माॅं और छुट्टी
माॅं और छुट्टी?
पता नहीं आज बेटे ने कौन सी शरारत कर दी 🤔
प्रिंसिपल ने अचानक एक माँ को स्कूल बुलाकर कहा— "आपके बेटे ने आज 'अगर मेरी माँ एक दिन के लिए छुट्टी पर चली जाए' विषय पर ऐसा निबंध लिखा है कि पूरी स्टाफ रूम में सन्नाटा छा गया। पहले सब हँस रहे थे... फिर सब रोने लगे।"
माँ घबराकर कुर्सी पर बैठ गई। उसे लगा, पता नहीं बेटे ने कौन-सी शरारत कर दी होगी।
प्रिंसिपल ने मुस्कुराते हुए कॉपी उसकी ओर बढ़ाई और कहा, "इसे घर जाकर मत पढ़िए... यहीं पढ़ लीजिए।"
कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा था—
"अगर मेरी माँ एक दिन के लिए छुट्टी पर चली जाए..."
"पहले मुझे लगता था कि मेरी माँ दुनिया की सबसे गुस्सैल औरत है। सुबह पाँच बजे उठाकर पढ़ाई कराती है। टिफिन पूरा खत्म नहीं करूँ तो डाँटती है। देर तक मोबाइल चलाऊँ तो छीन लेती है। छुट्टी के दिन भी कहती है— कमरा साफ़ करो।
मुझे लगता था कि काश... मेरी माँ एक दिन के लिए कहीं चली जाए।
फिर पिछले सोमवार मेरी माँ बीमार पड़ गई। डॉक्टर ने उन्हें पूरा आराम करने को कहा। उस दिन पहली बार मेरी माँ सचमुच बिस्तर से नहीं उठी।
सुबह अलार्म तो बजा... लेकिन किसी ने मेरे बाल सहलाकर नहीं कहा— "बेटा, स्कूल नहीं जाना क्या?" मैं देर से उठा। यूनिफॉर्म प्रेस नहीं थी। मोज़े एक कमरे में थे, जूते दूसरे कमरे में। टिफिन खाली पड़ा था।
पापा रसोई में खड़े थे। उन्होंने पहली बार रोटी बनाने की कोशिश की। रोटी गोल नहीं बनी... भारत का नक्शा बन गई।
मैंने पहली बार देखा कि माँ एक साथ कितने काम करती हैं।
स्कूल से लौटा तो दरवाज़े पर कोई इंतज़ार नहीं कर रहा था। माँ बिस्तर पर थीं। फिर भी मुस्कुराकर बोलीं— "आ गया मेरा राजा बेटा?"
मैंने कहा— "माँ, भूख लगी है।"
उन्होंने उठने की कोशिश की।
लेकिन दर्द से कराहकर फिर लेट गईं। उस दिन पहली बार मैंने अपने लिए खुद खाना निकाला। खाना ठंडा था... लेकिन उससे ज़्यादा ठंडा घर लग रहा था।
रात को मैंने देखा कि माँ को तेज़ बुखार था। फिर भी वह पापा से पूछ रही थीं—
"बेटे ने दूध पी लिया?"
"होमवर्क कर लिया?"
"कल उसकी ड्राइंग कॉपी रखना मत भूलना।"
उन्हें अपनी दवाई से ज़्यादा मेरी चिंता थी।
अगले दिन मैंने माँ का मोबाइल उठाया। मुझे लगा होगा कि इसमें गेम होंगे। लेकिन उसमें सबसे ज़्यादा फोटो मेरी थीं।
पहली बार स्कूल गया था... मेरी फोटो।
पहली बार साइकिल चलाई थी... मेरी फोटो।
जब मुझे बुखार आया था... मेरी फोटो।
माँ के मोबाइल में उनकी खुद की एक भी अच्छी तस्वीर नहीं थी।
जितनी तस्वीरें थीं... सब मेरी थीं।
उस दिन मुझे समझ आया कि शायद माँ अपनी ज़िंदगी नहीं जीतीं... वो तो हमारी ज़िंदगी जीती हैं।
तीसरे दिन मैंने माँ के पैर दबाए।
उन्होंने मुस्कुराकर पूछा— "आज सूरज पश्चिम से निकला क्या?"
