मेरा कर्म ही मेरा भाग्य

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मेरा कर्म ही मेरा भाग्य

Image by AdamsPics from Pixabay

महात्मा बुद्ध के एक परमभक्त की मृत्यु होने पर भक्त के पुत्र ने सोचा कि अंत्येष्टि के बाद होने वाला मंत्र जाप किसी आम पंडित से न करवाकर महात्मा बुद्ध से ही करवाया जाए ताकि पिता का स्वर्ग जाना सुनिश्चित हो जाए। पुत्र ने महात्मा बुद्ध से इसके लिए निवेदन किया।

महात्मा बुद्ध सुनकर मुस्कुराए और बोले - आप एक पत्तल के एक दोने में पत्थर के टुकड़े और एक में मखाने भर कर ले आओ। वह प्रसन्न होकर दोनों वस्तुएं ले आया। बुद्ध बोले - अब नदी किनारे जा कर इस मंत्र का उच्चारण करने के बाद इन दोनों को बहा दो। परिणाम आकर मुझे बताना।

व्यक्ति ने वैसा ही किया। फिर आकर महात्मा जी को बताया कि पत्थर वाला दोना तो नदी में तुरंत डूब गया परंतु मखाने वाला तैरता-तैरता आगे निकल गया। महात्मा बुद्ध ने उसे सुझाव दिया कि अपने मंत्रवादी पंडित को भी वहां ले जाकर उनसे मंत्र पढ़वा लो। अगर पत्थर वाला दोना ऊपर आ जाए और मखाने वाला डूब जाए तो आकर मुझे बता देना।

कुछ समय बाद उस व्यक्ति ने बताया कि मैंने आपके कहे अनुसार किया पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मखाने वाला दोना तैरता ही रहा और पत्थर वाला वापस ऊपर नहीं आया।

तब उसे समझाते हुए बुद्ध ने कहा कि व्यक्ति अपने जीवन में जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, वैसे ही उसके कर्म-बंधन बन जाते हैं। अच्छे कर्म मखानों की तरह हल्के होते हैं और व्यक्ति को भावी जीवन के लिए तार देते हैं यानी डुबोते नहीं। घटिया व फरेब के कर्म, कंकर की तरह भारी होते हैं जो उसे पुनः इस भवसागर में डुबो देते हैं। अतः अब पिता की मृत्यु के बाद चाहे कितने ही ब्रह्म जाप करो या मंत्र पाठ कराओ, कोई असर नहीं होगा। आपके पिता ने अपने जीवनकाल में जैसे भी बढ़िया व घटिया कर्म किए होंगे, उनके अनुरूप ही उनके भावी जीवन की गति होगी।

इस दृष्टांत का यही संदेश है कि मनुष्य को हमेशा अच्छे व प्रभु-प्रिय कर्म करने चाहिएं, ताकि मृत्यु के बाद उसकी सद्गति निश्चित हो जाए। इसमें अन्य कोई भी महात्मा, मंत्रवेत्ता या पंडित सहयोगी नहीं हो सकता।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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