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ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की गाथा

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  ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की गाथा  ब्राह्मण कैसे होते हैं? ब्राह्मण ऐसे होते हैं, जैसे ईश्वर चन्द्र विद्यासागर। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को पाँच सौ रुपये महीने की नौकरी मिली थी। शिक्षा में नौकरी करते हुए उन्हें पाँच सौ रुपये महीने मिलने लगे, तो उन्होंने विचार किया कि इन पाँच सौ रुपयों का क्या सदुपयोग करना चाहिए?  उन्हें ख्याल आया कि जब हम छोटे थे, तब मिट्टी के तेल के अभाव में दीपक न जला पाने के कारण प्रकाश के लिए सड़क पर खड़े होकर पोल पर लगी बत्तियों के प्रकाश में पढ़ते थे। पैसों की तब कितनी तंगी थी। पिताजी भेजते नहीं थे। इसलिए यह पाँच सौ रुपये भगवान ने अगर हमको दिये हैं, तो जिस समाज में हम रहते हैं, जिस देश में हम रहते हैं, उस पर उन लोगों का भी हक है। हमको कम में गुजारा करना चाहिए। उन्होंने अपने कुटुम्बियों से कहा कि आपको पचास रुपये में गुजारा करना पड़ेगा और साढ़े चार सौ रुपये उन लोगों के लिए देना पड़ेगा, जो शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। जिनके पास फीस देने के लिए पैसे नहीं है। उस जमाने में घरों में बिजली तो थी नहीं, इसलिए मिट्टी के तेल का दिया जलाकर पढ़ने का इंतजाम करना पड़ता था। ज...

मूर्ख कौन?

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 मूर्ख कौन? एक प्रेरणादायक कहानी किसी गांव में एक सेठ रहता था. उसका एक ही बेटा था, जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था. सेठ की बहू एक दिन कुएँ पर पानी भरने गई. घड़ा जब भर गया तो उसे उठाकर कुएँ के मुंडेर पर रख दिया और अपना हाथ-मुँह धोने लगी. तभी कहीं से चार राहगीर वहाँ आ पहुँचे. एक राहगीर बोला, “बहन, मैं बहुत प्यासा हूँ. क्या मुझे पानी पिला दोगी?“ सेठ की बहू को पानी पिलाने में थोड़ी झिझक महसूस हुई, क्योंकि वह उस समय उसके सिर पर घूँघट भी नहीं था. उसके पास लोटा या गिलास भी नहीं था जिससे वह पानी पिला देती. इसी कारण वहाँ उन राहगीरों को पानी पिलाना उसे ठीक नहीं लगा. बहू ने उससे पूछा, “आप कौन हैं?“ राहगीर ने कहा, “मैं एक यात्री हूँ।“ बहू बोली, “यात्री तो संसार में केवल दो ही होते हैं, आप उन दोनों में से कौन हैं? अगर आपने मेरे इस सवाल का सही जवाब दे दिया तो मैं आपको पानी पिला दूंगी. नहीं तो मैं पानी नहीं पिलाऊंगी.“ बेचारा राहगीर उसकी बात का कोई जवाब नहीं दे पाया. तभी दूसरे राहगीर ने पानी पिलाने की विनती की. बहू ने दूसरे राहगीर से पूछा, “अच्छा तो आप बताइए कि आप कौन हैं?“ दूसरा राहगीर तुरंत ...

