मित्र की परिभाषा
मित्र की परिभाषा
भगवान बोले - उद्धव! सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति के समय बिना मांगे ही अपने मित्र की सहायता करे। उद्धव जी ने बीच मे रोकते हुए कहा - "हे कृष्ण"! अगर ऐसा ही है, तो फिर आप तो पांडवों के प्रिय बांधव थे। एक बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर विश्वास किया, किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, उसके अनुरूप मित्रता नही निभाई। आप चाहते तो पांडव जुए में जीत सकते थे। आपने धर्मराज युधिष्ठिर को जुआ खेलने से क्यों नही रोका।
ठीक है! आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन यदि आप चाहते तो अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा पासे को धर्मराज के पक्ष में भी तो कर सकते थे, लेकिन आपने भाग्य को धर्मराज के पक्ष में भी नहीं किया। आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और स्वयं को हारने के बाद भी तो रोक सकते थे। उसके बाद जब धर्मराज ने अपने भाइयों को दांव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभा कक्ष में पहुँच सकते थे। किंतु आपने ये भी नहीं किया।
इसके बाद जब दुष्ट दुर्योधन ने पांडवों को भाग्यशाली कहते हुए द्रौपदी को दांव पर लगाने हेतु प्रेरित किया और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे। लेकिन इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपनी लाज खो रही थी, तब जाकर आपने द्रोपदी के वस्त्र का चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई, किंतु ये भी आपने बहुत देरी से किया।
उसे एक पुरुष घसीट कर भरी सभा में लाता है, और इतने सारे पुरुषों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है। जब आपने संकट के समय में पांडवों की सहायता की ही नहीं की, तो आपको आपदा बांधव (सच्चा मित्र) कैसे कहा जा सकता है? क्या यही धर्म है?
भगवान श्री कृष्ण बोले - हे उद्धव! सृष्टि का नियम है कि जो विवेक से कार्य करता है, विजय उसी की होती है। उस समय दुर्योधन अपनी बुद्धि और विवेक से कार्य ले रहा था, किंतु धर्मराज ने तनिक मात्र भी अपनी बुद्धि और विवेक से काम नही लिया। इसी कारण पांडवों की हार हुई।
भगवान कहने लगे कि हे उद्धव! दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि से द्यूतक्रीडा करवाई। यही तो उसका विवेक था।
धर्मराज भी तो इसी प्रकार विवेक से कार्य लेते हुए ऐसा सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई को पासा देकर उनसे चाल चलवा सकते थे या फिर ये भी तो कह सकते थे कि उनकी तरफ से श्री कृष्ण यानी मैं खेलूंगा। जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता ? पांसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार।
चलो! इसे भी छोड़ो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इसके लिए तो उन्हें क्षमा भी किया जा सकता है, लेकिन उन्होंने विवेक हीनता से एक और बड़ी गलती तब की, जब उन्होंने मुझसे प्रार्थना की,कि मैं तब तक सभाकक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए, क्योंकि ये उनका दुर्भाग्य था कि वे मुझसे छुपकर जुआ खेलना चाहते थे। इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया। मुझे सभाकक्ष में आने की अनुमति नहीं थी इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर बहुत समय तक प्रतीक्षा कर रहा था कि मुझे कब बुलावा आता है।
पांडव जुए में इतने डूब गए कि भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए और मुझे बुलाने के स्थान पर केवल अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे। अपने भाई के आदेश पर जब दुशासन द्रोपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभाकक्ष में लाया, तब वह अपने सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही। तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा।
उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुशासन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया। जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर 'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम' की गुहार लगाते हुए मुझे पुकारा, तो में बिना बिलम्ब किये वहां पहुंचा।
हे उद्धव! इस स्थिति में तुम्हीं बताओ, मेरी गलती कहाँ रही?
उद्धव जी बोले - कृष्ण! आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई। क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ ?
कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा – इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा। क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे।
भगवान मुस्कुराये - उद्धव! सृष्टि में हर किसी का जीवन उसके स्वयं के कर्मों के प्रतिफल के आधार पर चलता है। मैं इसमें प्रत्यक्ष रूप से कोई हस्तक्षेप नही करता। मैं तो केवल एक 'साक्षी' हूँ, जो सदैव तुम्हारे साथ रहकर जो हो रहा है, उसे देखता रहता हूँ। यही ईश्वर का धर्म है।
'भगवान को ताना मारते हुए उद्धव जी बोले - "वाह! वाह! बहुत अच्छा कृष्ण। तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी कर्मों को देखते रहेंगें। हम पाप पर पाप करते जाएंगे और आप हमें रोकने के स्थान पर केवल देखते रहेंगे। आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते करते पाप की गठरी बांधते रहें और उसका फल भोगते रहें?"
भगवान बोले - उद्धव, तुम धर्म और मित्रता को समीप से समझो, जब तुम समझ कर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे साथ हर क्षण रहता हूँ, तो क्या तुम पाप कर सकोगे ?
तुम पाप कर ही नही सकोगे और अनेक बार विचार करोगे कि मुझे विधाता देख रहा है। किंतु जब तुम मुझे भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि तुम मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तुम्हें कोई देख नही रहा, तब ही तुम संकट में फंसते हो। धर्मराज का अज्ञान यह था - उसने समझा कि वह मुझ से छुपकर जुआ खेल सकता है। अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक प्राणी मात्र के साथ हर समय उपस्थित रहता हूँ तो क्या वह जुआ खेलते?
और यदि खेलते भी तो जुए के उस खेल का परिणाम कुछ और नहीं होता। भगवान के उत्तर से उद्धव जी अभिभूत हो गये और बोले - प्रभु! कितना रहस्य छुपा है आपके दर्शन में! कितना महान सत्य है ये ! पाप कर्म करते समय हम ये कदापि विचार नही करते कि परमात्मा की नज़र सब पर है। कोई उनसे छिप नही सकता और उनकी दृष्टि हमारे प्रत्येक अच्छे बुरे कर्म पर है।
परन्तु इसके विपरीत हम इसी भूल में जीते रहते हैं कि हमें कोई देख नहीं रहा। प्रार्थना और पूजा हमारा विश्वास है। जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि भगवान हर क्षण हमें देख रहे हैं, उनके बिना पत्ता तक नहीं हिलता तो परमात्मा भी हमें ऐसा ही आभास करा देते हैं की वे हमारे आस पास ही उपस्थित हैं और हमें उनकी उपस्थिति का आभास होने लगता है।
हम पाप कर्म केवल तभी करते हैं जब हम भगवान को भूलकर उनसे विमुख हो जाते हैं।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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