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मेरा जादुई घर

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  मेरा जादुई घर  एक दिन एक लेखक की पत्नी ने उससे कहा कि तुम बहुत किताबें लिखते हो। आज मेरे लिए कुछ लिखो, तो फिर मुझे विश्वास होगा कि तुम सच में एक अच्छे लेखक हो...।  फिर लेखक ने लिखा.. मेरा जादुई घर। मैं, मेरी पत्नी और हमारे बच्चे एक जादुई घर में रहते हैं....हम अपने गंदे कपड़े उतार देते हैं, जिन्हें अगले दिन साफ कर दिया जाता है। हम स्कूल और ऑफिस से आते ही अपने जूते उतार देते हैं, फिर अगली सुबह हम साफ सुथरे पॉलिश वाले जूते पहनते हैं... हर रात कूड़े की टोकरी कचरे से भरी होती है और अगली सुबह खाली हो जाती है....  मेरे जादुई घर में खेलते समय बच्चों के कपड़ों से बदबू आती है,लेकिन अगले ही पल वे साफ हो जाते हैं और उनके खेल उपकरण जल्दी से अपने बक्से में फिर से व्यवस्थित हो जाते हैं.....  मेरे जादुई घर में हर दिन मेरे और मेरे बच्चों के लिए पसंदीदा खाना बनता है...। मेरे जादुई घर में, आप सुन सकते हैं “माँ, मम्मी मम्मा“ हर दिन लगभग सौ बार पुकारा जाता है ...। मम्मा नेल क्लिपर कहाँ है...? माँ, मेरा गृहकार्य पूरा करवा दो...। मम्मा, भाई मुझे पीट रहा है...। मम्मा, आज मेरा स्कूल लंच ...

उम्मीद का घोड़ा

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  उम्मीद का घोड़ा  बहुत समय पहले राजा विक्रमादित्य नामक एक न्याय प्रिय, किंतु कठोर राजा था। उसकी सेना और राज्य वैभव दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। लेकिन एक बात और थी जिसके लिए वह और भी अधिक जाना जाता था। वह अपने प्रिय सफेद घोड़े “चंद्रकेतु” से बहुत प्रेम करता था। कहते हैं, वह घोड़ा हवा से बात करता था, परंतु फिर भी उड़ नहीं सकता था। एक दिन चोरी और साजिश के झूठे आरोप में दो नौजवान पकड़े गए- आरव और नील। अदालत ने दोनों को मृत्युदंड सुनाया। दोनों को एक साल बाद फाँसी दी जानी थी, लेकिन तभी आरव के मन में एक अनोखा विचार आया। जब राजा विक्रमादित्य ने उनसे पूछा कि आखिरी इच्छा क्या है, तो आरव ने झुककर कहा - महाराज! यदि आप मुझे एक वर्ष की मोहलत दें, तो मैं आपके प्रिय घोड़े ‘चंद्रकेतु’ को उड़ना सिखा दूँगा। राजा के दरबार में सन्नाटा छा गया। सबको लगा कि यह युवक पागल हो गया है। मंत्री और सैनिक हँस पड़े। राजा ने आश्चर्य से पूछा - क्या सच में तुम यह कर सकते हो? आरव ने शांत स्वर में कहा, “प्रयास करने की अनुमति दीजिए, परिणाम भगवान पर छोड़ दीजिए। राजा, जो अपने घोड़े से बेहद प्रेम करता था, यह सोचकर उत्साहित हो गया कि...

संस्कार की जड़ें

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  संस्कार की जड़ें      संस्कार ही वह वंशवृक्ष हैं, जिनकी जड़ों से पीढ़ियाँ पुष्पित-पल्लवित होती हैं। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पडा है,समय साक्षी है। एक और प्रसंग इसकी पुष्टि करता है। पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के समय एक गाँव में गाय के दोनों सींग एक दीवार में फँस गये। लोग इकट्ठे हुए, कोई उपाय नहीं सूझा। सभी अपने अपने सुझाव दे रहे थे। तभी एक युवक बोला - सींग काट दो, गाय छूट जाएगी। सब स्तब्ध रह गए! क्या यह समाधान है? अंततः मकान मालिक ने सोचा कि दीवार गिरा देते है, इससे गाय को बचा लेंगे और फ़िर ऐसा ही हुआ। घटना जब महाराज तक पहुँची, उन्होंने उस युवक को बुलाया। तू कौन है जिसने गाय के सींग काटने की बात कही? उसने अपना नाम बताया निहाल चंद पुत्र मानक चंद.. पर महाराजा को इसमें संदेह हुआ कि एक हिन्दू ऐसा कभी नहीं सोच सकता। जब जांच हुई, तो पता चला कि उसकी माँ ने एक मुस्लिम चरवाहे से संबंध बनाए थे और यही युवक उसका पुत्र था। राजा ने कहा - अब समझ आया। जिसके संस्कार की जड़ें इस मिट्टी में नहीं, उसकी सोच भी ऐसी ही होगी। घटना एक ही सत्य का उद्घोष करती हैं - संस्कार रक्त में नहीं, विचार मे...