ज्ञान का बोझ

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  ज्ञान का बोझ और नारद की सीख (एक पौराणिक कथा जो आज भी उतनी ही सार्थक है...) एक बार की बात है। कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की दिव्य सभा सजी हुई थी। चारों ओर ऋषि-मुनियों का जमावड़ा था - वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, और स्वयं देवर्षि नारद भी पवित्र स्वर में वीणा झंकृत करते हुए बैठे थे। पूरे वातावरण में ज्ञान, शांति और भक्ति की गूंज थी। इसी बीच, महामुनि दुर्वासा भारी-भरकम पुस्तकों का एक बड़ा गट्ठर कंधे पर लादे सभा में प्रकट हुए। दुर्वासा एक तपस्वी और महान संत तो थे, परंतु उनकी चिड़चिड़ी और तुनकमिजाज प्रवृत्ति सबको ज्ञात थी। सभा में विराजमान संतों और ऋषियों को नजरअंदाज़ करते हुए वे सीधे भगवान शिव के समीप जाकर बैठ गए। भगवान शिव ने अपने सहज और सौम्य स्वभाव में मुस्कुराते हुए पूछा, “मुनिवर! अध्ययन कैसा चल रहा है?“ दुर्वासा ने अपनी पुस्तकों की ओर इशारा करते हुए गर्वपूर्वक कहा, “मैंने इन समस्त ग्रंथों का गंभीर अध्ययन किया है, और ये अब मुझे कंठस्थ हैं।“ उनकी वाणी में तप का तेज था, पर विनम्रता और धैर्य का अभाव भी। यह देखकर देवर्षि नारद उठ खड़े हुए। उनकी वाणी शांत थी, परंतु शब्दों में गहरी चुभ...

सेठ की बेटी, राधा रानी

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  सेठ की बेटी, राधा रानी   बरसाने में एक सेठ रहते थे। उनकी तीन चार दुकानें थी, जो अच्छी तरह चलती थीं। उनकी तीन बेटे और तीन बहुएं थी। सब आज्ञाकारी, पर सेठ के मन में एक इच्छा थी। उनके बेटी नहीं थी। संतो के दर्शन से उनकी चिन्ता कम हुई। संत बोले - मन में अभाव हो तो उस पर भगवान का भाव स्थापित कर लो...  सुनो सेठ तुमको मिल्यो, बरसाने का वास।  यदि मानो नाते राधे सुता, काहे रहत उदास।।   सेठ जी ने राधा रानी का एक चित्र मंगवाया और अपने कमरे में लगा कर पुत्री भाव से रहते। रोज सुबह राधे राधे कहते, भोग लगाते और दुकान से लौटकर राधे राधे कहकर सोते। तीन बहु बेटे हैं घर में, सुख सुविधा है पूरी।  संपति भरि भवन रहती, नहीं कोई मजबूरी।।  कृष्ण कृपा से जीवनपथ पे, आती न कोई बाधा।  मै बहुत बड़भागी पिता हूं, मेरी बेटी है राधा।।  एक दिन एक मनिहारी चूड़ी पहनाने सेठ के हाते में दरवाजे के पास आ गयी। उसने चूड़ी पहनने की गुहार लगाई। तीनों बहुऐं बारी-बारी से चूड़ी पहन कर चली गयी। फिर एक हाथ और बढ़ा तो मनिहारी ने सोची कि कोई रिश्तेदार आया होगा उसने चूड़ी पहनाई और चली गयी। सेठ ...

भक्त का मान

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 भक्त का मान   भगवान अपने भक्तों से बहुत प्रेम करते हैं। भगवान ने गीता में भी कहा है कि जो मुझे याद करता है, मैं भी उसे याद करता हूं.. एक बार की बात है। कबीरदास की कुटिया के पास एक वैश्या ने अपना कोठा बना लिया। एक ओर तो कबीर दास, जो दिन भर भगवान का नाम कीर्तन करते हैं और दूसरी ओर वह वैश्या, जिसके घर में नाच-गाना होता रहता है। एक दिन कबीरजी उस वैश्या के यहाँ गए और कहा कि ‘देख बहन! तुमारे यहाँ बहुत खराब लोग आते हैं, तो आप और कहीं जाकर रह सकते हो क्या?  संत की बात सुनकर वैश्या भड़क गयी और कहा कि अरे फ़कीर! तू मुझे यहाँ से भगाना चाहता है, कही जाना है तो तू जा कर रह, पर मैं यहाँ से कहीं जाने वाली नहीं हूँ। कबीरजी ने कहा - ठीक है, जैसी तेरी मर्जी।  कबीरदास जी अपनी कुटिया में वापिस आ गए और फिर से अपने भजन-कीर्तन में लग गये। जब कबीर जी के कानो में उस वैश्या के घुँघरू की झंकार और कोठे पर आये लोगों के गंदे-गंदे शब्द सुनाई पड़ते, तो कबीर जी अपने भजन कीर्तन को और जोर-जोर से तेज आवाज़ से करने लगे।  तो बंधुओं! भजन का ऐसा प्रभाव हुआ, जो लोग वैश्या के कोठे पर आते जाते थे, वे अब कबी...

