पारस पत्थर
पारस पत्थर
बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक किसान रहता था, जिसके पास सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन थी। किसान अब बूढ़ा हो चला था। उसका एक ही बेटा था—दिनेश। वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद किसान ने इतनी बड़ी जमीन बनाई थी, परंतु उसका बेटा मेहनत से दूर भागता था। उसे खेती-बाड़ी में बिल्कुल रुचि नहीं थी। वह चाहता था कि बिना मेहनत किए जल्द से जल्द बहुत अमीर बन जाए।
इसी बीच एक दिन किसान की मृत्यु हो गई। अब सारी ज़मीन की जिम्मेदारी दिनेश पर आ गई। पर दिनेश के मन में केवल एक ही लालच घर कर चुका था—किसी भी तरह पारस पत्थर प्राप्त कर लेना। लोगों से उसने सुना था कि पारस पत्थर को किसी भी धातु से स्पर्श करा दो, वह सोना बन जाती है। यह सुनकर दिनेश की आँखों में सपनों की चमक भर गई।
दिनेश पारस पत्थर की खोज में यहाँ–वहाँ भटकने लगा। उसने कई लोगों से पूछा, कई जगह गया, लेकिन पत्थर कहीं नहीं मिला। उसकी बेचैनी देखकर आसपास के ठगों की आँखों में चमक आ गई। वे दिनेश को नकली पारस पत्थर दिखाकर उससे लाखों रुपये ठग ले गए।
ठगों के बाद दिनेश ढोंगी बाबाओं के चक्कर में फँस गया। वे भी उसे लालच देकर उसका खूब पैसा ऐंठते रहे। पारस पत्थर के लालच में दिनेश इतना खो गया कि उसे अपनी कई एकड़ जमीन तक बेचनी पड़ी। उसकी पत्नी हमेशा समझाती—
“दिनेश, मेहनत से बड़ा कोई पारस पत्थर नहीं होता। हमारी जमीन ही सबसे बड़ा खजाना है। मेहनत करोगे तो सब कुछ मिल जाएगा।”
लेकिन दिनेश सुनने को तैयार ही नहीं था।
एक दिन गाँव में एक अत्यंत पहुंचे हुए संत आए। गाँव के लोग अपनी समस्याएँ लेकर उनके पास जा रहे थे। दिनेश भी अपनी पत्नी के साथ पहुँचा और संत को अपनी पूरी कहानी बता दी। संत उसकी बातें सुनकर मुस्कुराए और बोले—
“बेटा, यदि तुम मेरी बताई बात बिना किसी छल के करोगे, तो तुम्हें पारस पत्थर अवश्य मिलेगा।”
दिनेश खुशी से बोला—“महाराज, कृपया मार्ग बताइए!”
संत बोले—
“तुम्हें केले के पेड़ की पत्तियों की नोक पर जमा हुई सुबह की ओस को एक बर्तन में एकत्र करना है। जब पाँच लीटर ओस इकट्ठी हो जाए, मैं उसे अभिमंत्रित कर पारस पत्थर में बदल दूँगा। याद रखना—ओस में पानी मिलाकर धोखा देने की कोशिश मत करना, वरना पूरी मेहनत व्यर्थ हो जाएगी!”
दिनेश ने तुरंत काम शुरू कर दिया। उसने अपनी जमीन पर केले के पेड़ लगाए। शुरू में वह केवल कुछ बूंदें ही इकट्ठी कर पाता था। उसे एहसास हुआ कि पाँच लीटर ओस इकट्ठा करना तो वर्षों का काम होगा। उसने और पौधे लगाए—फिर और लगाए—यहाँ तक कि उसकी अधिकांश जमीन केले के पेड़ों से भर गई।
दिनेश सुबह–सुबह ओस की बूंदें इकट्ठी करता और बाकी समय पौधों की देखभाल करता। दो साल की अथक मेहनत के बाद वह पाँच लीटर ओस इकट्ठा करने में सफल हो गया। खुश होकर वह संत के पास पहुँचा।
संत ने कहा—“बहुत अच्छा। कल अपनी पत्नी को भी साथ लाना।”
अगले दिन दोनों पति–पत्नी पहुँचे। संत ने गंभीर स्वर में कहा—
“दिनेश, मैंने बहुत प्रयास किया, लेकिन मैं इन ओस की बूंदों को पारस पत्थर में नहीं बदल सका।”
यह सुनकर दिनेश टूट गया—
“महाराज! आपने भी मुझे धोखा दिया। मेरी दो साल की मेहनत व्यर्थ चली गई!”
संत मुस्कुराए और बोले—
“बेटा, मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। तुम्हारी पत्नी के हाथ में जो पोटली है, उसे खोलो!”
दिनेश ने पोटली खोली और अवाक रह गया। उसमें सोने–चाँदी के आभूषण और कीमती रत्न भरे हुए थे।
संत बोले—
“ये सब तुम्हारी मेहनत का ही फल है। दो साल से जो केले के पेड़ तुम लगा रहे थे, उनमें खूब फल लगे। तुम तो ओस में ही उलझे रहे, पर तुम्हारी पत्नी उन फलों को बेचकर ये सब जमा करती रही। मेहनत ही असली पारस पत्थर है, बेटा!”
दिनेश ने पत्नी की ओर कृतज्ञता से देखा—
“तुम सही कहती थीं, मेहनत से बड़ा कोई पारस पत्थर नहीं होता।”
उस दिन के बाद दिनेश ने मेहनत को ही अपना मार्ग बना लिया और कुछ ही वर्षों में उसने अपना खोया सम्मान वापस पा लिया।
शिक्षा:
मेहनत से बड़ा कोई पारस पत्थर नहीं होता।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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