मैं हँस तो दिया... लेकिन मेरी आँखों में आँसू थे।
मुझे याद आया... मैंने कितनी बार उन्हें कहा था— "आपको कुछ नहीं आता... आप हर समय डाँटती रहती हो।"
लेकिन सच तो यह था कि मुझे ही कुछ नहीं आता था। मुझे यह भी नहीं पता था कि मेरी स्कूल की शर्ट अलमारी में अपने आप नहीं आती... टिफिन अपने आप नहीं भरता... बिस्तर अपने आप नहीं लगता... मेरी पसंद का खाना अपने आप नहीं बनता...
इन सबके पीछे मेरी माँ की नींद, उनका समय और उनकी पूरी ज़िंदगी लगी होती है।
अब अगर भगवान मुझसे पूछें कि दुनिया का सबसे मुश्किल काम कौन-सा है...
तो मैं कहूँगा—
"माँ होना।" क्योंकि माँ छुट्टी नहीं ले सकती।
उसे बुखार हो... तब भी घर चलता है।
उसे दर्द हो... तब भी बच्चों की चिंता रहती है।
उसे रोना आए... तब भी वह मुस्कुराकर खाना परोसती है।
अब मैं भगवान से कभी यह नहीं कहूँगा कि मेरी माँ एक दिन के लिए कहीं चली जाए।
मैं तो यही कहूँगा— "भगवान... मेरी उम्र भी मेरी माँ को दे देना।"
"क्योंकि अगर माँ घर में हो... तो छोटा-सा घर भी स्वर्ग लगता है।"
निबंध यहीं समाप्त हो गया।
कॉपी पकड़ते-पकड़ते माँ के हाथ काँपने लगे। आँसू कॉपी के पन्नों पर गिरने लगे। उन्हें याद आया कि पिछले महीने बेटे ने गुस्से में कहा था— "आप सिर्फ डाँटना जानती हो।"
उस दिन वह पूरी रात रोई थीं। लेकिन आज उसी बेटे ने बिना किसी के कहे उनकी पूरी ज़िंदगी पढ़ ली थी।
प्रिंसिपल ने धीरे से कहा— "बच्चे हमारी बातें नहीं... हमारा त्याग पढ़ लेते हैं। बस उन्हें समझने में थोड़ा समय लगता है।"
माँ घर पहुँची। बेटा दरवाज़े पर दौड़कर आया। इस बार उसने कुछ नहीं कहा। बस माँ के गले लग गया।
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा। दोनों चुप थे... लेकिन उस खामोशी में हज़ार शब्द थे।
उस दिन पहली बार बेटे ने खुद अपनी प्लेट उठाई... अपने जूते खुद साफ़ किए...
और रात को सोने से पहले माँ के पास जाकर बोला— "माँ... आज से आपको छुट्टी नहीं दूँगा... लेकिन काम में अकेला भी नहीं छोड़ूँगा।"
माँ मुस्कुरा दीं।
उन्हें लगा जैसे उनकी सारी थकान उसी एक वाक्य में उतर गई।
याद रखिए...
बच्चे माँ-बाप की कीमत तब नहीं समझते जब वे उनके लिए सब कुछ कर रहे होते हैं। कीमत तब समझ आती है, जब एक दिन वही हाथ थक जाते हैं। इसलिए इंतज़ार मत कीजिए। आज ही अपनी माँ-बाप के पास बैठिए, उनका हाथ पकड़िए और इतना ज़रूर कहिए— "आप हैं, इसलिए मेरा संसार है।"
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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