अति वाचालता

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  अति वाचालता एक राजा बहुत अधिक बोलता था। उसका मन्त्री विद्वान् और हितचिन्तक था। इसलिये सोचता रहता था कि राजा को कैसे इस दोष से मुक्त करूँ और वह ज्ञान दूँ, जो कि मनुष्य के हृदय में बहुत गहराई से उतरकर उसके स्वभाव का अंग बन जाता है? मन्त्री हमेशा राजा के हित की सोचता रहता था और उचित अवसर की तलाश में था कि राजा को अपने इस दोष का आभास हो और उसके द्वारा होने वाली हानि को समझकर उसमें से निकल जाए। एक दिन की बात है, राजा मन्त्री के साथ उद्यान में घूमते हुए एक शिला पर बैठ गया। शिला के ऊपर एक छायादार पेड़ था। उस आम के पेड़ पर कौवे का एक घोंसला था, उसमें काली कोयल अपना अण्डा रख गयी। कोयल अपना घोंसला नहीं बनाती, वरन् कौवे के घोंसले में ही अण्डा रख देती है। कौवी उस अण्डे को अपना समझकर पालती रहती है। आगे चलकर उसमें से कोयल का बच्चा निकला। कौवी उसे अपना पुत्र समझकर चोंच से चुग्गा ला, उसे पालती थी। कोयल के बच्चे ने असमय जबकि उसके पर भी नहीं निकले थे, कोयल की आवाज की। कौवी ने सोचा- ’यह अभी विचित्र आवाज करता है, बड़ा होने पर क्या करेगा?’ कौवी ने चोंच से मार-मारकर उसकी हत्या कर दी और घोंसले से नीचे गिर...

हमेशा अच्छा करो

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  हमेशा अच्छा करो  एक औरत अपने परिवार के सदस्यों के लिए रोज़ाना भोजन पकाती थी और एक रोटी वह वहाँ से गुजरने वाले किसी भी भूखे के लिए पकाती थी। वह उस रोटी को खिड़की के सहारे रख दिया करती थी, जिसे कोई भी ले सकता था। एक कुबड़ा व्यक्ति रोज़ उस रोटी को ले जाता और बजाय धन्यवाद देने के अपने रास्ते पर चलता हुआ वह कुछ इस तरह बड़बड़ाता - “जो तुम बुरा करोगे, वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे, वह तुम तक लौट कर आएगा।“ दिन गुजरते गए और ये सिलसिला चलता रहा। वह कुबड़ा रोज रोटी लेकर जाता और इन्हीं शब्दों को बड़बड़ाता - “जो तुम बुरा करोगे, वह तुम्हारे साथ रहेगा और जो तुम अच्छा करोगे, वह तुम तक लौट कर आएगा।“ वह औरत उसकी इस हरकत से तंग आ गयी और मन ही मन खुद से कहने लगी कि “कितना अजीब व्यक्ति है, एक शब्द धन्यवाद का तो देता नहीं है, और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है, मतलब क्या है इसका?“ एक दिन क्रोधित होकर उसने एक निर्णय लिया और बोली - “मैं इस कुबड़े से निजात पाकर रहूंगी।“ और उसने क्या किया कि उसने उस रोटी में ज़हर मिला दिया, जो वह रोज़ उसके लिए बनाती थी और जैसे ही उसने रोटी को खिड़की पर रखने की कोशि...