जीवन में संतुलन

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  जीवन में संतुलन अंग्रेजी में कहावत है, 'Balance is bliss. जीवन आनंदमय तभी हो सकता है, जब जीवन के विभिन्न पहलुओं में संतुलन करते हुए चलें। निम्नलिखित दृष्टांत के द्वारा इस बात को समझा जा सकता है। महात्मा बुद्ध के एक शिष्य थे - ’आनंद’। उन्होंने दीक्षा ग्रहण करते ही उग्र तपस्या शुरू कर दी। तपस्या में इतना लीन रहने लगे कि कुछ ही दिनों में उनका तन सूख कर कांटा सा हो गया। एक दिन अचानक महात्मा बुद्ध की नजर उनकी कृश काया पर पड़ी। बुद्ध ने आनंद को बुला कर कहा - “वत्स! तुम पहले बहुत अच्छी वीणा बजाते थे, आज मुझे वीणा पर एक राग सुनाइए।“  आनंद बोले - भंते! यह कैसे बजेगी? इसके तो सभी तार ढीले पड़े हुए हैं।  बुद्ध ने कहा - “लाओ, आनंद! मैं तारों को कस देता हूं, फिर तुम बजाना।“ जब दोबारा वीणा आनंद के हाथों में आई, तो आनंद उलझन में पड़ गए। बोले - भन्ते! अब भी यह नहीं बजेगी क्योंकि इसकी तारें बहुत ज्यादा कसी हुई हैं। बजाने का प्रयास करूंगा तो इसके तार टूट जाएंगे।  बुद्ध ने कहा - अच्छा! तुम स्वयं इसे ठीक कर लो, फिर बजाओ।  आनंद ने तार ठीक किये और वीणा बजाई। वादन क्रिया समाप्त होने पर...

व्यर्थ की चिंता

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 व्यर्थ की चिंता  एक व्यक्ति बहुत दिनों से तनावग्रस्त चल रहा था, जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा क्रोध में रहने लगा था। वह सदैव इस बात से परेशान रहता था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी न किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ रोज आना जाना लगा ही रहता है, उसे बहुत ज्यादा ख़र्च करना पड़ता है आदि  आदि। इन्ही बातों को सोच सोच कर वह अक़्सर बहुत परेशान रहता था, अपने बच्चों को भी अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी अधिकतर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा होता रहता था। इसी प्रकार समय बीतता गया। एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला...... पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, प्लीज। वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था, इसलिए उसने बेटे को जोर से डांट कर भगा दिया, लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका क्रोध शांत हुआ, तो वह बेटे के पास गया। उसने देखा कि बेटा गहरी नींद में सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने धीरे से जब कॉपी लेकर जैसे ही नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी। होमवर्क का टाइटल था.....वे चीजें जो हमें शुर...

सच्चा जीवन

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  सच्चा जीवन एक पति-पत्नी में झगड़ा हो गया। रात के खाने के बाद पति और बच्चे सोने चले गए, लेकिन पत्नी यह सोचकर घर से बाहर चली गई कि अब वह अपने पति के साथ नहीं रह सकती। जब वह अपने पड़ोस की गलियों से गुजर रही थी, तो उसने एक घर से आती हुई आवाज सुनी।  एक महिला अपने बच्चे के लिए रोटी के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही थी। थोड़ी दूर आगे जाकर उसने एक और महिला को भगवान से प्रार्थना करते सुना कि वह उसके बेटे को हर कठिनाई से बचाए। दूसरे घर से एक आदमी की आवाज आई जो अपनी पत्नी से कह रहा था कि वह अपने मकान मालिक से कुछ दिन और मोहलत मांग ले तथा हाथ जोड़कर विनती करे कि वह उन्हें रोज परेशान करना बंद कर दे। आगे बढ़ने पर उसने एक बुजुर्ग दादी को अपने पोते से यह कहते सुना, “तुम्हें मेरे लिए दवा लाए हुए बहुत दिन हो गए।” पोते ने रोटी खाते हुए कहा, “दादी, अब तो मेडिकल स्टोर वाला भी उधार देने से मना कर रहा है और मेरे पास आपकी दवा खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं।” थोड़ी दूर आगे जाकर उसने एक और औरत को अपने भूखे बच्चों से कहते सुना, “आज तुम्हारे पापा तुम्हारे लिए ज़रूर कुछ खाने को लाएँगे। तब तक तुम सो जाओ। जब तुम्हार...

