खत्म कर दिए हैं मैंने

 खत्म कर दिए हैं मैंने

वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से

खत्म कर दिए हैं मैंने गिले-शिकवे सफाईयों के सिलसिले,

तुम भी थक गए होंगे हमें बुरा समझते समझते.

जो तुमने समझा वो हम थे ही नहीं,

जो हम थे वो तुमने समझा ही नहीं.


जायज है गिला तुम्हारा, क्या किया है हमारे लिए,

जो कुछ भी तुम्हारे पास है, हमने तो कुछ दिया ही नहीं

जो हम से बन पड़ा, तुम से तो कुछ लिया ही नहीं.

जो भी किया हमने, वो हमारा फर्ज था,


अहसान नहीं किसी पर, हम पे तुम्हारा कर्ज था.

अब मेरी तुम्हारी कोई अनबन या उलझन नहीं,

मैं इतना आगे निकल और थक चुका हूँ सुधार रहा हूँ,

तुम्हारे साथ चल नहीं सकता अब मेरा वो मन नहीं.


माफ तो वो तुम्हें कर गई, तुम्हारी सेवा पर कुर्बान थी,

मगर मैं विश्वास कर नहीं सकता, तुम्हारी कोई जुबान नहीं.

तुम सब खुश रहो आबाद रहो मेरे प्यारों,

मुझे अब किसी से भी कुछ भी चाहिए ही नहीं

और दरकार भी नहीं.

(वेद गावड़ी)

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद

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