भाग्य और कर्मफल

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  भाग्य और कर्मफल रामदीन बेहद गरीब था। बचपन से आज तक का उसका जीवन अभावों में ही बीता था। समय के साथ माता-पिता छोड़ गए, किन्तु गरीबी ने नहीं छोड़ा। शादी हो गई, बच्चे हो गए। उसकी ज़िन्दगी में सब आए, मगर भाग्य-लक्ष्मी नहीं आई। रामदीन बेहद दुःखी रहता। कई बार सोचता - आत्मघात कर लूं। मगर पत्नी और बच्चों का ख्याल करके ऐसा नहीं कर पाता था। ऐसा भी नहीं था कि वह निकम्मा था या कामचोर था, खूब मेहनत करता था, किन्तु मेहनत का फल नहीं मिल पाता था। एक दिन उसका एक पुराना मित्र शंकर शहर से आया तो उसके शाही ठाठ-बाट देखकर रामदीन को बहुत आश्चर्य हुआ। शंकर कुछ साल पहले तक गांव में फटे-पुराने कपड़े पहने फिरा करता था, जिसके घर में खाने के लिए रोटी भी नहीं थी, आज वही शंकर कितना धनवान बन गया था। शंकर उसके घर आया तो बच्चों को रोते देखकर बोला, “अरे रामदीन! तेरी ज़िन्दगी नहीं बदली, देख तो तूने घर की क्या हालत बना रखी है, बच्चे भूख से तड़प रहे हैं।” “क्या करूं, शंकर भाई! मैं तो खुद ही इस जीवन से तंग आ गया हूं। यह गरीबी मेरा पीछा ही नहीं छोड़ती।” “रामदीन! अब तुम मेरे साथ शहर चलोगे।” “मैं तो तुम्हारे साथ शहर चला चलूंगा भ...

अहमियत

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  अहमियत हर इंसान की अपनी अहमियत होती है। (एक नैतिक कहानी ) एक बार की बात है। एक बड़ा बिजनेसमैन अपने ड्राइवर के साथ किसी दूरस्थ गांव की ओर जा रहा था। रास्ते में एक चौड़ी नदी पड़ गई। ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी और बोला, “साहब, इस नदी के उस पार जो गांव है, वहां तक सड़क से जाना हो तो छह से आठ घंटे लग सकते हैं, लेकिन आपके पास तो इतना समय नहीं है।” बिजनेसमैन उस गांव में एक फैक्ट्री लगाने का विचार कर रहा था, इसलिए वह ज़मीन देखने आया था। समय की कमी थी, इसलिए वह चिंतित हो गया। तभी ड्राइवर ने सुझाव दिया, “साहब, चाहें तो नाव से जा सकते हैं, बस 15-20 मिनट लगेंगे।” यह विचार सुनकर बिजनेसमैन खुश हो गया। वो दोनों नदी किनारे पहुंचे। वहां एक नाव वाला खड़ा था। बिजनेसमैन ने कहा, “भाई, उस पार छोड़ दोगे?”  नाव वाले ने मुस्कराकर कहा, “जरूर साहब, बैठिए।” बिजनेसमैन नाव में बैठ गया। नदी की यात्रा शुरू हुई। रास्ता छोटा था, तो बिजनेसमैन ने बातचीत शुरू की। उसने नाव वाले से पूछा, “क्या तुम्हें पता है उस पार एक बड़ी फैक्ट्री खुलने वाली है?” नाव वाला भोलेपन से बोला, “साहब, फैक्ट्री क्या होती है, ये मुझे नहीं पता।” बिजने...

एक सोच

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 एक सोच एक सोच जो किसी का भला कर सकती है। एक कंपनी की हर दीपावली की पूर्व संध्या पर एक पार्टी और लॉटरी आयोजित करने की परंपरा थी। लॉटरी ड्रॉ के नियम इस प्रकार थेः  प्रत्येक कर्मचारी एक फंड के रूप में दस रुपये का भुगतान करता है। कंपनी में तीन सौ लोग थे। यानी कुल तीन हजार रुपये जुटाए जा सकते हैं। विजेता सारा पैसा ले जाता है। लॉटरी ड्रा के दिन कार्यालय चहल-पहल से भर गया। सभी ने कागज की पर्चियों पर नाम लिखकर लॉटरी बॉक्स में डाल दिया। हालांकि एक युवक लिखने से झिझक रहा था। उसने सोचा कि कंपनी की सफाई वाली महिला के कमजोर और बीमार बेटे का नए साल की सुबह के तुरंत बाद ऑपरेशन होने वाला था, लेकिन उसके पास ऑपरेशन के लिए आवश्यक पैसे नहीं थे, जिससे वह काफी परेशान थी। भले ही वह जानता था कि जीतने की संभावना कम है, केवल 0.33 प्रतिशत संभावना, उसने नोट पर सफाई वाली महिला का नाम लिखा। उत्साहपूर्ण क्षण आया। बॉस ने लॉटरी बॉक्स को हिलाते हुए उस में से एक पर्ची निकाला। वह आदमी भी अपने दिल में प्रार्थना करता रहाः इस उम्मीद से कि सफाई वाली महिला पुरस्कार जीत सकती है। तब बॉस ने ध्यान से विजेता के नाम की घो...

