हमारा सच्चा साथी
हमारा सच्चा साथी
तो महात्मा जी ने कहा - पूर्व दिशा में जाना और तब तक चलते रहना, जब तक तुम्हारी तलाश पूरी न हो जाये। और हाँ! तुम्हें ऐसा साथी अवश्य मिलेगा, जो तुम्हारा साथ कभी नही छोडे़गा, बशर्ते कि तुम उसका साथ न छोड़ो! श्रीधर ने कहा - बस! एक बार वह मुझे मिल जाये, तो फिर मैं उसका साथ कभी न छोडूंगा। पर हे देव! मेरी तलाश तो पूरी होगी न!
महात्माजी ने कहा - हे वत्स! यदि तुम सच्चे दिल से उसे पाना चाहते हो तो वह बहुत सुलभता से तुम्हें मिल जायेगा, लेकिन है वह बहुत दुर्लभ!
फिर उसने महात्मा जी को प्रणाम किया, आशीर्वाद लिया और चल पड़ा अपनी राह पर! सबसे पहले उसे एक व्यक्ति मिला जो शक्तिशाली घोड़े को काबू में कर रहा था। तो उसने सोचा कि यही है वह। जैसै ही वह उसके पास जाने लगा, तो उस व्यक्ति ने एक सैनिक को प्रणाम किया और उसे घोड़ा देकर चला गया।
श्रीधर ने सोचा कि यह सैनिक ही है वह सच्चा साथी.. तो वह मित्रता के लिये आगे बढ़ा। पर इतने मे सेनापति आ गया। सैनिक ने प्रणाम किया और घोड़ा आगे किया। सेनापति घोड़ा लेकर चला गया। श्रीधर भी खूब दौड़ा और अन्ततः वह सेनापति तक जा पहुँचा। पर सेनापति ने राजा जी को प्रणाम किया और उन्हें घोड़ा देकर चला गया। तब श्रीधर ने राजा को मित्रता के लिये चुना और उसने मित्रता करनी चाही। पर राजा घोड़े पर बैठकर शिकार के लिये वन को निकल पड़े। श्रीधर भी भागा और घनघोर जंगल में पहुँच गया, पर राजा कहीं न दिखे!
प्यास से उसका गला सूख रहा था। थोड़ी दूर गया तो एक नदी बह रही थी। वह पानी पीकर आया और एक वृक्ष की छाँव में गया, तो वहाँ एक राहगीर जमीन पर सोया था और उसके मुख से राम राम की ध्वनि सुनाई दे रही थी। एक काला नाग उस राहगीर के चारों ओर चक्कर लगा रहा था। श्रीधर ने बहुत देर तक उस दृश्य को देखा और फिर तभी वृक्ष की एक डाल टूटकर नीचे गिरी, तो साँप वहाँ से चला गया और इतने में उस राहगीर की नींद टूट गई और वह उठा और राम राम का सुमिरन करते हुये अपनी राह पर चला गया!
श्रीधर पुनः महात्मा जी के आश्रम पहुँचा और सारा किस्सा कह सुनाया और उनसे पूछा - हे नाथ! मुझे तो बस इतना बताओ कि वह काला नाग उस राहगीर के चारों ओर चक्कर काट रहा था, पर वह उस राहगीर को डस क्यों नहीं पा रहा था? लगता है कि देव की कोई अदृश्य सत्ता उसकी रक्षा कर रही थी! महात्मा जी ने कहा - उसका सबसे सच्चा साथी ही उसकी रक्षा कर रहा था, जो उसके साथ था। तो श्रीधर ने कहा - वहाँ तो कोई भी नहीं था, देव! बस संयोग वश हवा चली, वृक्ष से एक डाली टूटकर नाग के पास गिरी और नाग चला गया!
महात्माजी ने कहा - नहीं, वत्स! उसका जो सबसे अहम साथी था, वही उसकी रक्षा कर रहा । जो दिखाई तो नहीं दे रहा था, पर हर पल उसे बचा रहा था और उस साथी का नाम है ‘धर्म’। वत्स! धर्म से समर्थ और सच्चा साथी जगत में और कोई नहीं है। केवल एक धर्म ही है, जो सोने के बाद भी तुम्हारी रक्षा करता है और मरने के बाद भी तुम्हारा साथ देता है!
हे वत्स! पाप का कोई रखवाला नहीं हो सकता और धर्म कभी असहाय नहीं है। महाभारत के युद्ध मंे भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों का साथ केवल इसीलिये दिया था क्योंकि धर्म उनके पक्ष में था! हे वत्स! तुम भी केवल धर्म को ही अपना सच्चा साथी मानना और इसे मजबूत बनाना क्योंकि यदि धर्म तुम्हारे पक्ष में है, तो स्वयं नारायण और सद्गुरु तुम्हारे साथ हैं। नहीं तो एक दिन तुम्हारे साथ कोई न होगा और कोई तुम्हारा साथ न देगा। और यदि धर्म मजबूत है तो वह तुम्हें बचा लेगा। इसलिये धर्म को मजबूत बनाओ।
और धर्म को मजबूत करने के लिए दान पुण्य कर्म करो। माता-पिता की सेवा, संतो की सेवा, गौमाता की सेवा, किसी असहाय की सेवा, सहायता, अच्छा व्यवहार, अच्छा आचरण; ये ही सब कर्म धर्म को मजबूत करते हैं। हे वत्स! एक बात सदैव याद रखना कि इस संसार में समय बदलने पर अच्छे से अच्छे साथ छोड़कर चले जाते हैं। केवल एक धर्म ही है जो घनघोर बीहड़ और गहरे अन्धकार में भी तुम्हारा साथ नही छोडेगा। कदाचित् तुम्हारी परछाई भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, परन्तु धर्म तुम्हारा साथ कभी नही छोडेगा। बशर्ते कि तुम उसका साथ न छोड़ो। इसलिये धर्म को मजबूत बनाना, क्योंकि केवल यही है हमारा सच्चा साथी।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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