भक्त नामदेव जी की श्रद्धा भक्ति

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  भक्त नामदेव जी की श्रद्धा भक्ति संत नामदेव जी“ बचपन में अपने ननिहाल में रहते थे। इनके नाना जी का नाम बामदेव था, जो ठाकुर जी के परम वैष्णो भक्त संत थे। बचपन में नामदेव जी काठ के खिलौनों एवं मिट्टी के खिलौनों से खेला करते थे लेकिन इनका खेल साधारण बच्चों की तरह नहीं था। श्री नामदेव जी उन खिलौनों के साथ में, जिस प्रकार से कोई भक्त पूजा करता है, भगवान को नहलाता है, उनका ध्यान करता है, आसन देता है और फिर उनका भोग लगाता है, इसी प्रकार से यह खेला करते थे और अपने नाना जी को देखते थे कि नाना जी जो ठाकुर जी को दूध का भोग लगाते थे, वही दूध संत नामदेव जी को प्रसाद रूप में मिलता था। नामदेव जी अपने नाना की भक्ति देखकर बचपन से ही बार बार नाना जी से कहते थे कि नाना जी भगवान की सेवा मुझे दे दीजिए! नाना जी कहते थे - ठीक है। थोड़ा बड़ा हो जाएगा तो दे दूंगा। इस प्रकार से कुछ दिन बीते, तो एक दिन फिर नामदेव जी अपने नाना से अड़ गए और कहने लगे - नाना जी! अब तो मुझे ठाकुर जी की सेवा दे दीजिए! इस बात पर नाना जी ने कहा - नामदेव! कुछ दिन बाद मुझे तीन दिन के लिए किसी गांव में किसी काम से मुझे जाना है। तुम उन तीन...

समय सूचकता

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  समय सूचकता एक बार एक शिकारी जंगल में शिकार करने के लिए गया। बहुत प्रयास करने के बाद उसने जाल में एक बाज पकड़ लिया। शिकारी जब बाज को लेकर जाने लगा तब रास्ते में बाज ने शिकारी से कहा, “तुम मुझे लेकर क्यों जा रहे हो?”  शिकारी बोला, “मैं तुम्हें मारकर खाने के लिए ले जा रहा हूँ।”  बाज ने सोचा कि अब तो मेरी मृत्यु निश्चित है। वह कुछ देर यूँ ही शांत रहा और फिर कुछ सोचकर बोला, “देखो, मुझे जितना जीवन जीना था मैंने जी लिया और अब मेरा मरना निश्चित है, लेकिन मरने से पहले मेरी एक आखिरी इच्छा है।”  “बताओ अपनी इच्छा?”, शिकारी ने उत्सुकता से पूछा। बाज ने बताना शुरू किया- मरने से पहले मैं तुम्हें दो सीख देना चाहता हूँ, इसे तुम ध्यान से सुनना और सदा याद रखना।  पहली सीख तो यह कि किसी की बातों का बिना प्रमाण, बिना सोचे-समझे विश्वास मत करना और दूसरी यह कि यदि तुम्हारे साथ कुछ बुरा हो या तुम्हारे हाथ से कुछ छूट जाए तो उसके लिए कभी दुःखी मत होना। शिकारी ने बाज की बात सुनी और अपने रास्ते आगे बढ़ने लगा।  कुछ समय बाद बाज ने शिकारी से कहा- “शिकारी, एक बात बताओ.....। अगर मैं तुम्हें क...

