अपनी पहचान
अपनी पहचान
एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत लौटा। वह एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ। उस रियासत के राजा को जब पता चला तो वे उनसे भेंट करने गए और बोले - हे महात्मन्! एक प्रश्न 20 वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं। कभी खुद से तो कभी दूसरों से। लेकिन अब तक कोई सतुष्ट कर देने वाला उत्तर नहीं मिला। क्या आप मुझे उत्तर देंगे?
महात्मा ने कहा - निश्चित रूप से दूंगा, राजन्! आप पूछिए तो सही, क्या पूछना है? आज आप खाली हाथ नहीं लौटेंगे।
इस पर राजा ने कहा - मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं और हाँ! अब आप भी मुझे अन्य लोगों की तरह ईश्वर के बारे में समझाने का प्रयास मत करना। मैं बस अब सीधा ईश्वर से मिलना चाहता हूं।
सन्यासी ने कहा - अभी मिलना चाहते हो या थोड़ी देर ठहर कर!
“माफ करिये, महात्मन्! शायद आप भूल कर रहे हैं। मैं परमपिता परमात्मा से मिलवाने की बात कर रहा हूं. न की किसी ईश्वर नाम के व्यक्ति विशेष से।”
संन्यासी मुस्कराए और बोले - “महानुभाव! भूलने की तो कोई गुंजाईश ही नहीं है। मैं तो 24 घंटे ईश्वर से मिलाने का ही काम करता हूं। अभी मिलोगे या थोड़ी देर ठहर कर। सीधे जबाब दो।”
राजा कुछ क्षण टकटकी लगाए कृतज्ञता भरे भावों से संन्यासी की ओर देखता रहा। फिर हिम्मत करके बोला कि मैं अभी मिलना चाहता हूं। आप मुझे अभी मिलवा दीजिये। मैं आपका ये आभार जिंदगी भर नहीं भूलूंगा।
संन्यासी ने कहा - एक छोटे से कागज पर अपना नाम और पता लिख दो ताकि मैं उसे ईश्वर के पास पंहुचा दूँ और उन्हें बता सकूँ कि उनसे कौन मिलना चाहता है।
राजा ने कागज पर लिख दिया, अपना नाम, पता, उम्र, परिचय, उपाधियाँ सब कुछ लिख दिया।
संन्यासी ने कागज पढ़ा और राजा से कहा कि ये जो सारी बातें आपने कागज पर लिखी हैं, मुझे तो झूठी मालूम पड़ रही हैं।
राजा ने कहा - मैंने तो सब सही लिखा है।
तब संन्यासी ने राजा से कहा - अगर तुम्हारा नाम बदल दिया तो क्या तुम बदल जाओगे।
राजा ने कहा - नहीं. नाम के बदलने से भला मैं कैसे बदल सकता हूं। मैं तो वही रहूँगा।
इस पर संन्यासी ने कहा कि ये बात तो तय हो गई, कि ये नाम तो तुम्हारा असली परिचय नहीं है।
अब दूसरी बात - आज तो तुम राजा हो, कल को अगर भिखारी हो जाओगे तो क्या तुम बदल जाओगे।
इस पर राजा ने कहा - नहीं, महात्मन्! मैं फिर भी वहीं रहूँगा, जो हूं।
इस पर संन्यासी ने कहा - ठीक है। अब यह बात भी तय हो गई कि आपका राज्य एवम् उपाधियाँ भी आपका परिचय नहीं हैं।
अब राजन्! रही तीसरी बात - आपकी उम्र क्या है?
राजा ने कहा - 40 वर्ष।
इस पर संन्यासी ने कहा - तो क्या 50 वर्ष के होने पर तुम कोई दूसरे इंसान में बदल जाओगे और जब 20 वर्ष के थ,े तब क्या कोई अन्य व्यक्ति थे या फिर जब नन्हे बालक थे तो क्या कोई अन्य इंसान थे.?
राजा ने कहा - नहीं, बचपन से शरीर बदला, उम्र बदली, वस्त्र बदले, उपाधियाँ बदली, लेकिन मैं तो वहीं हूं, जो बचपन मे था। जो मेरे भीतर तब था, वही आज भी है।
इस पर संन्यासी ने कहा - फिर तो राजन्! ये उम्र भी तुम्हारा परिचय नहीं है और न ही ये शरीर। फिर तुम हो कौन, राजन्? जो तुम हो उसे लिख दो, तभी तो मैं पहुंचाऊंगा भगवान के पास। वरना भगवान मुझे कहेंगे कि तुम झूठे हो, जो झूठे लोगांे का पता लेकर आ रहे हो।
राजा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले? राजा कुछ देर मौन खड़ा रहा। कुछ देर बाद राजा बोला - हे महात्मन्! ये तो बहुत बड़ी कठिनाई की बात है......। मैं तो इन्हीं सब बातों को ही अपना परिचय मानता हूं ..
इस पर संन्यासी ने कहा कि हाँ राजन्! ये तो कठिनाई की बात है। जिसका मैं परिचय न दे सकूं, बता ना सकूँ कि कौन मिलना चाहता है, तो भगवान भी कहेंगे कि मुझे आखिर किससे मिलाने लें जा रहे हो। जाओ राजन्! पहले उसे खोज लो। जो तुम हो....। तुम्हारा असली परिचय, तुम्हारा वजूद, तुम्हारा होना.. आखिर तुम धरती पर हो तो किस मकसद से हो.. और ये बात कहे देता हूं राजन्! जिस दिन तुम ये जान लोगे कि तुम कौन हो, उस दिन तुम भगवान को खोजने नहीं आओगे.... क्योंकि भगवान को खोजना ही तो ये जानना है कि मैं क्या हूँ और परमेश्वर क्या है। हमारी आत्मा ही भगवान का दूसरा रूप है।
कितनी प्यारी पंक्तिया हैं। ध्यान से पढ़ना -
"मैं अपनी इबादत खुद ही कर लू. क्या बुरा है?"
किसी फकीर ने कहा है कि हर इंसान में रब बसता है।
इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि ईश्वर हर इंसान में है, हर स्थान पर है। आप कहीं भी रहो, जो बात दिल से ईश्वर को कहोगे तो वह आवाज़ उन तक जरूर पहुंचेगी।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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