असली अमीरी (एक प्रेरणादायक कहानी)

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 असली अमीरी  (एक प्रेरणादायक कहानी) गोपाल एक बड़े और व्यस्त शहर में अपने माता-पिता के साथ रहता था। उसके पिता एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे और उनके पास धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी। गोपाल के पास महंगे खिलौने, अच्छे कपड़े, एक बड़ा घर और सुविधाओं से भरपूर जीवन था। लेकिन वह इन सबका आदी हो चुका था और उसे कभी यह अहसास ही नहीं हुआ कि जीवन के असली मायने क्या होते हैं। एक बार गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुईं। गोपाल के पिता ने सोचा कि इस बार उसे सिर्फ मॉल और वीडियो गेम्स में समय नहीं बिताना चाहिए, बल्कि असली जीवन का अनुभव कराना चाहिए। उन्होंने गोपाल से कहा, “बेटा, चलो इस बार गर्मी की छुट्टियों में गाँव चलते हैं। तुम्हें बाहर की दुनिया दिखाते हैं।”  गोपाल थोड़ा चौंका, लेकिन पिता की बात मान गया। अगले दिन वे लोग अपने पैतृक गाँव के लिए रवाना हुए। कुछ ही घंटों की यात्रा के बाद वे गाँव पहुँच गए। वहाँ का वातावरण एकदम शांत था। चारों ओर हरियाली, खुले मैदान, साफ-सुथरी हवा और चहचहाते पक्षी। गोपाल को यह सब देखकर पहले थोड़ी हैरानी हुई, क्योंकि वह तो सिर्फ कंक्रीट के जंगलों और ट्रैफिक की आवाज़ों का आदी था। ग...

भक्तों से भगवान

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  भक्तों से भगवान एक बहुत सुंदर कहानी है। एक राजा था जो एक आश्रम को संरक्षण दे रहा था। यह आश्रम एक जंगल में था। इसके आकार और इसमें रहने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही थी और इसलिए राजा उस आश्रम के लोगों के लिए भोजन और वहां की इमारत आदि के लिए आर्थिक सहायता दे रहा था। यह आश्रम बहुत तेजी से विकास कर रहा था। जो योगी इस आश्रम का सर्वे सर्वा था, वह मशहूर होता गया और राजा के साथ भी उसकी अच्छी नजदीकी हो गई। ज्यादातर मौकों पर राजा उसकी सलाह लेने लगा। ऐसे में राजा के मंत्रियों को ईर्ष्या होने लगी और वे असुरक्षित महसूस करने लगे। एक दिन उन्होंने राजा से बात की - ‘हे राजन, राजकोष से आप इस आश्रम के लिए इतना पैसा दे रहे हैं। आप ज़रा वहां जाकर देखिए तो सही। वे सब लोग अच्छे-खासे खाते पीते नजर आते हैं। वे आध्यात्मिक लगते ही नहीं।’ राजा को भी लगा कि वह अपना पैसा बर्बाद तो नहीं कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर योगी के प्रति उसके मन में बहुत सम्मान भी था। उसने योगी को बुलवाया और उससे कहा - ‘मुझे आपके आश्रम के बारे में कई उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिली हैं। ऐसा लगता है कि वहां अध्यात्म से संबंध...