तीन छन्नी

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  तीन छन्नी एक बार चाणक्य का एक परिचित उनसे मिलने आया और बोला - क्या तुम जानते हो कि “मैंने तुम्हारे मित्र के बारे में क्या सुना है?“ चाणक्य ने उसे टोकते हुए कहा - “एक मिनट रुको। इसके पहले कि तुम मुझे मेरे मित्र के बारे में कुछ बताओ, उसके पहले मैं तीन छन्नी परीक्षण करना चाहता हूं। मित्र ने कहा, “तीन छन्नी परीक्षण?“ चाणक्य ने कहा - “जी हां! मैं इसे तीन छन्नी परीक्षण इसलिए कहता हूं क्योंकि जो भी बात आप मुझसे कहेंगे, उसे तीन छन्नी से गुजारने के बाद ही कहें। पहली छन्नी है “सत्य “।  क्या आप यह विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि जो बात आप मुझसे कहने जा रहे हैं, वह पूर्ण सत्य है?“ “व्यक्ति ने उत्तर दिया - “जी नहीं, दरअसल वह बात मैंने अभी-अभी सुनी है।“ चाणक्य बोले - “तो तुम्हें इस बारे में ठीक से कुछ नहीं पता है। आओ अब दूसरी छन्नी लगाकर देखते हैं। दूसरी छन्नी है “भलाई “। क्या तुम मुझसे मेरे मित्र के बारे में कोई अच्छी बात कहने जा रहे हो?“ “जी नहीं, बल्कि मैं तो...... “ “तो तुम मुझे कोई बुरी बात बताने जा रहे थे लेकिन तुम्हें यह भी नहीं मालूम है कि यह बात सत्य है या नहीं।“- चाणक्य बोले - “तुम...

धरती का रस

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  धरती का रस  एक राजा था। एक बार वह सैर करने के लिए अपने नगर से बाहर गया। लौटते समय देर हो गई, तो वह किसान के खेत में विश्राम करने के लिए ठहर गया। किसान की बूढ़ी मां खेत में मौजूद थी। राजा को प्यास लगी तो उसने बुढ़िया से कहा - माई, प्यास लगी है, थोड़ा सा पानी दे दो । बुढ़िया ने सोचा - एक पथिक अपने घर आया है चिलचिलाती धूप का समय है। इसे सादा पानी क्या पिलाऊंगी! यह सोचकर उसने अपने खेत में से एक गन्ना तोड़ लिया और उसे निचोड़ कर एक गिलास रस निकाल कर राजा के हाथ में दे दिया। राजा गन्ने का वह मीठा और शीतल रस पीकर तृप्त हो गया। उसने बुढ़िया से पूछा - माई! राजा तुमसे इस खेत का लगान क्या लेता है ? बुढ़िया बोली - इस देश का राजा बड़ा दयालु है। बहुत थोड़ा लगान लेता है। मेरे पास बीस बीघा खेत है। उसका साल में एक रुपया लेता है।  राजा के मन में लोभ आया। उसने सोचा कि 20 बीघा के खेत का लगान एक रुपया ही क्यों हो! उसने मन में तय किया कि नगर पहुंच कर इस बारे में मंत्री से सलाह करके गन्ने के खेतों का लगान बढ़ाना चाहिए। यह विचार करते-करते उसकी आंख लग गई। कुछ देर बाद वह उठा, तो उसने बुढ़िया माई से फिर गन्ने...

मन का दर्पण

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 मन का दर्पण  शहर के प्रतिष्ठित विद्यालय में अध्यापक थे राजीव सर। पढ़ाने में निपुण वक्ता शानदार और हर छात्र के प्रिय। पर उनके भीतर एक अदृश्य जाल था अमर्ष (आवेश या असहिष्णुता) का। उन्हें बुरा लगता अगर किसी ने उनके विचारों पर सवाल उठाया। उन्हें खिन्नता होती अगर कोई उनकी प्रशंसा न करे। धीरे धीरे उनका सम्मान पाने का आग्रह ही उनका सबसे बड़ा बोझ बन गया। एक दिन विद्यालय में नए शिक्षक विवेक की नियुक्ति हुई। विवेक शांत, सरल और सदा मुस्कुराने वाले व्यक्ति थे। वे छात्रों के साथ सहजता से घुल मिल जाते। धीरे-धीरे विद्यार्थी उन्हें भी पसंद करने लगे। राजीव सर के मन में खटास भरने लगी। इतनी जल्दी कैसे सबका प्रिय बन गया यह? सालों से मैं यहाँ हूँ, किसी ने मेरे लिए ऐसा नहीं कहा! उनके मन का अहंकार तिलमिलाया। अगले हफ्ते विद्यालय में एक कार्यक्रम था श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान समारोह। राजीव सर को पूरा विश्वास था कि यह पुरस्कार उन्हें ही मिलेगा। लेकिन मंच पर नाम पुकारा गया श्री विवेक शर्मा। तालियाँ बजीं, और राजीव सर के भीतर अमर्ष का ज्वालामुखी फूट पड़ा। चेहरे पर मुस्कान थी, पर भीतर जलन की आग थी। कार्यक्रम के ब...

