो हाल है इस देस का।“

(नेपथ्य से आवाज़ आती हुई) 

(चालो अम्मा! आ गे हम तैयार होके।)

अम्मा - हाँ...हाँ चलो। (ऐसा कहती हुई मंच के पीछे चली जाती है।)

(सूत्रधार का प्रवेश)

”वाह! मैं भी गया था सब के साथ, महात्मा जी के प्रवचन सुन कर आया हूँ। आज तो आनन्द आ गया। क्या ज्ञान बांटा है महात्मा जी ने। सबके दिमाग की खिड़की खोल दी।

चलो देखते हैं, अम्मा जी क्या सुन कर आई हैं चैपाल पर। वही बताएंगी।“ 

(सूत्रधार मंच के एक कोने पर चला जाता है)

(दूसरी ओर से अम्मा का प्रवेश)

अम्मा - (जनता को सम्बोधन करते हुए) ”ए! मनै तो इतना ही समझ में आया अक महात्मा जी बार-बार माया का नाम लेवै था। इब मायाराम मतलब के नकटे के बापू नै तो मरे नै भी दो साल हो लिए। महात्मा जी न्यूँ कह्वै था अक ‘यो माया ठगनी सबनै ठग लेगी’, ‘माया महाठगिनी हम जानी’.....‘जिसने मन को बस में कर लिया, उसकी इन्द्रियाँ भी उसकी गुलाम हो जाती हैं’.....‘तभी हम माया की ठगी से बच सकते हैं और तभी इस जीव का कल्याण होेेे सकता है’...... पर थमनै ना बेरा के? अक मनै न ठग सकै कोई। घणी ए चैकसी राखू सूँ। चार-चार लट्ठ जिसे बेटे सैं मेरे। अर रसना बेटी भी कोई बेटां तै कम सै के? उस माया बैरण की के बिसात जो मेरे घर मैं घुस जागी? न्यूं कह्वै था अक ‘मन नै बस मैं राखो।’ मैं के मन कै जंजीर बांध के बिठा दूं? यो तो भागेगा ही चारों कानी। इसकी तो आदत सै घुम्मण की।“

(सूत्रधार की आवाज़ - घर के दरवाज़े पर मंच के एक तरफ़ छुआराम -सबसे बड़ा पुत्र हाथ में गिलास लिए बैठा है)

छुआराम- ”हे भगवान! मैं तो कस्सी चला-चला कै प्यासा मर गया। इस ताते पाणी सै के प्यास बुझै सै। अम्मा होती तो ठंडा पाणी तो पिला देती।“

(अम्मा को देखते ही) लो! आ गई अम्मा। अम्मा! मैं कितनी देर सै प्यासा बैठा हूँ। मन्नै ठंडा पानी तो पिला दे।“

अम्मा- ”लाऊँ सूं, छुआ बेटा!“

(तभी रसना चूरण चाटती हुई और चटकारे लेती हुई प्रवेश करती है)

रसना- ”अम्मा! मैं भी पीऊँगी ठंडा पानी। पर उसमैं खट्टा-मीठा स्वाद भी आना चहिए। स्वाद के बिना के मजा?“

अम्मा- ”ठीक सै, रसना बेटी।“

(तभी नकटाराम इधर-उधर सूंघता हुआ प्रवेश करता है)

नकटाराम- ”अम्मा! भैंसा धोरे तो घणी ए बदबू आवै थी। मनै तो ठंडा अर खट्टा-मीठा के साथ-साथ केवड़े-गुलाब की खुसबू वाला पानी पिला दे। मन खुस हो जागा।“

अम्मा- ”ठीक सै, बेटा। तनै तो खुसबू के बिना पानी भी मीठा कोनी लागता।“

 (नयन सिंह आँखें मटकाता हुआ इधर-उधर देखता हुआ प्रवेश करता है)

नयन सिंह - ”अम्मा! मैं भी पीऊँगा पानी। देखना! पानी ठंडा भी हो, खट्टा-मीठा अर केवड़े-गुलाब की खुसबू वाला तो हो, पर उसका रंग भी तो लाजवाब होना चाहिए। जैसे हरा, लाल, आॅरेंज वाला कलर। बस! देखते ही मन उसका स्वाद लेन नै मचल जावै।“

अम्मा- ”हे भगवान्! इसा पानी क्यूकर बनेगा जो ठंडा भी हो, खट्टा-मीठा भी हो, केवड़े-गुलाब की खुसबू वाला भी हो अर उसका रंग भी लाजवाब हो, तभी सबनै अच्छा लागेगा।“

(तभी चैथे बेटे कर्णसिंह ने कान पर हाथ रख कर कुछ सुनते हुए प्रवेश किया।)

कर्णसिंह- ”अम्मा! मेरे वास्ते भी पानी लाइयो। तै किस सोच मैं पड़गी। वो धरे हैं न अपने फ्रिज मैं दस भांत की बोतलां मैं, कोकाकोला, फ्रूटी अर संतरे के जूस वाले कलरफुल आइटम। सच्ची! उनका तो नाम सुन कै ही मुँह मैं पानी आ जावै।“

अम्मा- (बच्चों की नकल करते हुए) ”अच्छा! तो यो बात सै। छूए नै ठंडा चहिए, रसना बाई नै खट्टा-मीठा चहिए, नकटे नै खुसबू आला चहिए, नयने नै देखण मैं रंगीन चहिए अर करणे नै सुणन मैं सुथरा लगना चहिए। हे भगवान! मन्नै तो इनकी चाह पूरी करण मैं ही अपनी जिंदगी बिता दी। इणकी चाह पूरी करदे करदे मनै अपणी राह तो कदी दिक्खी ही नहीं। महात्मा जी साची कहवैं थे अक ये माया के पूत ही मन्नै ठगण लाग रे सैं अपने मोह मैं फंसा कै। मनैं भी तो अपना परलोक सुधारना सै अक ना। 

मेरा मन इनकी ही सुनता रह्वेगा तो ये पाँचों बालक बस मैं क्यूकर आवेंगे। सच्ची कहूँ तो थम भी महात्मा जी की बात मान लो। पाँचो इन्द्रियां नै बस मैं करण तै पहले अपणे मन नै बस मैं कर लो। अभी बखत हाथ सै नहीं निकला। देखो बेटे! प्यास तो पानी पी कै ही बुझेगी। (मटके की तरफ इशारा करके) यो रहा मटके का पानी। पीना है तो पी लो। मैं तो चाली रोटी बनाण नै। मनै और भी घणै काम करने सै अर अपनी जिन्दगी सुधारणी है तो महात्मा जी की बात पै अमल भी तो करणा सै। जयराम जी की सबनै।“ (सारे बच्चे माथे पर हाथ रख कर एक लाइन में बैठ जाते हैं और अम्मा उनके पीछे लगाम कसकर पकड़ने की अवस्था में पोज़ बनाकर खड़ी हो जाती है।)

(सूत्रधार का प्रवेश)

सूत्रधार- ”तो भाइयों और बहनों! आपने देखा कि अपनी पाँचों इन्द्रियों को वश में करने के लिए पहिले अपने मन को वश में करना पड़ता है और तभी आत्मा का कल्याण होता है। आशा है कि आपने भी महात्मा जी से अपनी पाँचों इन्द्रियों के साथ-साथ मन को वश में करने की कला सीख ली होगी। धन्यवाद। सब को नमस्कार। फिर मिलेंगे।“

(तालियों की गड़गड़ाहट के साथ पटाक्षेप होता है।)

इति लघु नाटिका (सरिता जैन द्वारा रूपांतरित)

  

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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