किसान और नाग

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  किसान और नाग  गरीब ब्राह्मण अपने खेत में बहुत मेहनत करता था। एक दिन वह थककर एक पेड़़ के नीचे आराम कर रहा था। तभी उसे एक बिल के अंदर से एक नाग निकलता दिखाई दिया। ब्राह्मण ने सोचा, “मुझे इस नाग की रोज पूजा करनी चाहिए। इसकी कृपा से शायद मेरे खेतों में अच्छी फसल होने लगे।” उस शाम उसने उस नाग को दूध अर्पित किया और कहा, “खेतों के रक्षक, मैं आपको यह दूध अर्पित कर रहा हूं। कृपया आप मुझ पर अपनी कृपा रखें।” अगली सुबह जब ब्राह्मण आया तो उसने दूध के कटोरे में एक सोने का सिक्का पाया। ब्राह्मण रोज नाग को दूध चढ़ाता था और नाग कटोरे में एक सोने का सिक्का छोड़ जाता। जल्द ही वह ब्राह्मण अमीर हो गया। एक दिन ब्राह्मण को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। उसने अपने बेटे से नाग को दूध अर्पित करने को कहा। लड़के ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। अगले दिन जब बेटा बिल के पास गया तो उसे सोने का सिक्का मिला। लड़के ने सोचा, “इस बिल के अंदर जरूर बहुत सारे सोने के सिक्के होंगे। क्यों न मैं नाग को मारकर सारे सोने के सिक्के निकाल लूं।” उस शाम को उसने सांप को लाठी से मारने की कोशिश की। नाग को गुस्सा आ गया और उस...

भक्त का प्यार

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  भक्त का प्यार एक बार गुरुजी सत्संग करके आ रहे थे। रास्ते में गुरुजी का मन चाय पीने को हुआ।  उन्होंने अपने ड्राइवर को कहा - भैया! हमें चाय पीनी है। ड्राइवर ने गाड़ी 5 स्टार होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरुजी ने कहा - नहीं, आगे चलो, यहाँ नहीं। फिर ड्राइवर ने गाड़ी किसी होटल के आगे खड़ी कर दी। गुरूजी ने वहां भी मना कर दिया। काफी आगे जाकर एक छोटी सी ढाबे जैसी दुकान आई। गुरूजी ने कहा - यहाँ रोक दो। यहाँ पर पीते हैं चाय। ड्राइवर सोचने लगा कि अच्छे से अच्छे होटल को छोड़ कर गुरुजी ऐसी जगह चाय पीएंगे। खैर वह कुछ नहीं बोला। ड्राइवर चाय वाले के पास गया और बोला - भैया! एक अच्छी-सी चाय बना दो। जब दुकानदार ने पैसों वाला गल्ला खोला तो उसमे गुरुजी का स्वरूप फोटो लगा हुआ था। गुरुजी का स्वरूप देख कर ड्राइवर ने दुकानदार से पूछा - तुम इन्हें जानते हो, कभी देखा है इन्हें? तो दुकानदार ने कहा - मैंने इनके दर्शन के लिए जाने के लिए पैसे इकट्ठे किये थे। लेकिन वे चोरी हो गए और मैं नहीं जा पाया। पर मुझे यकीन है कि गुरुजी मुझे यहीं आ कर मिलेंगे।  अब तो ड्राइवर का मन गुरुजी के प्रति श्रद्धा से भर गया। उसने त...

तुम्हारा परिचय क्या है

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  तुम्हारा परिचय क्या है एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था। यहाँ वह एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ। उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :- स्वामी! एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं। कोई उत्तर नहीं मिलता। क्या आप मुझे उत्तर देंगे ? स्वामी ने कहा :- निश्चित दूंगा। आज तुम खाली नहीं लौटोगे, पूछो। उस राजा ने कहा :- मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं। ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना। मैं सीधा मिलना चाहता हूं। उस संन्यासी ने कहा :- अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर? राजा ने कहा : - माफ़ करिए, शायद आप समझे नहीं. मैं परम पिता परमात्मा की बात कर रहा हूं, आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं। जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो? उस संन्यासी ने कहा :- महानुभाव! भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं. अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं, सीधा जवाब दें। बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया, तो मिल लो। राजा ने हिम्मत की, उसने कहा :- अच्छा! मैं अभी मिलना ...